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होम भारत असम

असमिया गरिमा, विकास और जनजातीय आकांक्षाओं के बीच संतुलन का चुनाव है असम

असम विधानसभा चुनाव 2026 में हेमंत बिस्वा सरमा की मजबूत छवि, असमिया अस्मिता, अवैध घुसपैठ और विकास के मुद्दों पर विस्तृत विश्लेषण। भाजपा का घोषणा-पत्र और विपक्ष की चुनौतियां पढ़ें।

Written byप्रदीप पंडितप्रदीप पंडित — edited by कुलदीप सिंह
Apr 5, 2026, 11:21 am IST
inअसम, विश्लेषण
Assam Election

प्रतीकात्मक तस्वीर

आवेगों के बीच आए अनुभवों के मतदानी त्योहार में असम झूम रहा है। अपनी ऊर्जा, ऊष्मा और मन में लिए फैसलों के साथ। यह चुनाव पहचान, विकास, असमिया अस्मिता, अवैध प्रवासन और विकास मॉडल के इर्द-गिर्द लड़ा जा रहा है। पूरे प्रदेश में राष्ट्रीय मुद्दों की जगह स्थानीय मुद्दे प्रभावी लगते हैं। इसकी भौगोलिक आावश्यकताओं की वजह से ही मुद्दों की भिन्नताएं नजर आती हैं। इसलिए अलग-अलग जगहों पर पृथक-पृथक प्रतिबद्धताएं भी दिखाई देती हैं। जैसे गोलपाड़ा, धुबड़ी या बरपेटा का जिसे लोअर असम कहते हैं और उत्तरी हिस्से यानि लखीमपुर, सोनितपुर की आकांक्षाओं के स्वर अलग हैं। लिहाजा, वे एक जैसा नहीं सोचते।

नए परिसीमन ने विपक्ष को असमंजस में डाल दिया है। इनमें कांग्रेस और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) की परेशानी यह है कि वे जितनी सीटों पर पारंपरिक रूप से मलखंब कर जीत जाते थे, उनकी संख्या घटी है। लेकिन एसटी की सीटें 16 की जगह 19 हो गई हैं और इसी तरह एससी की सीटें कम बढ़ीं, लेकिन अब वे 8 से बढ़कर 9 हो गई हैं। ऐसे में इस विविधतापूर्ण राज्य में विविध क्षेत्रों और समुदायों की जरूरतों को जो दल प्राथमिकता में रखेगा, वहीं विजयी होगा। ऐसा असमियों का कहना भी है और मानना भी। इसलिए एक नजर में मुख्यमंत्री हेमंत विश्व शर्मा की छवि और अपर असम अर्थात, डिब्रूगढ़, तिनसुकिया, जोरहट में विकास परियोजनाओं की वृदि्ध और बोडो लैंड और बराक वैली पर घोषणाओं के क्रियान्वयन में विपक्षियों की तार्किक स्थापना को जगह नहीं दी।

असम के विदेशी नागरिकों के मुद्दे पर शुरू हुए आंदोलन की सहभागिता से राजनतिक पारी का आगाज करने वाले 57 वर्षीय  हेमंत विश्व शर्मा आज अपनी तरह की शैली से ज्यादातर इलाकों में युवाओं के ‘मामा’ हैं। दूसरी तरफ गौरव गोगोई हैं, जिनके पिता तरुण गोगोई तीन बार के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, अपनी अकादमिक पढ़ाई और राजनीति का छौंक लगाकर नपी-तुली शैली में कांग्रेस के हड़बोंगी मुद्दों को आगे कर रहे हैं, जिन्हें लगभग ध्वस्त करते हुए हाल ही की अपनी यात्रा में गृहमंत्री अमित शाह ने ‘घुसपैठिया मुक्त असम’ का संकल्प दोहरा कर चुनाव का नैरेटिव गढ़ दिया। संसद में पेश किए गए आंकड़े के अनुसार 2015 से 2019 के बीच बांग्लादेश सीमा से हो रही घुसपैठ में 60 फीसदी की कमी आई है। इस बीच तकनीकी निगरानी प्रणाली का भी उपयोग किया जा रहा है। इससे डिब्रूगढ़ के लोग भी भिज्ञ हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पिछले दिनों डिब्रूगढ़ के चाय बगान तक पहुंचे थे।

कांग्रेस घुसपैठियों को वोट बैंक बनाने पर तुली

उन्होंने कामगारों से चाय की पत्तियां तोड़ने की कला सीखने की कोशिश भी की। प्रधानमंत्री ने इससे पहले धेमाजी जिले में कहा था कि कांग्रेस का लक्ष्य घुसपैठियों को स्थायी वोट बैंक में बदलना है। मगर कांग्रेस अतीत के बोझ से दोहरी हुई बैठी है कि उसने घुसपैठ को कभी प्राथमिकता में नहीं रखा। इसलिए उसके पास कोई जवाब नहीं है। इससे असमिया अस्मिता को खतरा पैदा हो गया। पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत जैसे नेता घुसपैठ रोकने को महत्वपूर्ण मुद्दा मानते हैं।

