महाराष्ट्र के चर्चित मालेगांव विस्फोट 2008 मामले में वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद कर्नल श्रीकांत पुरोहित को ब्रिगेडियर पद पर पदोन्नति की मंजूरी मिली है। साल 2008 में जब पुरोहित की गिरफ्तारी हुई, तब वे भारतीय सेना के एक उभरते हुए अधिकारी माने जाते थे। इस घटना ने उनके पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन को गहराई से प्रभावित किया। लगभग नौ वर्षों तक हिरासत में रहने के कारण उनका सैन्य करियर ठहराव का शिकार हो गया।
बरी होने के साथ सम्मान की बहाली- सेना जैसी अनुशासित संस्था में जहां पदोन्नति समयबद्ध और प्रदर्शन आधारित होती है, वहां इतने लंबे अंतराल का प्रभाव स्वाभाविक रूप से उनके करियर पर पड़ा। इस दौरान उनके कई जूनियर अधिकारी उनसे आगे निकल गए, जो किसी भी सैनिक के लिए मानसिक और पेशेवर दृष्टि से अत्यंत चुनौतीपूर्ण स्थिति होती है। सुप्रीम कोर्ट से 2017 में जमानत मिलने के बाद उन्होंने पुनः सेवा में वापसी की और अपने कर्तव्यों का निर्वहन शुरू किया। इस अवधि में उन्होंने अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के माध्यम से यह साबित किया कि वे न केवल सक्षम अधिकारी हैं, बल्कि अपने कर्तव्य के प्रति पूरी तरह समर्पित भी हैं। 31 जुलाई 2025 को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत द्वारा उन्हें सभी आरोपों से बरी किया जाना उनके लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। यह फैसला केवल कानूनी राहत नहीं था, बल्कि उनके सम्मान और प्रतिष्ठा की बहाली का आधार भी बना।
AFT में न्याय की राह खुली- इसके पश्चात उन्होंने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) का रुख किया, जहां उन्होंने अपने रुके हुए करियर को पुनर्स्थापित करने की मांग की। 16 मार्च 2026 को ट्रिब्यूनल ने इस मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए यह माना कि पुरोहित के साथ उनके जूनियर अधिकारियों के समान व्यवहार होना चाहिए। साथ ही, उनकी प्रस्तावित सेवानिवृत्ति पर रोक लगाते हुए यह संकेत दिया गया कि उनके साथ न्याय सुनिश्चित किया जाएगा।

















