कांग्रेस ने बाबा साहेब आंबेडकर को क्यों हराया? साजिश या राजनीतिक हकीकत?
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कांग्रेस ने बाबा साहेब आंबेडकर को क्यों हराया? साजिश या राजनीतिक हकीकत?

डॉ. आंबेडकर ने 1951 में नेहरू सरकार से इस्तीफा देते हुए बताया कि उन्हें योजना विभाग, आर्थिक समिति और अन्य महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से दूर रखा गया। कांग्रेस के दलित विरोधी रवैये की सच्चाई जानिए।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by कुलदीप सिंह
Apr 13, 2026, 01:36 pm IST
in विश्लेषण

देश में कई दशकों तक सत्ता में रही कांग्रेस पार्टी अकसर दलितों, अनुसूचित जनजाति व पिछड़ा वर्ग का हितैषी होने का ढिंढोरा पीटती है। परन्तु सच्चाई यह है कि इस पार्टी ने एक खास खानदान के हितों को प्रम्मुख रखते हुए इन वर्गों के नेताओं का तिरस्कार ही किया। कांग्रेस के तिरस्कार का सबसे बड़ा शिकार हुए समाज उद्धारक बाबा साहिब भीमराव आम्बेडकर जिनको पंडित जवाहर लाल नेहरू सरकार के मंत्रिमण्डल का हिस्सा बना कर कांग्रेस अपने आप को आम्बेडकरी विरासत का सबसे बड़ा झण्डाबरदार होने का दावा करती है। जबकि सच्चाई है कि कांग्रेस ने बाबा साहिब का स्थान-स्थान पर विरोध किया और उन्हें यथोचित स्थान नहीं दिया गया।

पहले आम चुनाव में बाबा साहिब की पराजय

देश में पहले आम चुनाव की प्रक्रिया 25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 तक लगभग चार महीने तक चली। पहले चुनाव में 489 लोकसभा सीटों के लिए 50 से अधिक पार्टियों के 1500 से अधिक उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा। इनमें से लगभग 100 निर्वाचन क्षेत्र द्वि-सदस्यीय थे, यानी एक ही निर्वाचन क्षेत्र से दो सांसद- सामान्य और आरक्षित वर्ग से चुने जाते थे। बाबा साहेब आंबेडकर तत्कालीन बॉम्बे प्रांत सेअपनी पार्टी शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरे। उनका निर्वाचन क्षेत्र उत्तरी मुंबई था और यह दो सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र था। कांग्रेस ने आंबेडकर के खिलाफ नारायण काजरोलकर को उतारा। चुनाव हुए और नतीजों ने सारे देश को चौंका दिया। काजरोलकर को एक लाख 38 हजार 137 वोट मिले थे जबकि बाबा साहेब आंबेडकर को एक लाख 23 हजार 576 वोट मिले। कांग्रेस के काजरोलकर ने आंबेडकर को हराया, वो भी पूरे 14 हज़ार 561 वोटों से। तब से लगातार यह आरोप लगता रहा है कि कांग्रेस ने जानबूझकर बाबा साहब को हराया।

इसे भी पढ़ें: सिएटल में स्वामी विवेकानंद की भव्य प्रतिमा का अनावरण, भारत-अमेरिका के सांस्कृतिक रिश्तों को नई मजबूती

कांग्रेस ने पहले समर्थन दिया फिर खिलाफ उम्मीदवार उतारा

एस.के. पाटिल उस समय मुंबई कांग्रेस के प्रमुख हुआ करते थे। मुंबई में पाटिल का दबदबा था और चुनाव से कुछ महीने पहले उन्होंने कहा था, कि अगर आंबेडकर आरक्षित सीट से चुनाव लड़ते हैं तो कांग्रेस उनके खिलाफ उम्मीदवार नहीं देगी। फिर आंबेडकर की पार्टी और समाजवादियों का गठंबधन हुआ तो एस.के. पाटिल इससे नाराज हो गए और उन्होंने नारायण काजरोलकर को बतौर कांग्रेस प्रत्याशी आंबेडकर के खिलाफ उतार दिया। एस.के.पाटिल समाजवादियों के कट्टर विरोधी थे। समाजवादियों और कम्युनिस्टों के प्रति उनका गुस्सा जगजाहिर था। आंबेडकर इस हार से इतने सदमे में थे कि पहले से ही कई बीमारियों से जूझ रहे आंबेडकर का स्वास्थ्य भी इस दौरान खराब हो गया। बाद में आंबेडकर बम्बई प्रांत से राज्यसभा में चले गए लेकिन वे लोकसभा में जाना चाहते थे। इसके दो साल बाद ही भंडारा में उपचुनाव हुए तो आंबेडकर वहां खड़े हुए। हालांकि, कांग्रेस उम्मीदवार ने उन्हें वहां भी हरा दिया। यह आंबेडकर का आखिरी चुनाव था क्योंकि दो साल बाद यानी 1956 में उनकी मृत्यु हो गई।

