भारत में 51 शक्तिपीठों का विशेष महत्व है और इनमें से कई शक्तिपीठ जनजातियों द्वारा पूजित संरक्षित किए गए हैं।जबलपुर में आदिशक्ति के 52 वें गुप्त शक्तिपीठ बड़ी खेरमाई की पुनर्स्थापना गढ़ा -कटंगा के महान् जनजातीय गोंड सम्राट संग्राम शाह ने करायी थी,और स्वयं जवारे विसर्जन की परम्परा को शिरोधार्य किया था।सन् 1652 में गोंडवाना के राजा हृदय शाह ने बड़ी खेरमाई माता के लिए बाना पहना और चल समारोह को भव्यता प्रदान की थी। बड़ी खेरमाई मंदिर जनजातीय शक्तिपीठ ही नहीं वरन् हिन्दू संस्कृति का पवित्र तीर्थ भी है।
जनजातीय नवरात्र: सनातन परंपरा का जीवंत प्रमाण
तो फिर कौन जनजातियों को भड़काता है, कि जनजातीय समाज में देवी की आराधना नहीं होती? क्या वामपंथी? क्या जय भीम – जय मीम? क्या ईसाई मिशनरीज? क्या तथाकथित सेक्यूलर? तो आओ मैदान में और इसका उत्तर दो? क्योंकि जनजातीय नवरात्र परंपरा सनातन के मूल में है। भारत का हृदय स्थल मध्यप्रदेश है, जहाँ जनजाति संस्कृति की आत्मा बसती है। यही वह प्रदेश है,जहाँ आज भी जनजातीय समाज हिंदू संस्कृति के ऐक्य भाव को समाहित कर माँ भगवती की उपासना करते हैं। पूजन पद्धति भले ही अलग हो लेकिन ऐसे अनेक मंदिर प्रदेश में हैं,जहाँ सैकड़ों वर्षो से जनजाति अनवरत रुप से पूजन करने पहुंचते हैं। इस सन्दर्भ में जबलपुर भारत का केन्द्र बिंदु है, देखा जाए तो जबलपुर की जनजातीय नवरात्र परम्परा भारत के लिए एक उपहार है। यहां सैकड़ों वर्षों से खेरमाई माता का पूजन जनजातीय समाज हिंदुत्व के मूल में समाहित होकर कर रहे हैं। जिसमें आज भी सनातन परंपरा का निर्वाह किया जाता है।
जनजातीय आस्था और नवरात्र परंपरा
महाकौशल में गोंड संस्कृति में खेरदाई (खेरमाई )माता का पूजन वर्षों से किया जा रहा है। इन्हीं मंदिरों में हिंदू नवरात्र पर्व पर विशेष आराधना करने पहुंचते हैं। खेरमाई माता मंदिर को पहले खेरो माता के नाम से जाना जाता था। जो ग्राम देवी के रूप में पूजी जाती हैं। बसाहट के अनुसार मंदिरों की स्थापना भी बढ़ती गई। जबलपुर में माँ बड़ी खेरमाई मंदिर भानतलैया और मां बूढ़ी खेरमाई(खेरदाई) मंदिर चार खंबा और गोंडों की कुल देवी माला देवी का पूजन सैकड़ों वर्षो से जनजातीय परम्परा से पल्लवित और पुष्पित होकर सनातन में शिरोधार्य है। धीरे-धीरे उपनगरीय क्षेत्रों में भी खेरमाई माता की स्थापना की गई,जिसे अब छोटी खेरमाई मंदिर के नाम से जाना जाता है।
जनजातीय और हिंदू संस्कृति का अभिन्न संबंध