इसे भी पढ़ें: तमिलनाडु चुनाव 2026: सनातन धर्म खत्म करने की बात करने वाले मंदिरों में पूजा कर रहे हैं

असमिया गरिमा के लिए काम कर रही भाजपा

प्रदेश में भाजपा घोषणा-पत्र पर कई समुदायों और असमिया मीडिया ने सकारात्मक रुख अपनाया है। खासकर घोषणा-पत्र में असम के मूल निवासियों की जमीन, विरासत और गरिमा की सुरक्षा का वादा, जिसके लिए आ-प्रवासी (असम से निष्कासन) अधिनियम 1950 को लागू कर अवैध प्रवासियों को पहचान और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया तेज की जाएगी। जनजातीय क्षेत्रों को छोड़कर यूसीसी लागू किया जाएगा और ‘बाढ़ मुक्त असम मिशन’ शुरू किया जाएगा। बेरोजगारी के मसले को छूते हुए पार्टी ने दो लाख सरकारी नौकरियों का वादा किया है। इतना ही नहीं लव जिहाद पर कानून बनाने की बात भी की है। इससे खासकर नए जुड़ने वाले युवाओं में जिन्हें आप साधारणतया वर्तमान स्थापनाओं के विरुद्ध कहते हैं वे भी इससे सहमत दिखाई दे रहे हैं। ईस्टनई वेली कॉलेज गुवाहाटी के विपिन हजारिका और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस के केपी तालुकदार का मानना है कि इसमें असम अस्मिता और गौरव पर ध्यान दिया गया है। मानना चाहिए कि पार्टी अपनी प्रतिबद्धता पर खरी उतरेगी।

असम के भाजपा से पहले मुख्यमंत्री रहे सर्वानंद सोनोवाल मानते हैं कि जनता एक दशक से देख रही है कि पार्टी हमेशा सामाजिक न्याय के लिए खड़ी है। पूरी पारदर्शिता से दिखता है कि आम आदमी के स्तर में सुधार हुआ। अलग-अलग क्या बताना कांग्रेस के 60 साल के शासन से किसी भी असमिया से भाजपा के दस साल की तुलना करवा लें, समझ जाएंगे। उन्होंने असम के मतदाताओं को सुलझे हुए मतदाता बनाया।

भाजपा के सामने लाचार है विपक्ष

यह चुनाव अन्य चुनावों की तरह विपक्ष के लिए अवसर तो है लेकिन वह भाजपा की निष्पत्तियों की काट नहीं ढूढ़ पा रहा है। शायद इसलिए भी कि वह असम से उसकी आत्मा से जुड़कर प्रतितर्क खड़ा नहीं कर पा रही। वह अभी से ही निर्भर कर रही है पहली बार वोट देने वाले युवा, अल्पसंख्यक और थोड़े-बहुत चाय-बगान के वोटर। इसलिए कि इन्हें ‘स्विंग वोटर’ कहा जाता है। कांग्रेस इशारा कर रही है कि युवाओं में रोजगार की स्थिति अवसादजनक है, अल्पसंख्यकों की निष्ठा उसके साथ है और उसे भरोसा है ‘एंटी इनकमबेंसी’ पर। अपने लिए संभावना की अधजली लालटेन उसे दिखता है लोअर असम और कुछ  मुस्लिम बहुल क्षेत्र, यहां उसके पास सामाजिक आधार है भी। मगर उसके पास भावनात्मक नैरेटिव का अभाव साफ दिखाई दे रहा है कि वह अधिसंख्य लोगों से सीधे कनेक्ट नहीं कर पा रही। अपने तरह से वह भाजपा का प्रतिरोध करती तो है, कर भी रही है, लेकिन यह सब महज एक प्रतिक्रिया की तरह दिख रहा है। स्पष्ट एजेंडे के अभाव में कनस्तर पीटते विपक्ष को समझना होगा कि सिर्फ पसंदीदा आंकड़ों और आरोपों से काम नहीं चलेगा, जमीनी जुड़ाव होना और दिखना भी जरूरी है।

एक और उम्मीद कांग्रेस को है ही कि मुस्लिम इस बार उसके साथ हैं। वस्तुत: 45 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम मतों से निर्णय होता रहा है। आज की स्थिति में गुवाहाटी विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञानी का कहना है कि पहले भी वास्तविक बहुलता की दृष्टि से ऐसी सीटें कुल तीस थी, जो अब शायद 22 रह जाएं।

