बीबीसी की एक रिपोर्ट को लेकर ब्रिटेन में हंगामा मचा हुआ है। जब इन दिनों पश्चिम एशिया में युद्ध छिड़ा हुआ है और पूरा विश्व ऊर्जा संकट से दो-चार हो रहा है, उस समय बीबीसी ब्रिटेन को लेकर यह रिपोर्ट कर रहा है कि क्या ब्रिटेन “टू डॉग फ्रेंडली” हो रहा है?
बीबीसी ही नहीं कई वामपंथी मीडिया पोर्टल और अखबार केवल कुत्तों को लेकर नकारात्मक समाचार प्रकाशित कर रहे हैं। आखिर क्या कारण है कि जैसे ही पहले यूके की सरकार ब्रिटेन के गांव वाले क्षेत्रों को ऐसे लोगों के लिए सुगम बनाना चाहती है जिन्हें कुत्ते पसंद नहीं हैं तो वहीं एकदम से बीबीसी भी यह रिपोर्ट करता है कि “क्या हम बहुत अधिक डॉग-फ्रेंडली नहीं हो गए हैं?”
क्या लिखा है रिपोर्ट में?
इस रिपोर्ट में लिखा गया है कि कॉफी शॉप, रेस्टोरेंट और रीटेलर्स तक ऐसी जगहें बहुत आम हो गई हैं, जो कुत्तों के लिए दोस्ताना हैं। मगर उन पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए जो कुत्तों से डरते हैं या एलर्जिक हैं? ब्रिटेन में 13.5 मिलियन (1.35 करोड़) पालतू कुत्ते हैं। लगभग 36% परिवारों में कम से कम एक डॉग है। इस रिपोर्ट में है कि केनेल क्लब के अनुसार 72% लोग, जिनके पास कुत्ते हैं, वे रेस्टोरेंट, पब या कैफे में उसके साथ जाना पसंद करते हैं।
ब्रिटेन डॉग के प्रति अनुकूल देश कहा जाता है। वहां ग्रामीण क्षेत्रों में लोग कुत्ते पालते हैं और उन्हें घर का सदस्य मानते हैं। ब्रिटेन में कई ब्रांडस ऐसे हैं, जो कुत्तों को लेकर फ्रेंडली हैं और वे अपने उपभोक्ताओं के साथ उनके पालतू कुत्तों का भी स्वागत करते हैं।
इस पर बीबीसी का कहना है कि इन ब्रांड के ऑफिस में वे लोग कैसे आते होंगे जो कुत्तों से डरते हैं या फिर जिन्हें एलर्जी है। ऐसी ही एक महिला एबी के हवाले से लिखा है कि उसे अब से पहले से ज्यादा डर या फंसा हुआ महसूस नहीं हुआ, क्योंकि उसे बचपन से ही कीनोफोबिया अर्थात कुत्तों से डर लगता है। उसका कहना है कि वह तब तक बाहर नहीं जाती, जब तक वह यह तय न कर ले कि वह जगह कुत्ता मुक्त है।
एबी का कहना है कि अब और भी ज्यादा जगहें ऐसी होती जा रही हैं, जहां पर लोग ग्राहकों के साथ उनके कुत्तों का स्वागत करते हैं? इस रिपोर्ट में एक वीडियो है जिसमें अश्वेत प्रस्तोता प्रश्न करता है कि “क्या हम बहुत दूर तो नहीं निकल आए हैं?”
सोशल मीडिया पर हंगामा
बीबीसी की इस रिपोर्ट पर आते ही हंगामा हो गया। क्योंकि बीबीसी की यह रिपोर्ट अचानक से आई हुई नहीं लगती है। ऐसा इसलिए क्योंकि हाल ही में यूके सरकार ने खुद ही डॉग विरोधी विमर्श को शुरू किया था। यह विमर्श ब्रिटिश मुस्लिमों के हवाले से किया गया था। इसी साल के आरंभ में पर्यावरण, भोजन और ग्रामीण मामलों के विभाग ने यह योजना बनाई थी कि कैसे इंग्लैंड के ग्रामीण क्षेत्रों को कम श्वेत होना चाहिए और इसमें दावा किया गया था कि कैसे परंपरागत रूप से ब्रिटेनवासियों का कुत्ते पालना मुस्लिमों के लिए खतरनाक है।
जीबी न्यूज से बात करते हुए एक लेबर पार्टी के एड्वाइजर ने यह कहा था कि कैसे कई मुस्लिम कुत्तों के साथ सहज नहीं है। ब्रिटेन में लगातार ही कुत्तों का विरोध सरकारी स्तर पर हो रहा है। कई काउन्सिल्स हैं, जो अपने नियंत्रण वाले पार्कों में कुत्तों पर प्रतिबंध लगा चुकी हैं। वर्ष 2024 में वेल्स सरकार की इसे लेकर आलोचना हुई थी कि उसने अपने गैर नस्लीय वेल्स एक्शन प्लान के हिस्से के रूप में “डॉग-फ्री क्षेत्रों” की बात की थी।
लोगों का कहना है कि यह सहज समझा जा सकता है कि आखिर किसके लिए यह अधिक समावेशीकरण चाहते हैं। spiked के अनुसार लंदन की Camden काउन्सल ने अपने नियंत्रण वाले पार्कों में से कुत्तों को प्रतिबंधित कर दिया है।
एक यूजर ने कई घटनाओं की क्लिप साझा की, जिसमें कुत्तों को नस्लीय कारणों के कारण प्रतिबंधित करने की बात की गई है।
Sorry but what the heck is going on with this?
