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होम भारत

Dhurandhar2 : सच दिखेगा तो तिलमिलाहट तो होगी

जब धुरंधर 2 जैसी फिल्में पर्दे पर ‘सच के करीब’ कहानी रखती हैं, तो केवल तालियां ही नहीं, तीखी प्रतिक्रियाएं भी साथ लाती हैं। इसके विरोधियों को असल में मिर्च इसलिए लग रही है क्योंकि फिल्म उन मुद्दों को छूती है, जिनको दिखाए जाने पर कथित सेकुलर और वामपंथी गिरोह को हमेशा आपत्ति रहती है

Written byविष्णु शर्माविष्णु शर्मा
Apr 1, 2026, 12:09 pm IST
in भारत, विश्लेषण, मनोरंजन

‘धुरंधर 2’ फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुनामी ला रही है और कई रिकॉर्ड तोड़ चुकी है और कई तोड़ने वाली है। इसका श्रेय विरोधियों को भी जाता है कि वे जितना इसे कोस रहे हैं, उससे इसका प्रचार ही हो रहा है। इतने दशकों में बहुत कम ही ऐसी फिल्में बनी हैं, जो दर्शकों की भावनाओं को इतने अंदर जाकर झकझोर पाई हैं। उन्हें फिल्म देखकर ये महसूस हुआ कि कुछ लोग हैं, जो उनकी सुरक्षा के लिए दूसरे देश में जाकर, गुमनामी में रहकर, अपना जीवन तक बलिदान कर देते हैं और हम लोग उनमें से कई के त्याग, वीरता की कहानी तो दूर उनके नाम तक नहीं जान पाते। मां भारती के ये पुत्र ही तो देश के असली नायक हैं। ‘धुरंधर 2’ फिल्म को इतना अधिक पसंद आने की एक बड़ी वजह है फिल्म निर्माण कौशल की एक-एक परीक्षा में उसका पास होना। जो भी फिल्में सिनेमाई पर्दे पर करिश्मा दिखा पाई हैं, वे आपको एक नई दुनिया में ले जाती हैं, जैसे शोले, केजीएफ, बाहुबली आदि।

दिखी पाकिस्तान की वास्तविकता

पाकिस्तान तो लोगों ने कई बार परदे पर देखा था, लेकिन हमेशा फिल्मी कहानी कुछ पाकिस्तानी पात्रों और एक खूबसूरत आईएसआई एजेंट में उलझ जाती थी। मनोरंजन के लिए ये ठीक था, लेकिन उन फिल्मों से भारतीय दर्शक कभी जुड़ नहीं पाया था, उसे हमेशा लगता था कि ये कहानी फिल्मी ही है, लेकिन इस बार अधिकांश को ये फिल्म असली कहानी लग रही है। आदित्य धर उन्हें असली पाकिस्तान में लेकर गए, सिंध के लियारी में बलूचों की अंदर की कहानी और आईएसआई से उनके दोहरे रिश्तों को ऐसे दिखाया कि लोगों को विश्वास करना पड़ा कि हां, ऐसा ही होता है। यही फर्क है बाकी फिल्मों और धुरंधर 2 में। उस पर पाकिस्तान से उबैर बलूच, एसपी असलम की पत्नी और नबील गबोल (जमील जमाली जिसका पात्र राकेश बेदी ने निभाया था) के टीवी साक्षात्कार भी लगातार आने लगे। लोग फिर भी नहीं माने और ढूंढ ढूंढकर धमाके के बाद एसपी असलम की कार का वीडियो, नकली नोटों के व्यापारी खनानी के नोटबंदी के बाद 2016 के मौत के खबरों की वीडियो आदि भी सोशल मीडिया पर शेयर कर दिए। ल्यारी की गैंगवार का वीडियो और उबैर बलोच को लेकर असलम पप्पू के कटे सिर से फुटबॉल खेलने का बयान तो काफी पहले से ही वायरल थे।

‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की मार

जो गिरोह धुरंधर सीरीज की पहली फिल्म से ही चोट खाए बैठा था, फिर से सुलगने लगा है। उनमें से कई फिल्म को ‘मुसलमान विरोधी’ बता रहे हैं। आरफा खानम शेरवानी, अभिसार शर्मा और ध्रुव राठी जैसे ट्रोलर फिल्म को प्रोपेगेंडा साबित करने में जुटे हुए हैं। यह साबित करने के लिए सबसे पहले उन्होंने फिल्म की डिस्क्लेमर पट्टी का हवाला दिया कि जब निर्देशक ही कह रहा है कि काल्पनिक कहानी है, तो हम इसे सच क्यों मान रहे हैं। फिर कुछ दिमाग लगाया और कहने-लिखने लगे कि मुख्य खलनायक इलियास कश्मीरी, जिसको फिल्म में मेजर इकबाल (अर्जुन रामपाल) दिखाया गया है, वो तो 2011 में ही मर चुका है। उसे मोदी सरकार के बाद मरता कैसे दिखाया जा सकता है? कई राजनीतिक दलों को लग रहा है कि भाजापा आगामी चुनावों में इसका फायदा न ले जाए, इसलिए वह अपना मुस्लिम वोट बैंक बचाने के लिए इस तरह के बयान जारी कर रहे हैं।

दाऊद को दिखाया लाचार

जो व्यक्ति कभी फिल्मी दुनिया को दुबई में बैठकर भी अपने इशारों पर नचाता था, जिसकी छोड़ी गई सम्पत्तियों तक को मोदी सरकार के आने से पहले कोई नीलामी में खरीदने की हिम्मत नहीं जुटा पाया, उस दाऊद इब्राहिम को बीमार और इस कदर लाचार दिखाया गया है जो खुद से उठ भी नहीं सकता। उस पर आदित्य धर ने उसका रोल एक मुसलमान कलाकार दानिश इकबाल को दिया। जम्मू कश्मीर के पूर्व डीजीपी एस. पी. वैद्य ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में यह लिखकर इसके विरोधियों को बिलबिलाने को मजबूर कर दिया। उन्होंने लिखा, “जब तक दाऊद के पैसों से फिल्में बन रही थीं, सब ठीक था, अब दाऊद पर फिल्म बन रही है तो लोगों को तकलीफ हो रही है।”

आदित्य ने जिस दूसरे चेहरे को ‘धुरंधर 2’ में प्रस्तुत किया, उसके खिलाफ एक दौर में इस कदर खौफ था कि उसके खिलाफ मुकदमे को एक के बाद एक 10 जजों ने सुनने से मना कर दिया था। कांग्रेस का एक मौजूदा सांसद उसकी चापलूसी में कभी खुले मंच से कसीदे पढ़ता था कि, ‘सदियों तलक कोई अतीक अहमद नहीं होगा।’ फिल्म में माफिया अतीक अहमद का आईएसआई से कनेक्शन दिखाया गया है, हालांकि पुलिस की चार्जशीट में अतीक का कुबूलनामा है, जिसमें वह आईएसआई से रिश्तों का खुलासा करता है। इससे भी कथित सेकुलर खेमा तिलमिलाया हुआ है। फिल्म में आतिफ अहमद यानी अतीक का रोल करने वाले सलीम सिद्दीकी हैं, वह जितनी देर तक पर्दे पर रहे, लोगों के चेहरे पर मुस्कान थी और पलक तक नहीं झपकाईं।