नेहरू मंत्रिमण्डल में न्यायोचित स्थान न मिलने से थे व्यथित

यह ठीक है कि पं. जवाहर लाल नेहरू की अंतरिम सरकार में बाबा साहिब को मंत्रिमण्डल में शामिल किया गया परंतु यहां भी उनके साथ न्यायोचित व्यवहार नहीं हुआ। 27 सितंबर 1951 को कांग्रेस नेतृत्व और विशेषकर पं. जवाहर लाल नेहरू द्वारा कैबिनेट से त्यागपत्र देने के लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर को विवश किया गया। संसद में अंबेडकर ने त्यागपत्र के साथ जो भाषण दिया (अंबेडकर राइटिंग, वॉल्यूम- 14 भाग 2, पृष्ठ 1317- 1327) वह कांग्रेस के एससी/एसटी विरोधी असली चेहरे को उजागर करता है।

अपने त्यागपत्र भाषण में बाबा साहिब ने बताई थी मन की पीड़ा

अपने त्यागपत्र भाषण में डॉ. अंबेडकर ने उस पीड़ा को बयां किया है जो उन्होंने नेहरू के हाथों झेली। ‘वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् के सदस्य बनने पर मुझे मालूम था कि कानून मंत्रालय का प्रशासनिक दृष्टि से कोई महत्व नहीं है। यह भारत सरकार की नीतियों को आकार देने का अवसर नहीं दे पाएगा। जब प्रधानमंत्री ने मुझे प्रस्ताव दिया तो मैंने उन्हें स्पष्ट बता दिया था कि अपनी शिक्षा और अनुभव के आधार पर एक वकील होने के साथ मैं किसी भी प्रशासनिक विभाग को चलाने में सक्षम हूँ।’

नेहरू जी की सरकार में प्रोटफोलियो वितरण में जानबूझ कर देरी की गई। बाबा साहिब लिखते हैं कि ‘पुराने वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में मेरे पास श्रम और लोकनिर्माण विभाग के प्रशासनिक दायित्व रहे, जिनमें मैंने कई परियोजनाओं को प्रभावी तरीके से कार्यान्वित किया। प्रधानमंत्री सहमत हो गए और उन्होंने कहा कि वह मुझे अलग से योजना का भी दायित्व देंगे। दुर्भाग्य से योजना विभाग बहुत देरी से मिला, जिस दिन मिला मैं तब तक बाहर आ चुका था।’

अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बाबा साहिब आगे लिखते हैं कि ‘मेरे कार्यकाल के दौरान कई बार एक मंत्री से दूसरे मंत्री को मंत्रालय दिए गए, मुझे लगता है कि उन मंत्रालयों में से भी कोई मुझे दिया जा सकता था लेकिन मुझे हमेशा इस दौड़ से बाहर रखा गया। कई मंत्रियों को दो-तीन मंत्रालय दिए गए जो उनके लिए अतिरिक्त बोझ भी बन गए थे। दूसरी ओर मैं था जो और अधिक काम चाहता था। जब कुछ दिन के लिए किसी मंत्रालय का प्रभारी मंत्री विदेश जाता था तो अस्थाई तौर पर वह कार्यभार तक देने के लिए मेरे बारे में नहीं सोचा जाता था।’

योग्यता की अनदेखी से व्यथित थे बाबा साहब

बाबा साहिब अपनी योग्यता की अनदेखी से अत्यधिक व्यथित थे। वे लिखते हैं कि ‘मुझे यह समझने में भी कठिनाई होती थी कि मंत्रियों के बीच काम का बंटवारा करने के लिए प्रधानमंत्री जिस नीति का पालन करते हैं उसका पैमाना क्या क्षमता है? क्या यह विश्वास है? क्या यह मित्रता है? या क्या यह लचरता है? मुझे कभी भी कैबिनेट की प्रमुख समितियां जैसे विदेश मामलों की समिति अथवा रक्षा समिति का सदस्य नहीं चुना गया।’

बाबा साहिब आर्थिक जगत के ङभी विशेषज्ञ थे और यथोचित काम करने का अवसर चाहते थे परन्तु उनकी अनदेशी हुई। अपने त्यागपत्र में बाबा साहिब लिखते हैं कि ‘जब आर्थिक मामलों की समिति का गठन हुआ तो प्राथमिक रूप से अर्थशास्त्र का छात्र होने के नाते मुझे आशा थी कि इस समिति का सदस्य मुझे नियुक्त किया जाएगा, लेकिन मुझे बाहर रखा गया।’ वे आगे लिखते हैं कि ‘जब प्रधानमंत्री इंग्लैंड गए तो मुझे कैबिनेट ने इसका सदस्य चुना लेकिन जब वह वापस आए तो कैबिनेट समिति के पुनर्गठन में भी उन्होंने मुझे बाहर ही रखा, मेरे विरोध दर्ज करने के बाद मेरा नाम जोड़ा गया।’

Topics: Baba Saheb's painआंबेडकर इस्तीफाबाबा साहब आंबेडक कांग्रेस पक्षपातनेहरू मंत्रिमंडलआंबेडकर त्यागपत्रकांग्रेस दलित नीतिबाबा साहेब पीड़ाAmbedkar resignationBaba Saheb Ambedkar Congress biasNehru cabinetCongress Dalit policy
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