बने राष्ट्र यह गौरवशाली,यह मंतव्य हमारा है : “राष्ट्र साधना के 100 वर्ष” पर राष्ट्रभक्ति के काव्यरस से सराबोर हुआ जयपुर
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होम कला-साहित्य

बने राष्ट्र यह गौरवशाली,यह मंतव्य हमारा है : “राष्ट्र साधना के 100 वर्ष” पर राष्ट्रभक्ति के काव्यरस से सराबोर हुआ जयपुर

मां भारती से सपूतों को समर्पित रही काव्य संध्या

Written byPanchjanyaPanchjanya
Mar 22, 2026, 08:32 pm IST
in कला-साहित्य
जयपुर में काव्य संध्या का आयोजन

जयपुर में काव्य संध्या का आयोजन

जयपुर। अखिल भारतीय साहित्य परिषद, जयपुर विभाग की ओर से “राष्ट्र साधना के 100 वर्ष” विषय पर एक भव्य काव्य संध्या का आयोजन 22 मार्च रविवार शाम को मानसरोवर, जयपुर में संपन्न हुआ। काव्य संध्या का शुभारंभ मां भारती और मां शारदे के चित्रों के समक्ष दीप प्रज्वलन से हुआ।

स्वागत सत्कार की औपचारिकता के उपरान्त बांसवाड़ा से पधारे कवि बृज मोहन तूफान ने सस्वर सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर इस काव्य संध्या का शुभारम्भ किया।

“जय हो देवी शारदे मां
हमें ऐसा वर दे मां
बुद्धिदायिनी मां सब तू ही रखवारी है
सरस्वती पुत्रों की भी तू ही रखवारी है…”।

इकाव्य संध्या के संयोजक रवि पारीक ने बताया कि जयपुर में परिषद की ओर से पहली बार हुए इस भव्य आयोजन में देश प्रदेश से आए हुए राष्ट्रभक्त कवियों ने अपनी काव्य प्रस्तुतियों से जयपुर को देशभक्ति के रंग से सराबोर कर दिया। उन्होंने बताया कि इस काव्य संध्या के मुख्य अतिथि सिविल लाइन जयपुर के विधायक गोपाल शर्मा आद्यंत काव्य संध्या में उपस्थित रहे।

दिल्ली से आए कवि डॉ प्रवीण आर्य ने मातृभूमि की वंदना करते हुए काव्य पंक्तियां प्रस्तुत की –

“जननी जन्मभूमि का वंदन आओ कर ले हम।
वंदे मातरम वंदे मातरम वंदे मातरम।।
राम कृष्ण को मातृभूमि से, स्वर्ग लगा फीका फीका। चूमे चरण चंदनी भू के, भाल लगा केसर टीका।
सुर नर मुनि तरसा करते, पाने को जहां जन्म।।
वंदे मातरम वंदे मातरम वंदे मातरम…”

धौलाना, उत्तर प्रदेश से आए हुए दास आरोही ” ने अपनी कविता में भारतवर्ष के सपूतों के संस्कार पर काव्य प्रस्तुत दी –

“हम समर लड़ा करते खुद से खुदको बुद्ध बनाने को
हम प्रथम प्रयत्न करते हैं, नर हित हर इक युद्ध बिताने को
हम शत्रु की मक्कारी तजकर प्रथम दुलारा करते हैं
यदि फिर भी नीच न माने तो फिर शीष उतारा करते हैं।
हम प्रखर पुंज हम तेजवंत, हम पारस जैसे सच्चे हैं
हमको हलके में मत लेना हम भारत के बच्चे हैं।”

अमर राष्ट्र की दिव्य साधना को कविता में ढालते हुए ओज और वीर रस के प्रख्यात राष्ट्रीय कवि विनीत चौहान ने श्रोताओं में राष्ट्रभक्ति का संचार किया –