पीएम मोदी को दिखाए जाने से बिलबिलाहट

कुछ लोग इस फिल्म से इसलिए भी दुखी हैं? क्योंकि एक तो इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नोटबंदी की घोषणा करते हुए दिखाया जा रहा है। नोटबंदी को आईएसआई की नकली नोटों की साजिश को ध्वस्त करने से जोड़ा गया है। अब जो लोग आज तक नोट बंदी को असफल बताते आए हैं, उन्हें ऐसा लग रहा है कि फिल्म ने उनकी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया है। फिल्म देखने वाले खोजी प्रशंसकों ने नोटबंदी के ठीक 25 दिन बाद अपने ऑफिस की ऊंची इमारत से गिरकर नकली नोट माफिया खनानी के मरने की मौत की खबर की पाकिस्तानी न्यूज चैनल की क्लिप ढूंढ निकाली है, उससे लोगों को यह भरोसा होने लगा है कि फिल्म के लिए किया गया शोध वाकई में गजब था। एक और आरोप है कि काल्पनिक घटनाओं को भी सच की तरह दिखाया गया। जबकि सच ये है कि एक काल्पनिक किरदार जसकीरत सिंह रांगी यानी हमजा अली मदारी (रणवीर सिंह) के बहाने कई सारी सच्ची घटनाओं को जोड़कर ये फिल्म बनाई गई है। फिल्म जब खत्म होती है जमील जमाली (राकेश बेदी) के किरदार का जबरदस्त खुलासा होता है, इसमें वह भारत के जासूस हैं। इस किरदार से पाकिस्तान में हुक्मरानों को भी खासी दिक्कत हो रही है।

फिल्म का एक बेहतरीन हिस्सा है गुमनाम बंदूकधारियों का पाकिस्तान में आतंक, एक एक करके उन सारी आतंकी हरकतों के बदले लिए गए जो उन्होंने भारत में अंजाम दी थीं। रुपेन कात्याल के हत्यारे के मुंह से जिस तरह अजीत डोभाल बने अजय सान्याल (माधवन) ने लाइव चैट पर ‘भारत माता की जय’ कहलवाया, थिएटर तालियों से गूंज गया। बलूचों का आईएसआई द्वारा जो इस्तेमाल इस फिल्म में दिखा है, वो वास्तविक से कम नहीं लगता। लियारी की गैंगवार का वीडियो कई साल से वायरल था, वो भी पर्दे पर दिखाई दिया। ऐसे में आम देशभक्त भारतीयों को पाकिस्तान की राजनीति, गैंगवार को इतनी बारीकी से समझने का मौका पहली बार मिला है। खास तौर पर जस्सी के पहले जीवन को शानदार तरीके से दिखाना। रणवीर का किरदार जितना वास्तविक दिखाया गया था, उससे वो इसी दुनिया का लगा।

कई मिथकों को तोड़ा

पाकिस्तान पर बनी कई हालिया फिल्में देख लीजिए। पाकिस्तान पर जब भी कोई फिल्म बनती है, तो भारत में एक बड़ा तबका है जो उसे आतंकी अड्डे वाला देश दिखाने से बचता है। यही नहीं सेकुलर खेमा मैं हूं ना, बजरंगी भाईजान और टाइगर जैसी फिल्मों की तरह अमन पसंद और आतंक का भुक्तभोगी दिखाने में ज्यादा दिलचस्पी रखता है। कई फिल्मों में आतंकियों से लड़ने में आईएसआई और रॉ ने हाथ मिलाया है ऐसा दिखाया जाता है। ‘टाइगर 3’ फिल्म में तो पाकिस्तान के पीएम को बचाने का ही मिशन था, सैफ-करीना की ‘एजेंट विनोद’ में करीना, सलमान की ‘टाइगर’ सीरीज फिल्मों में कैटरीना तो शाहरुख की ‘पठान’ में दीपिका तक आईएसआई एजेंट बन चुकी हैं। जबकि ‘फना’ में तो आमिर खान ही पाक आतंकी का रोल कर चुके हैं। शाहरुख खान की ‘मैं हूं ना’ में पहली बार हिंदू आतंकी भी दिखा दिया गया था। इसके लिए बाकायदा सेना के अफसर के तौर पर सुनील शेट्टी को चुना गया, नायक का नाम राम था और खलनायक का नाम राघवेन्द्र।