रहा सवाल बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ का। 2014 के चुनाव में उसे जरूर 22 सीटें मिली थी और कांग्रेस को पांच। इसी से हतप्रभ कांग्रेस ने 21 के विधानसभा चुनाव में अजमल से समझौता कर लिया और उसका खामियाजा उसे उठाना पड़ा। 24 में तो अजमल अकेले रह गये थे और उनके वोटर खिसक गए थे। इसलिए उनकी तरफ आशा से देखना भी कांग्रेस को नुकसान देगा। वैसे एआईयूडीएफ की हालत खस्ता है कि अजमल 24 में धुबड़ी से दस लाख वोटों से हार गये थे। इसलिए इस चुनाव में वह हस्तक्षेप कर पाएंगे ऐसा नहीं लगता। वैसे भी कांग्रेस की आरोपों की झोली में महज आरोप दिखते हैं जिन्हें वह पुष्ट नहीं कर पाती, शायद इसे हिमंत विश्व शर्मा बेहतर जानते हैं। सिर्फ इसलिए नहीं कि वे कांग्रेसी अंगनारे को हितेश्वर सैकिया के समय से जानते हैं बल्कि कॉटन कॉलेज गुवाहाटी के जनरल सेक्रेटरी होने के समय से आंकते हैं। वे तब ‘आसू’ से सम्बद्ध थे। लिहाजा, उन पर कांग्रेस सिवा अधिकारों के केंद्रीकरण के कोई आरोप भी नहीं लगा पा रही। अनवरत छोटो के लिए ‘दादा’ और युवाओं के ‘मामा’ पुकारे जा रहे हिमंतो (जैसे वहां कहते हैं) ने भाजपा का दामन थामते ही पार्टी की संप्रेषणीय भाषा, संकल्प, शिल्प और रणनीति को कुछ इस तरह अपना लिया कि अब उसे समझने या मानने के लिए उनके किए वादों के ब्रम्ह्पुत्र में उतरना होगा। आलोचना से भरे बादलों के बीच यह सब मानने वालों में कॉटल कॉलेज के सैकड़ों विद्यार्थी हैं।

जनजातियों (वनवासियों) के मुद्दे पर कांग्रेस यह समझाना चाह रही है कि वह सदा से उनके साथ है, इसके लिए उन्होंने दिल्ली, राजस्थान से महिलाओं और खिलंदड़ी कांग्रेसियों की फौज असम भेजी है। यह और बात है कि असम की सनातन लय को पकड़ नहीं पाते। विकास की बात करते ही अधिकांश वनवासी में समूची तब्दीली को उसका विकास मान बैठते हैं। ग्वालपाड़ा वेस्ट और दूधनोई जैसी जगहें भी अपनी परंपरा, भाषा, लोक संस्कति, गीत, त्योहारों के साथ विकास चाहती है। इसका रोडमैप वनवासियों को विचलित नहीं होने देगा। इसका विश्वास जो भी दल देगा, ये उसी के साथ हो जाएंगे, फिलहाल तो कांग्रेस के पास इनके लिए कोई ढाढस नहीं दिखता। गारो, बोडो, मीजो, खासी याकि पूर्वोतर की जनजातियों के लिए कोई योजना भी नहीं है लेकिन इस बार असम में भुनाया जा रहा है कि वनवासियत को केंद्र में रखकर उनके लिए ठोस नीति बनाई जा रही है, हो सकता है कि सरकार इस समाज के लेखकों जैसे मणिपुर को रोजी कामेई, नगालैंड की तेमसुला आओ, अरुणाचल की जमुना बीनी के स्वर या विमर्श भी शामिल हों। इसकी घोषणाा भर वनवासी वोटों के विचलन को स्थिरता दे देगी।

इसलिए कि वे भी विकास चाहते हैं, लेकिन अपनी पारंपरिक निष्ठा और भाषा के साथ, जिस पर नेहरू सिर्फ विनम्र रहना चाहते थे उनसे पूछा गया था कि आजाद भारत में वनवासियों से कैसा व्यवहार होना चाहिए तो उन्होंने कहा था विनम्र लेकिन वनवासियों में तब्दीली करने के प्रयासों ने उन्हें शक में घेर दिया। इसे देखते हुए असम में एजीपी के अतुल बोरा का मानना है कि एनडीए इस बार तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है। उनका कहना है कि महिलाओं, जनजातियों का समर्थन जबरदस्त है। हर जगह से  मिल रहे उम्मीद भरे सिग्नल से साफ है कि असम में फिर से जिम्मेदार सरकार बनेगी।

Topics: असम विधानसभा चुनावBJP Manifesto AssamAssam elections 2026New Delimitation in Assamअसम चुनाव 2026हेमंत बिस्वा सरमाअसमिया अस्मिताघुसपैठ मुक्त असमभाजपा घोषणा पत्र असमनए परिसीमन असमAssamese IdentityInfiltration-free AssamHimanta Biswa SarmaAssam Legislative Assembly Elections
प्रदीप पंडित
प्रदीप पंडित
हिन्दी और अंग्रेजी पत्रकारिता में 37 वर्ष का अनुभव। जनसत्ता, संडे मेल, दैनिक भास्कर, स्वदेश ग्वालियर और दिल्ली से प्रका​शित राष्ट्रीय पत्रिका शुक्रवार के संपादक। अनेक रेडियो नाटक, दर्जनों टेली फिल्म, उपन्यास, प्रतिप्रश्न, हिन्दी अकादमी दिल्ली से 1988-89 में साहि​​​त्यिक कृति पुरस्कार से सम्मानित। भारतीय ज्ञानपीठ की अनेक पुस्तकें संपादित। टैगोर और स्टीफन स्पेंडर के अनुवाद और अनेक पुस्तकें। [Read more]
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