Why is the UK media suddenly fixated on dogs, seemingly to get people to question having them?
The UK is a solidly dog-loving place. British people have worked with them and kept them as companions for ever. This is so weird pic.twitter.com/bjONWXubRH
— Elisheva Abramson 🇮🇱🌴 (@ElishevaSays) March 31, 2026
उसने यह पूछा है कि क्यों यूके का मीडिया एकदम से कुत्तों पर ही केंद्रित हो गया है। यूके एक ऐसा देश है, जहां डॉग से प्यार किया जाता है और ब्रिटिश लोग उन्हें अपने साथी के रूप में रखते हैं
इस्लामी कट्टरपंथ के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे यूजर्स ने बीबीसी की इस रिपोर्ट को लेकर यही कहा कि यूके में कम कुत्ते होने चाहिए। सोशल मीडिया पर लोग खुलकर कह रहे हैं कि बीबीसी ने यह रिपोर्ट क्यों बनाई? एक यूजर ने लिखा कि सांस्कृतिक रूप से आपकी तहज़ीब कुत्ते को गंदा कहती है और फिर आप एक ऐसे देश में जाना पसंद करते हैं, जहां कुत्ते प्रेम से पाले जाते हैं न कि उस देश में जाते हैं, जहां पर या तो कुत्ते नहीं हैं या फिर कुत्तों पर पाबंदी है। यह हमारी नहीं आपकी समस्या है, कुत्ते रहेंगे, आप जाएंगे! लोग कह रहे हैं कि इस्लामिस्ट और वामपंथी उनके कुत्ते उनसे छीनना चाहते हैं।
पत्रकार सामंता स्मिथ ने एक्स पर लिखा कि यह इस्लामी प्रोपोगेंडा है। ब्रिटेन हमेशा से ही कुत्तों से प्यार करने वाला देश रहा है। ब्रिटेन एक शरिया देश नहीं है और न ही वह होगा। आप हमसे हमारी जमीन नहीं ले सकते, हमारी आजादी नहीं ले सकते, और आप हमसे हमारे कुत्ते नहीं ले सकते हैं।
सोशल मीडिया पर बीबीसी की इस रिपोर्ट को लेकर आलोचना हो रही है। क्योंकि लोग कह रहे हैं कि अचानक से ही युद्ध के समय ब्रिटेन के लोगों की स्वाभाविक प्रवृत्ति को खलनायक बनाने का बीबीसी का यह षड्यन्त्र क्या कहता है? ऐसा कहा जाता है कि मुस्लिम लोग कुत्तों को पसंद नहीं करते हैं और यही कारण है कि कुत्तों को सीमित करने की बातें इसलिए ब्रिटेन और वेल्स में हो रही हैं, कि जिससे आप्रवासी लोग (अधिकांश मुस्लिम) आसानी से रह सकें और घुलमिल सकें। इस पर लोगों का कहना है कि जिन्हें पालतू पशुओं से घृणा है, वे पालतू पशुओं से दूर रहना चुन सकते हैं। मगर कुत्तों को पालने वालों को ही खलनायक बना देना, यह कैसा षड्यन्त्र है? लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि अगर आपको कुत्ते पसंद नहीं हैं, तो शायद पश्चिम आपके लिए नहीं है। आपके लिए 50 से अधिक शरिया मुल्क हैं, आप वहां पर जा सकते हैं।
हर देश की एक सांस्कृतिक पहचान होती है, और ब्रिटेन की सांस्कृतिक पहचान है कि वे लोग अपने घरों में कुत्ते एक सदस्य के रूप में रखना पसंद करते हैं, अब यदि दूसरी पहचान वालों का समावेशीकरण करना है तो क्या उस पहचान को मिटाकर ही किया जा सकता है? सोशल मीडिया पर लोग अपने कुत्तों के साथ तस्वीरें साझा कर रहे हैं, क्योंकि वे कह रहे हैं कि वे अपने देश की पहचान को नहीं बदलने देंगे। वे अपने देश की पहचान के खिलाफ हो रहे इस षड्यन्त्र के खिलाफ हैं।

