हिंदू आतंकी दिखाने से परहेज नहीं

इसी तरह यशराज फिल्म्स की फिल्में भी हिंदू आतंकी दिखाने से परहेज नहीं करतीं और नायक कबीर हिंदू हैं या मुसलमान पता करना मुश्किल हो जाता है। माना जाता है कि वामपंथी एजेंडे के अलावा इसके पीछे एक बड़ी वजह आर्थिक भी है। इस्लामिक देशों में भारतीय फिल्में इतना पैसा कमाती हैं कि भारत के फिल्मकार इस तरह का घालमेल करने पर मजबूर होते हैं। जिस तरह से बिना खाड़ी देशों के ‘धुरंधर 2’ ने 7 दिनों में विदेशों में 376 करोड़ कमाए हैं, उससे ये मिथक भी ध्वस्त हो गया है कि खाड़ी देश हमारी फिल्मों का भविष्य तय करते हैं। इतनी जल्दी एक हजार करोड़ कमाने वाली यह पहली फिल्म है। ये अलग बात है कि इस कामयाबी के चलते सोशल मीडिया पर ऐसी सभी फिल्मों का मजाक उड़ा तो हिंदी पट्टी के किसी भी बड़े सितारे ने धुरंधर पर पहले सप्ताह में कोई बधाई जारी नहीं की। शाहरुख खान के नाम से एक स्कीन शॉट, “मैं आदित्य के साथ काम करने को मरा जा रहा हूं”, भी नकली साबित हुआ। हालांकि राजमौली के बाद रजनीकांत, अल्लू अर्जुन, महेश बाबू और जूनियर एनटीआर जैसे चेहरों ने फिल्म की तारीफों के पुल बांध दिए।

तकनीकी तौर पर हिट साबित हुई

रामगोपाल वर्मा और राजामौली फिल्म निर्माण के हर पक्ष की जमकर तारीफ करते हैं। चार घंटे किसी को कुर्सी से चिपकाकर रखना आसान भी नहीं होता। एक-एक सीन पर जान लगानी होती है। जिसमें कैमरा, स्टंट कोरियोग्राफी, और सिनेमेटोग्राफी से लेकर सैट डिजाइनिंग, एडिटिंग तक का सहयोग होगा है। शोध तो बेहतर था ही पृष्ठभूमि संगीत के दिलचस्प प्रयोग की भी काफी चर्चा हो रही है। रणवीर सिंह की गिरफ्तारी पर हम प्यार करने वाले, संजय दत्त की मौत पर तम्मा तम्मा लोगे, रणवीर सिंह की निराशा पर कभी बेखुदी ने मारा, ओये ओये, बाजीगर ओ बाजीगर जैसे गाने आनंद देते हैं। बिना आइटम गानों के, पुराने गानों ने ऐसा कमाल कर दिया है कि लोग यूट्यूब पर ढूंढ ढूंढकर बजा रहे हैं। यह सही है कि इस दूसरी फिल्म में अक्षय खन्ना के गाने जैसा कोई गाना नहीं बन पाया लेकिन ये भी सच है कि ये फिल्म पहली वाली से बेहतर है।

वापमंथी गिरोह को नहीं भायी

जब फिल्म के तकनीकी पक्ष और शोध की हर जगह प्रशंसा हुई तो सेकुलर खेमे के लोग इसमें खामियां निकालने में जुट गए। सिख संगठनों को ही सिगरेट के एक दृश्य पर भड़काने का प्रयास हुआ। माधवन ने फौरन स्पष्टीकरण देते हुए क्षमा मांग ली। जब रोज बॉक्स ऑफिस पर कमाई 100 करोड़ से ऊपर होने लगी तो लगा कि बाजी पलट रही है। यहां तक ईद के दिन भी मुसलमानों को भड़काने की तमाम कोशिशों के बावजूद फिल्म ने 82 करोड़ की कमाई की तो समझ आ गया कि फिल्म की बुराई करने से कुछ नहीं होगा। इसका श्रेय लेना ज्यादा बेहतर होगा। सो सोशल मीडिया पर अब हर घटना और हर जासूस को पाकिस्तान भेजने का श्रेय लेना भी शुरू हो गया है। जमाली (राकेश बेदी) को इंदिरा गांधी के समय भेजा गया था, जसकीरत रंगी नरसिम्हा राव सरकार के समय गया था, रहमान डकैत मनमोहन सिंह सरकार के दौरान मारा गया था, एसपी असलम चौधरी भी मोदी सरकार आने से चार महीने पहले ही मारा गया था, सो इनका श्रेय मोदी सरकार की बजाय कांग्रेस सरकार को मिलना चाहिए। हालांकि फिल्म से चिढ़े बैठे इस गिरोह के लोग अजीत डोभाल के किरदार को लेकर बोलने से परहेज कर रहे हैं, जो इस फिल्म में साफ कर देते हैं कि कांग्रेस की सरकारों में काम करना कितना मुश्किल था।

