छत्तीसगढ़ में ईसाई कन्वर्जन का 'संगठित जाल': क्या है क्रिप्टो क्रिश्चियन और टू स्टेप थ्योरी, मिजोरम के उदाहरण से समझिए
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छत्तीसगढ़ में ईसाई कन्वर्जन का ‘संगठित जाल’: क्या है क्रिप्टो क्रिश्चियन और टू स्टेप थ्योरी, मिजोरम के उदाहरण से समझिए

छत्तीसगढ़ में कन्वर्जन एक चुनौती के रूप में उभर रहा है। यह महज व्यक्तिगत आस्था का परिवर्तन नहीं, बल्कि पूरी संस्कृति के कन्वर्जन का मसला है।

Written byPanchjanyaPanchjanya — edited by Mahak Singh
Mar 19, 2026, 07:27 pm IST
in छत्तीसगढ़
Christian conversion

प्रतीकात्मक तस्वीर

जनजातीय संस्कृति से समृद्ध छत्तीसगढ़ में एक बड़ी समस्या मतांतरण भी है। ईसाई कन्वर्जन से परेशान होकर कुछ गांवों में पादरियों की नो एंट्री के बोर्ड भी लगाए गए हैं। यह मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा था, जहां से ईसाई मिशनरियों को कोई राहत नहीं मिली थी।

छत्तीसगढ़ में कन्वर्जन एक चुनौती के रूप में उभर रहा है। यह महज व्यक्तिगत आस्था का परिवर्तन नहीं, बल्कि पूरी संस्कृति के कन्वर्जन का मसला है। यह केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि ग्राम और समुदाय स्तर तक दिखाई दे रहा है। नारायणपुर, आमाबेड़ा (कांकेर), बस्तर और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में कन्वर्जन से जुड़े विवाद सामने आए हैं। कई मामलों में सामाजिक टकराव और हिंसक झड़पें भी हुई हैं। यह इस बात का संकेत है कि यह प्रश्न कुछ घटनाओं का नहीं, बल्कि व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है।

प्रदेश में ईसाई आबादी के आधिकारिक आंकड़े सीमित दिखाई देते हैं, किंतु असंगठित चर्चों, ईसाई प्रार्थना केंद्रों की संख्या, विभिन्न क्षेत्रों में उनकी बढ़ती उपस्थिति, एक समानांतर विस्तार की ओर संकेत करती है। जनजातीय क्षेत्रों में यह अधिक स्पष्ट दिखता है, जहां मतांतरण की घटनाएं केंद्रित रूप में सामने आई हैं।

एक ही क्रम, एक ही उद्देश्य

कन्वर्जन की इस प्रक्रिया में एक समान क्रम दिखता है। जैसे कि पहले सामाजिक स्तर पर संपर्क और प्रभाव, इसके बाद मतांतरण, और आखिर में स्थानीय स्तर पर सामाजिक विभाजन। जब यह क्रम विभिन्न क्षेत्रों में समान रूप से दिखता है तो स्पष्ट हो जाता है कि यह व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि संगठित प्रक्रिया के तहत हो रहा है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में मतांतरण का प्रश्न केवल आस्था परिवर्तन का विषय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संतुलन, कानून-व्यवस्था और सामुदायिक संरचना से जुड़ा विषय है।

छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण की स्थिति को समझने के लिए इसे केवल कुल जनसंख्या के प्रतिशत के आधार पर नहीं, बल्कि उसके क्षेत्रीय वितरण और विस्तार के पैटर्न के आधार पर देखना आवश्यक है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार ईसाई आबादी सीमित दिखाई देती है, किंतु वास्तविक स्थिति का संकेत उन क्षेत्रों से मिलता है जहाँ यह परिवर्तन केंद्रित रूप में उभर रहा है।

बस्तर और नारायणपुर में जनसंख्या संरचना में बड़ा परिवर्तन

जशपुर, सरगुजा और बस्तर संभाग में धर्मांतरण की गतिविधियां लंबे समय से दर्ज होती रही हैं। जशपुर जिले में ईसाई आबादी का अनुपात राज्य के अन्य जिलों की तुलना में अधिक है, जबकि बस्तर और नारायणपुर के अनेक ग्रामों में हाल के वर्षों में जनसंख्या संरचना में तीव्र परिवर्तन देखा गया है। भूमियाबेड़ा, तेरदुल, घुमियाबेड़ा, चिपरेल, कोहड़ा, ओरछा और गुदाड़ी जैसे ग्रामों में ईसाई आबादी बहुसंख्यक स्थिति तक पहुंच चुकी है। इन ग्रामों की विशेषता यह है कि यहां निवास करने वाला समाज पूर्णतः जनजातीय है।