“हम भारत की पुण्य धरोहर,अलबेले प्रणवीर हैं।
हम ऋषियों की सतत साधना,मानवता की पीर हैं।
अमर राष्ट्र की दिव्य साधना,यही लक्ष्य हमारा है।
बने राष्ट्र यह गौरवशाली,यह मंतव्य हमारा है।।
इस महान उद्देश्य प्राप्ति हित,लाखों ने व्रत धारा है।
इसकी सेवा में अर्पित क्षण – क्षण जीवन सारा है।।
काल चक्र की गति भी थामे,हम ऐसे बलबीर हैं।
हम ऋषियों की सतत् साधना,मानवता की पीर हैं।”

बीकानेर की कवयित्री मोनिका गौड़ ने भारत की नारी शक्ति के विराट स्वरुप और वंदे मातरम की महिमा को अपनी कविता में प्रस्तुत किया –

“संघ की पावन साधना विस्तार वंदे मातरम ।
हर ललना है दुर्गा का अवतार वंदे मातरम ।
सेवा समर्पण शौर्य शक्ति करुणा हृदय धारती,
मातृभूमि की रज उसका श्रृंगार वंदे मातरम ।
शाखा की वंदन ध्वनि में गुंजित नव संकल्प उदार,
बहनों की जय घोष में गूंजे हर पल ही बस राष्ट्र विचार।
नन्हे सपनों को देती संस्कार वंदे मातरम।
हर ललना है दुर्गा का अवतार वंदे मातरम।”

बाड़मेर से आए हुए राजस्थानी भाषा के प्रसिद्ध कवि गोरधन सिंह सोढा ‘जहरीला’ ने भारतीय स्वतंत्रता से उपजे गहरे विभाजन के दंश और उसके उपरांत के मोहभंग को अपनी मातृभाषा में प्रस्तुत किया –

“चौदह अगस्त सैंतालिस सगळा ने गोडा दिया रे ।
अखण्ड भारत रा टुकड़ा करनै मोडा किया रे ।।
सियासती लालची मिनख नी सुणी संघ री पुकार ।
घर देश छुड़वाये तीन तेरी रा किया रे ”

कोटपुतली से आए कवि नवनीत गौड़ ने अपने सरस मुक्तकों से मां भारती के सच्चे साधकों को शब्द सुमन अर्पित करते हुए काव्य प्रस्तुति दी –

” मां भारती के चरणों में निश-दिन शीश नवाते हैं।
जीवन मातृभूमि को देकर सदा अमर हो जाते हैं।
राष्ट्रभक्ति के दीपक की लौ मन में जलती रहती है।
ध्येयनिष्ट वे परम तपस्वी प्रचारक कहलाते हैं।”

उदयपुर के कवि सुरेन्द्र सिंह राव ने प्रचारक के त्याग और बलिदान को अपनी कविता में महिमामंडित करते हुए कहा –

प्रचारक है यह तो संघ का
है संस्कृति का रखवाला।
जग सिरमौर बने यह भारत
है स्वप्न नयन में पाला।। “

बांसवाड़ा के कवि बृजमोहन तूफ़ान ने अपनी छंद मुक्त कविता में मां भारती के कर्मयोगी स्वयंसेवक के विविध परोपकारी स्वरूप को अपनी कविता में प्रस्तुत किया

” हां मैं संत हूं
राष्ट्र सेवा हेतु
बड़ी मुश्किल से निकलता हूं
मैं अनंत हूं
अरे! मेरा क्या है,केवल शुभ्रवेश
और संघ का गणवेश
यही है मेरा अपना परिवेश
मैं नापता हूं सारा भारतवर्ष
मैं करता हूं जप तप और राष्ट्र आराधना
यही है मेरी साधना
मेरा तो तन मन धन जन जीवन
सब है मां भारती की सेवा…”

चित्तौड़गढ़ से आए कवि कृष्णार्जुन पार्थभक्ति ने भारत भूमि की महिमा का गान करते हुए राजस्थान के शौर्य को अपनी कविता में कुछ यूं प्रस्तुत किया –

“ये तपस्वियों की भूमि है,यहां हर क़दम पर बलिदान मिलेगा।
भक्त मिलेंगे मंदिर में, कण कण में भगवान मिलेगा।
सुना तो बहुत होगा तुमने, सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा,
अगर देखना हो तो आना राजस्थान
यहां हर दिल में हिंदुस्तान मिलेगा।”