यह स्पष्ट है कि जनजातीय और हिंदू संस्कृति किसी भी दृष्टिकोण से पृथक नहीं हैं। भारतीय संस्कृति में देवी पूजा को मुख्य माना गया है और वही जनजातीय संस्कृति में प्रकृति पूजन के रुप शिरोधार्य है। यही कारण है कि जनजातीय प्रकृति की उपासना करते हुए वन प्रदेशों में रहे और शेष नगरीय क्षेत्रों में निवास करते हैं।जनजातीय प्रकृति पूजन को प्रधानता देते हैं लेकिन प्रकृति के तत्वों से ही मिलकर मूर्ति की स्थापना कर पूजन शुरू हुआ। गढ़ा-मंडला के महान् गोंड साम्राज्य के बड़े प्राचीन मंदिरों की बात करें तो यह कहीं न कहीं गोंड संस्कृति से जुड़ा रहा। यही कारण है कि जहां गोंड शासकों ने नगरों में कुआं, तालाब और बावड़ियों का निर्माण कर प्रकृति की उपासना की वहीं मंदिरों का भी जीर्णोद्धार कराकर संरक्षित किया।
बड़ी खेरमाई मंदिर: गोंड गौरव और आस्था का केंद्र
जबलपुर में बड़ी खेरमाई मंदिर का निर्माण गोंड राजा मदन शाह ने कराया था, जिसे महान गोंड सम्राट संग्राम शाह ने 52वें गुप्त शक्तिपीठ के रुप स्थापित किया।बड़ी खेरमाई मंदिर भानतलैया के बारे में प्रामाणिक तथ्य है सन् 1290 में कड़ा और मानिकपुर के तुर्क सूबेदार अलाउद्दीन खिलजी से एक बार गोंड राजा मदन शाह परास्त होकर यहां खेरमाई मां की शिला के पास बैठ गए। जहाँ उन्हें आध्यात्मिक अनुभूति हुई तदुपरांत पूजा के बाद उनमें अद्भुत शक्ति का संचार हुआ और राजा मदन शाह ने तुर्क सेना पर आक्रमण कर अलाउद्दीन खिलजी को परास्त कर खदेड़ दिया। मदन शाह ने विजय के उपलक्ष्य में मढ़िया का निर्माण कराया। महान् गोंड सम्राट संग्राम शाह ने 500 वर्ष पूर्व इस मढ़िया की कायाकल्प कराकर 52 वें गुप्त शक्तिपीठ के रुप में स्थापित कराया, यहाँ सती माता का निचला जबड़ा गिरा था इसका थी,यही देवी पुराण में 52 वें गुप्त शक्तिपीठ के रुप में वर्णित है। नगर अब महानगर हो गया है लेकिन आज भी मां खेरमाई (खेरदाई) का ग्राम देवी के रूप में पूजन किया जाता है। सन् 1652 में पहला जवारा चल समारोह गोंड शासक हृदयशाह ने निकाला था और बाना धारण किया था। यह परंपरा 374 वर्षों अनवरत जारी है।
बूढ़ी खेरमाई मंदिर: आस्था और प्राचीन परंपरा

जबलपुर में चार खंबा स्थित सातवीं महाविद्या मां धूमावती के मंदिर को बूढ़ी खेरमाई(बूढ़ी खेरदाई )मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यहां लगभग 1500 साल से लोग आराधना कर रहे हैं। खास बात यह है कि यहां बाना चढ़ाने की विशेष परंपरा है। प्रार्थना पूरी होने पर भक्त विशेष रूप से बानों को मां के चरणों में बानों को अर्पण करते हैं। सबसे बड़े बाने को एक साथ 11 लोग पहनकर जवारा विसर्जन चल समारोह में निकलते हैं। माँ के लिए मनोकामना पूर्ण होने पर आस्था प्रदर्शित करने के लिए नुकीले बाना छेदने की प्रथा सन् 1480 से गोंडवाना के महा प्रतापी राजा संग्राम शाह ने प्रारंभ की थी और चल समारोह में स्वयं बाना धारण किया था, तब से 546 वर्ष हो गए यह परंपरा हर वर्ष विस्तृत रुप लेते जा रही है।
मालादेवी: गोंड राजवंश की कुलदेवी