मैदानी क्षेत्रों में भी ईसाई मिशनरियां सक्रिय

यह पैटर्न केवल जनजातीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा। मैदानी क्षेत्रों में भी पिछड़े और अनुसूचित जाति वर्गों के बीच इसी प्रकार की गतिविधियों का विस्तार देखा गया है। सतनामी, साहू, देवांगन और अन्य समुदायों में हाल के वर्षों में मतांतरण के मामले सामने आए हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रारंभिक चरण में जनजातीय क्षेत्रों में स्थापित आधार अब अन्य सामाजिक वर्गों तक विस्तारित किया जा रहा है।

जशपुर में एशिया का बड़ा चर्च

प्रदेश में चर्चों और प्रार्थना केंद्रों की संख्या का कोई एकीकृत आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, किंतु विभिन्न स्रोतों के आधार पर यह स्पष्ट है कि संगठित और असंगठित दोनों प्रकार के धार्मिक ढांचे तेजी से बढ़े हैं। प्रोटेस्टेंट, रोमन कैथोलिक, सायरो मालाबार और मेनोनाइट समूहों की सक्रिय उपस्थिति इस विस्तार को संस्थागत स्वरूप प्रदान करती है। जशपुर के कुनकुरी में एशिया के बड़े चर्चों में से एक का स्थापित होना भी इस संरचना की व्यापकता को दर्शाता है। इनसे स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ में मतांतरण की प्रक्रिया केंद्रित है और इसका विस्तार हो रहा है।

कन्वर्जन के जाल का पहला चरण

छत्तीसगढ़ में कन्वर्जन की प्रक्रिया को समझने के लिए केवल “कहां” और “कितना” पर्याप्त नहीं है; यह भी जानना आवश्यक है कि यह कैसे संचालित होती है। इस प्रक्रिया का पहला चरण सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर प्रभाव बनाना होता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आर्थिक सहायता जैसे औजारों के जरिये समुदाय के भीतर घुसपैठ की जाती है। प्रारंभिक स्तर पर यह गतिविधियां सेवा या सहयोग के रूप में दिखती हैं, किंतु इसी माध्यम से सामाजिक संपर्क और निर्भरता का वातावरण बन जाता है।

कन्वर्जन के जाल का दूसरा चरण

वैचारिक स्तर पर हस्तक्षेप किया जाता है। जनजातीय और स्थानीय समुदायों के भीतर यह विचार स्थापित करने का प्रयास किया जाता है कि उनकी पारंपरिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान अलग और स्वतंत्र है। उसका व्यापक सांस्कृतिक परंपरा से कोई संबंध नहीं है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे समुदाय को उसकी जड़ों से अलग करती है और एक वैचारिक खालीपन पैदा करती है।

यही वह क्रम है जहां “two step theory” स्पष्ट दिखती है, जैसे – पहले समुदाय को उसकी सांस्कृतिक आधारभूमि से अलग करना, और फिर उस रिक्त स्थान को नए धार्मिक ढाँचे से भरना। यह परिवर्तन अचानक नहीं होता, बल्कि क्रमिक रूप से स्थापित किया जाता है, जिससे वह बाहरी हस्तक्षेप के बजाय स्वैच्छिक निर्णय के रूप में प्रतीत हो।

इस प्रक्रिया में मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, आर्थिक सहायता, रोजगार के अवसर, अंतर्धार्मिक विवाह और “चंगाई सभा” जैसे आयोजन किए जाते हैं। इनका उद्देश्य केवल सेवा प्रदान करना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण तैयार करना होता है जिससे आस्था सहज रूप से परिवर्तित हो जाए।

कुछ क्षेत्रों में यह भी देखा गया है कि जब किसी समुदाय के भीतर संख्या एक निश्चित स्तर तक पहुंच जाती है, तब सामाजिक दबाव और टकराव की स्थितियां उत्पन्न होने लगती हैं। नारायणपुर और आमाबेड़ा जैसे क्षेत्रों में सामने आई घटनाएं इसीका परिणाम मानी जा सकती हैं, जहां मतांतरण का विरोध करने वाले समूहों और मतांतरित समूहों के बीच सीधा संघर्ष हुआ।

