सोशल मीडिया ने लोगों की सोचने-समझने की शक्ति पर काफी प्रभाव डाला है। लोगों को ऐसा लगता है कि वे स्वयं ही न्यायाधीश बन गए हैं। किसी पर कुछ भी टिप्पणी कर सकते हैं। सोचते भी नहीं कि क्या उन्होंने कुछ गलत तो नहीं कह दिया? क्या किसी के मान को ठेस तो नहीं लग रही? क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ने झूठ और तथ्य के बीच की महीन रेखा को मिटा दिया है।
ऋचा चड्ढा कथित प्रगतिशील अदाकारा मानी जाती हैं। भारत की सेना पर भी विवादित बयान देकर सुर्खियों में रहीं। कुछ वर्ष पहले भारतीय सेना की क्षमता पर प्रश्न चिह्न लगाया था और जब विवाद बढ़ा था तो पोस्ट को डिलीट कर दिया।
दरअसल उत्तरी सेना के कमांडर उपेंद्र द्विवेदी ने कहा कि सरकार के आदेश पर हम कोई भी कार्रवाई करने को तैयार हैं। उन्होंने पाकिस्तान को चेतावनी जारी करते हुए कहा कि अगर सीजफायर का उल्लंघन किया तो उसका मुंहतोड़ जवाब मिलेगा। इसी बयान को “Galwan says hi” कहते हुए दोबारा पोस्ट किया था। जिस पर उन्हें काफी आलोचना झेलनी पड़ी थी। ऋचा ने अपने पोस्ट पर माफी मांगी थी।
ऋचा चड्ढा को अब दिल्ली हाईकोर्ट ने क्यों फटकार लगाई?
दरअसल ऋचा चड्ढा ने एक ऐसी पोस्ट को साझा कर दिया था, जिसमें एक व्यक्ति की पहचान को दिखा दिया था। दरअसल, हुआ यह था कि एक महिला पत्रकार ने 11 मार्च को दिल्ली मुंबई फ्लाइट के दौरान अपने सहयात्री पर यह आरोप लगाया कि उसने उसे गलत तरीके से छुआ है। उसने अपनी पोस्ट में उस व्यक्ति की पहचान को भी दिखा दिया और उसके फ़ोटो और अन्य पेशेवर डिटेल्स भी साझा कर दिए।
उसकी पोस्ट वायरल होने के बाद कई मीडिया संस्थानों ने भी पत्रकारों के किये हुए दावे को रिपोर्ट किया और ऋचा चड्ढा ने भी उसे यह लिखते हुए साझा किया कि ““Make him famous”.
हालांकि उस यात्री ने यह कहा कि उसने कुछ नहीं किया था, बल्कि वह तो पूरे रास्ते अपनी सीट पर बैठा रहा और लैंडिंग से पहले तो सो भी गया था। उसने फिर मीडिया संस्थानों और ऋचा चड्ढा सहित अन्य हस्तियों पर मानहानि का मुकदमा किया कि उन्होंने बिना उसका पक्ष जाने स्टोरी चलाई। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार मामले की सुनवाई 20 मार्च को हुई और जस्टिस विकास महाजन ने यह पाया कि ऋचा चड्ढा ने असत्यापित दावों को न केवल बढ़ावा दिया, बल्कि आरोपी के खिलाफ भड़काऊ टिप्पणियां भी की।
उन्होंने कहा कि जहां पत्रकार को अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है, वहीं उन्हें बिना औपचारिक जांच के अनुचित तरीके से छूने, और वादी की पहचान जाहिर करने का कोई अधिकार नहीं है और वह भी फोटोग्राफ के साथ। कोर्ट ने यह भी कहा पहली दृष्टि में यह वादी के गरिमा के साथ जीवन जीने और निष्पक्ष मुकदमा होने के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।“ इसी मामले को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय ने ऋचा चड्ढा को फटकार लगाई!
पहले भी आ चुके हैं इस तरह के मामले
क्या बिना पुलिस के पास जाए, बिना औपचारिक जांच शुरू हुए, इस प्रकार से व्यक्ति की पहचान जाहिर करना उचित है? क्या पुरुषों के कोई अधिकार नहीं हैं? यह इसलिए प्रश्न उठता है कि क्योंकि हाल ही में केरल में एक व्यक्ति ने इसी कारण आत्महत्या कर ली थी क्योंकि बस में एक महिला ने जान-बूझकर ऐसा वीडियो बनाया कि वह उससे टकराए और वह अनुचित तरीके से छूने का आरोप लगाए। दीपक नामक व्यक्ति पर शिमिजिता मुस्तफा नामक लोकल ऐक्टिविस्ट ने रैंडम वीडियो बनाया और उस वीडियो में साफ दिख रहा था कि वह जानबूझकर वीडियो बनाने के लिए आगे बढ़ी और जब वह टकराया तो उसने यह कहते हुए वीडियो बनाया कि कैसे दीपक अनुचित तरीके से छू रहा है। जबकि दीपक को इस मामले के बारे में पता ही नहीं था। जब उनके पास यह वीडियो वायरल होते हुए पहुंचा तो वे इस पोस्ट पर आई हुई टिप्पणियों को सहन नहीं कर सके और उन्होंने आत्महत्या कर ली थी। शोर के बाद, उस महिला को गिरफ्तार कर लिया गया था।
ऐसी घटना सामने आने पर यह भी तर्क दिया जाता है कि वास्तविक पीड़ित महिलाओं की पीड़ा भी नेपथ्य में चली जाती है।