सोशल मीडिया पर ‘पोल खोल’ की सुनामी

इस फिल्म से सबसे ज्यादा मिर्च इस बात से लग रही है कि कई राज्यों में चुनाव आने वाले हैं, प. बंगाल, केरल और असम में विपक्ष को इस फिल्म के चलते ध्रुवीकरण का डर है। इस फिल्म के बाद पुरानी फिल्मों की क्लिप्स के जरिए अब तक चले आ रहे फिल्मी एजेडों की जो पोल खुल रही है। लोग देख रहे हैं कि कैसे अमिताभ बच्चन ‘कुली’ फिल्म में त्रिशूल वाले खलनायक को मार रहे हैं, कैसे वो ‘दीवार’ में भगवान से लड़ते हैं लेकिन 786 का बिल्ला उनकी जान बचाता है, कैसे एक डायलॉग में वे कह रहे हैं कि कश्मीर हिल स्टेशन को मुगलों ने बसाया था, कैसे रंगी बस से पाकिस्तान जाता है और शाहरुख सलमान फर्जी स्टंट कर रहे हैं। ऐसी फिल्मों के बारे में ढूंढ-ढूंढकर सोशल मीडिया पर वायरल किया जा रहा है।

पात्र और कलाकार दोनों दमदार

फिल्म में जितनी मेहनत और बारीकी के साथ एक एक पात्र तैयार किया गया है, उससे कम मेहनत कलाकारों ने भी नहीं दिखाई। सभी ने अपने-अपने किरदारों को पर्दे पर जीवंत कर दिया। राकेश बेदी के पात्र जलाली के चर्चित संवाद ‘मेरा बच्चा है तू’ को लेकर कितने ही मीम्स बन रहे हैं। अक्षय खन्ना के गाने पर जितनी रील्स बनीं, वैसी ही रील रणवीर सिंह के किरदार पर बन रही हैं। सोशल मीडिया पर अतीक और दाऊद के तमाम किस्से लिखे जा रहे हैं। रणवीर समेत सभी कलाकारों ने इस फिल्म में अपनी जान लगा दी है। महिला पात्र थोड़ी थोड़ी देर के लिए आयीं लेकिन दमदारी के साथ। उसके अलावा पिंडा के रोल में उदयवीर संधू और दाऊद के रोल में दानिश इकबाल प्रभावित करते हैं। आलम के रोल में गौरव गेरा का रोल तो पहली के मुकाबले और भी बढ़िया था। फिल्म के खलनायक अर्जुन रामपाल का जिक्र जरूरी है, क्योंकि उन्होंने हीरो के कद के बराबर ही खुद को खतरनाक बनाए रखा। सो उनकी मौत का दृश्य भी काफी खतरनाक रखा गया है। दिलचस्प था कि दो दिन बाद ही लश्कर के मुख्यालय मुरीदके से एक और लश्कर आतंकी की ऐसे ही घर में घुसकर हत्या की खबर आई, हालांकि फिल्म जब खत्म होने वाली होती है तो राकेश बेदी सब पर भारी पड़ते हैं।

Topics: दानिश इकबाल दाऊदISI and TerrorismDhurandhar2अतीक अहमद कनेक्शनगुमनाम बंदूकधारीभारत के जासूसराष्ट्रवाद और सिनेमादाऊद इब्राहिमसेकुलर और वामपंथी गिरोहअक्षय खन्नासर्जिकल स्ट्राइक की मारआर माधवननोटबंदी और आईएसआईआदित्य धर फिल्मराकेश बेदी जमील जमालीपाकिस्तान की वास्तविकताअर्जुन रामपाल मेजर इकबाललियारी गैंगवार
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वरिष्ठ पत्रकार और फिल्म समीक्षक [Read more]
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