क्रिप्टो किश्चिचन की अवधारणा

“क्रिप्टो क्रिश्चियन” जैसी स्थिति भी इस प्रक्रिया को जटिल बनाती है, जहां धर्म परिवर्तन के बावजूद व्यक्ति अपनी मूल पहचान को औपचारिक रूप से बनाए रखता है। इससे वास्तविक जनसंख्या संरचना का आकलन कठिन हो जाता है और यह प्रक्रिया सतही रूप से दिखाई देने वाली स्थिति से कहीं अधिक गहरी हो जाती है।

इन सभी तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि छत्तीसगढ़ में कन्वर्जन केवल एक गतिविधि नहीं, बल्कि एक संरचित, चरणबद्ध और बहु-स्तरीय प्रक्रिया है, जो सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक स्तरों पर समानांतर रूप से संचालित होती है।

डेमोग्राफी में बदलाव

छत्तीसगढ़ में कन्वर्जन की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण आयाम वह है जो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देता, किंतु दीर्घकालिक प्रभावों के संदर्भ में अत्यंत निर्णायक है। यह आयाम है डेमोग्राफी परिवर्तन का। “क्रिप्टो क्रिश्चियन” की अवधारणा इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे व्यक्ति जो व्यवहार और आस्था के स्तर पर ईसाई मत अपना चुके हैं, किंतु आधिकारिक दस्तावेजों में अपनी मूल पहचान बनाए रखते हैं, वे इस प्रक्रिया को अदृश्य रूप प्रदान करते हैं। इससे वास्तविक जनसंख्या परिवर्तन और उसके प्रभावों का सटीक आकलन कठिन हो जाता है।

उत्तर पूर्व के उदाहरण से समझिये

छत्तीसगढ़ की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए उसे एक व्यापक भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखना आवश्यक है। उत्तर-पूर्व भारत इस संदर्भ में एक स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। वहां पिछली एक शताब्दी में जनसंख्या संरचना में परिवर्तन ने सामाजिक और राजनीतिक वास्तविकता को पूरी तरह से बदल दिया।

मिजोरम, नागालैंड और मेघालय जैसे राज्यों में ईसाई आबादी में वृद्धि केवल एक धार्मिक परिवर्तन नहीं रही; इसके साथ स्थानीय सामाजिक संरचना, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय नियंत्रण भी परिवर्तित हुए। यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ, बल्कि क्रमिक रूप से छोटे-छोटे क्षेत्रों में आधार स्थापित कर, फिर उस आधार को विस्तार देकर घटित हुआ।

छत्तीसगढ़ में वर्तमान में जो स्थिति उभर रही है, छोटे-छोटे क्षेत्रों में केंद्रित परिवर्तन, जनजातीय समाज के भीतर आधार निर्माण, और उसके बाद स्थानीय स्तर पर तनाव, उसे यदि इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यह एक प्रारंभिक चरण के रूप में दिखाई देती है।

क्या होंगे दीर्घकालिक परिणाम

प्रश्न यह नहीं है कि छत्तीसगढ़ उत्तर-पूर्व बनेगा या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या वे सभी प्रारंभिक संकेत यहां दिखाई दे रहे हैं, जो उत्तर-पूर्व में भी कभी इसी रूप में मौजूद थे? यदि किसी प्रक्रिया के प्रारंभिक संकेत स्पष्ट हों, और उसके दीर्घकालिक परिणाम पहले से ज्ञात हों, तो उस स्थिति को अनदेखा करना केवल विश्लेषण की त्रुटि नहीं, बल्कि नीति की विफलता भी होगी।

इसीलिए यह आवश्यक है कि छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण के प्रश्न को केवल वर्तमान की घटनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि उसके संभावित परिणामों के संदर्भ में देखा जाए। क्योंकि जब जनसंख्या संरचना, सामाजिक संतुलन और क्षेत्रीय नियंत्रण एक साथ बदलने लगते हैं, तब वह स्थिति केवल सामाजिक नहीं रहती, वह संरचनात्मक परिवर्तन बन जाती है।