कोटा से आए कवि राजेंद्र गौड़ ने भारत के विश्व गुरु की संकल्पना को कविता में प्रस्तुत किया जिसे श्रोताओं ने बहुत सराहा-

“हर हाथ को काम मिले , हर एक पेट को रोटी हो !
हर घर छत की छाया हो ,जीवन सत्य कसौटी हो !!
दूध दही की नदियां हो ,फिर चिड़िया हो सोने की !
घर घर धन धान्य भरा हो ,चिंता ना हो खोने की !!
ग्राम नगर उद्योग चले ,और रोजगार का डंका हो !
भ्रष्टाचार मिटे जन जन का ,नही किसी पर शंका हो !
सब मिलकर आत्मनिर्भर बने ,वैभव परम शुरू होगा !
भारत विश्व गुरू होगा!!’

महाराष्ट्र के कवि प्रवीण श्रीराम देशमुख ने अपनी कविता मराठी भाषा में प्रस्तुत की जिसमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्कार निर्माण संबंधित राष्ट्र सेवा का गुणगान किया गया

“सुदृढ संघशाखा सुसंघटीत जनता
करण्यास सिद्ध झालो मी संघ कार्यकर्ता ।
जाईन नगर ग्रामी, पाड्यावरी जनांच्या
भेटेन स्नेहभावे, वस्तीत दु:खीतांच्या
जाणून सुख दु:खा, त्यांच्या धरेन हाता
बंधुत्व जागवूनी दावेन संघ सरीता ।”

जयपुर के प्रसिद्ध गीतकार विकास तिवारी ‘ प्रज्ञेय’ ने संघ के शताब्दी वर्ष पर आह्वान गीत प्रस्तुत किया –

” भारत ने भारत में फिर से जीना सीखा
काश कहीं यह आवाजें फिर से दब न जाएं
फिर मर न जाएं,आकर मुझको राह दिखाएं।
मैं अंधियारा बनकर उनकी
गलियों में घुमा करता हूं,
काश कहीं से इक चिंगारी
आकर मुझे राह दिखाए
मैं भोला पतझड़ का मौसम
कहीं यह मुरझा न जाए
फिर से झड़ न जाए…
आकर मुझको राह दिखाए।”

इसके अलावा उन्होंने प्रचारक के त्याग बलिदान की महिमा को इस तरह शब्दबद्ध किया –
” चल पड़ा प्रचारक, व्रत की ज्योति जलाए।
राष्ट्र गान गाता हुआ आगे बढ़ता जाए।।
त्याग तिलक माथे पर,आँखों में विश्वास,
पग – पग पर संकल्प लिए,उर में दृढ़ प्रकाश।
आंधी आए तूफ़ाँ गरजे,पथ न रुकने पाए,
चल पड़ा प्रचारक,व्रत की ज्योति जलाए।”

नर्मदापुरम मध्य प्रदेश से आए हुए कवि सौरभ सूर्य ने शिवाजी और महाराणा प्रताप के संदर्भ से राष्ट्रभक्ति का स्वर बुलंद किया

“संघ शाखा में वीर शिवाजी
महाराणा प्रताप पढ़ें हम
नवयुग की नव तरूणाई में
जिंदा स्वाभिमान गढ़े हम…”

इस काव्य संध्या के स्वागताध्यक्ष पं. देवी शंकर शर्मा ने बताया कि राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत इस काव्य संध्या में राजधानी जयपुर के सहृदय सामाजिक श्रोता देर रात तक जमे रहे और देश भक्ति की काव्य सरिता में सराबोर होते रहे,बीच बीच में भारत माता के जयकारों से पांडाल गूंजता रहा।

काव्य संध्या का सफल मंच संचालन वीर रस से राष्ट्रीय कवि डॉ विनीत चौहान ने किया। कार्यक्रम के समापन पर स्वागताध्यक्ष ने सभी का आभार प्रकट करते हुए संघ साधना के शताब्दी वर्ष के अवसर पर सभी से सहयोग का आह्वान किया।

Topics: अखिल भारतीय साहित्य परिषदराष्ट्र साधना के 100 वर्षजयपुर काव्य संध्या
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