ब्रू-रियांग जनजाति तीन दशक तक अपने ही देश में शरणार्थी रही

भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में निवास करने वाली एक जनजाति है रियांग, जिसे ब्रू-रियांग भी कहते हैं। यह विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों में शामिल है, जो मूल रूप से मिजोरम की निवासी हैं। तीन दशक से अधिक समय तक इन्होंने अपने ही देश में शरणार्थी का जीवन बिताया है, जिसका कारण है ईसाइयों का आतंक।

90 के दशक के उत्तरार्द्ध में उत्तर पूर्व से जनजातीय हिंदुओं को ईसाइयों के आतंक के कारण अपना घर, अपनी जमीन, अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि छोड़कर जाना पड़ा। इस दौरान मिजोरम के चर्च समर्थित संगठनों ने इस कदर हिंसक गतिविधियों को अंजाम दिया जिसके बाद ब्रू-रियांग जनजाति समाज के लोगों का मिजोरम में रहना लगभग नामुमकिन हो गया।1996-97 के बीच एक वर्ष के भीतर ही ईसाई बन चुके मतांतरित लोगों ने ब्रू जनजाति के लोगों के साथ एक से अधिक हिंसक वारदातों को अंजाम दिया। ब्रू जनजाति के जो सदस्य ईसाई बनने को तैयार नहीं थे, उन पर चुन-चुनकर हमला किया गया। अंततः लगभग 40,000 से अधिक ब्रू जनजाति नागरिकों का मिजोरम छोड़कर त्रिपुरा की ओर विस्थापन हुआ।

ब्रू जनजाति ने मतांतरण से किया था मना

वर्तमान में जिस तरह बस्तर के कई गांव ईसाई बाहुल्य हो चुके हैं, और उन गांवों में ईसाइयों का ही प्रभाव है, ठीक उसी प्रकार पूरा मिज़ोरम ईसाई बाहुल्य राज्य है और वहां ईसाइयों की मनमानी है। आज से कुछ दशक पहले ईसाई मिशनरियों ने जब ब्रू जनजाति के लोगों का मतांतरण कराने का प्रयास किया, तो उन्होंने धर्म परिवर्तन करने से साफ इंकार कर दिया था। इसके बाद मिजो समुदाय से धर्म परिवर्तित कर ईसाई बने समूह ने ब्रू रियांग जनजाति को मिज़ोरम से बाहर करने का अभियान चलाया।

जब केंद्र एवं राज्य की सरकारों ने इन्हें वापस मिज़ोरम में बसाने का प्रयास किया, तब चर्च और उससे जुड़े संगठनों इसका पुरजोर विरोध किया। चर्च समर्थित ईसाई संगठन सेंट्रल यंग मिज़ो एसोसिएशन ने ब्रू-रियांग जनजाति के लोगों का मताधिकार छीनने की भी मांग कर ली। यह वही संगठन है, जिसने रियांग समूह को बाहरी बताते हुए प्रदेश से निर्वासित करने में लगा रहा।

चर्च और चर्च समर्थित संगठनों का खौफ इतना बढ़ चुका था कि रियांग जनजाति के लोग भूखे मरने को तैयार थे, लेकिन दोबारा अपनी जन्मभूमि में नहीं जाना चाहते थे।

उत्तर पूर्व की स्थिति

  • ईसाइयों की जनसंख्या 1901 – 0.83%
  • ईसाइयों की जनसंख्या 1941 – 0.75%
  • ईसाइयों की जनसंख्या 2011 – 16.94%

उत्तर पूर्व के राज्यों की स्थिति –

  • मिज़ोरम में ईसाइयों की जनसंख्या 1901 – 0.05%
  • मिज़ोरम में ईसाइयों की जनसंख्या 2011 – 87.16%
  • अरुणाचल प्रदेश में ईसाइयों की जनसंख्या 1971 – 0.79%
  • अरुणाचल प्रदेश में ईसाइयों की जनसंख्या 2011 – 30.26%
  • नागालैंड में ईसाइयों की जनसंख्या 1931 – 12.81%
  • नागालैंड में ईसाइयों की जनसंख्या 2011 – 87.93%
  • मेघालय में ईसाइयों की जनसंख्या 1931 – 15.71%
  • मेघालय में ईसाइयों की जनसंख्या 2011 – 74.59%

उत्तर पूर्व में जिस प्रकार से ईसाइयों की संख्या में वृद्धि देखी गई है, उसी का रूपांतरण छत्तीसगढ़ में भी करने का प्रयास है।

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