महालक्ष्मी के रुप में मालादेवी गढ़ा -कटंगा के महान् गोंड साम्राज्य की कुल देवी के रुप में शिरोधार्य की गई थीं। गढ़ा ब्राह्मण मोहल्ला में मालादेवी की प्रतिमा चौदह सौ वर्ष से है। मालादेवी का पूजन 6वीं शताब्दी से हो रहा है। ये कल्चुरी हैहय चंद्रवंशी क्षत्रिय वंश की कुलदेवी हैं। माला देवी भगवती महालक्ष्मी के स्वरूप में हैं। गोंडवंश की महारानी वीरांगना दुर्गावती नियमित रूप से आराधना कर,अपने राज्य के वैभव और जन कल्याण के लिए आशीर्वाद मांगती थीं। वर्तमान स्थल के सामने अंतिम गोंड राजा शंकर शाह का महल था, राजा शंकर शाह सुबह सबसे पहले भगवती के दर्शन करते थे। पहले मढ़िया में केवल एक पत्थर और वहां बानों को ही लोग पूजते थे, परन्तु 10 वीं शताब्दी में पत्थर की मूर्ति मढ़ा दी गई थी। अभी भी वही मूर्ति पूजी जा रही है। माला देवी गढ़ा – कटंगा के गोंड राजवंश की कुल देवी थीं ।
विश्व में भारत से ही जनजातीय समाज और संस्कृति का आरंभ हुआ और उनके आदि देव फड़ापेन ही भगवान् महादेव हैं, अर्थात अद्वैत है। जनजातीय परंपरा में शम्भू महादेव दूसरे शब्दों में शम्भू शेक के परिप्रेक्ष्य में महादेव की 88 पीढ़ियों का उल्लेख मिलता है – प्रथम पीढ़ी शंभू-मूला, द्वितीय पीढ़ी -शंभू-गौरा और क्रमशः अंतिम पीढ़ी शंभू-पार्वती के रुप में हैं। गोंड जनजाति में पंच खंड धरती के पिता शंभू मादाव का अपभ्रंश शम्भू – महादेव ही सनातन के मूल में है। संपूर्ण भारत वर्ष में नवरात्र का उत्सव विविध रुपों में शक्ति की उपासना का सर्वोच्च पर्व है।
नवरात्र में जनजातीय देवी-उपासना की समृद्ध परंपरा
नवरात्र पर्व में जनजातीय समाज की उपासना पद्धति हिन्दू संस्कृति के चित्रफलक में प्रकृति के विविध रंग भरती है। हमारा मूल एक ही है, इसलिए अपकारी शक्तियों द्वारा बाँटने का कुत्सित प्रयास कभी सफलीभूत नहीं होगी। पाश्चात्य विद्वानों और तथाकथित सेक्यूलरों द्वारा जनजातीय समाज में मूर्ति पूजा का निषेध बताना मूर्खता है,क्योंकि मूर्तियां निर्गुण की उपासना का प्रतीक हैं। भारत में जनजातीय परम्परा में देवी की उपासना का व्यापक फलक है।गोंड समाज में खेरो माता, भील समाज में नवणी पूजा, कोरकू समाज में देव दशहरा, झारखंड में दसांय नृत्य से उपासना,म.प्र.के कट्ठीवाड़ा क्षेत्र में डूंगरी माता, गुजरात के जौनसार-बावर में अष्टमी पूजन, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में जइया पूजा, गुमला जिले में श्रीबड़ा दुर्गा मंदिर का पूजन, जनजातीय देवी उपासना के प्रमाण हैं।
नवरात्र में खेरमाई: आदिशक्ति का जनजातीय स्वरूप
आदिशक्ति का विस्तार अनंत है और भारत में जनजातीय परिप्रेक्ष्य में विशेष कर महाकौशल , बुंदेलखंड और विंध्य में खेरमाई के रूप में हुआ है,जो गोंडवाना में खेरदाई के रुप में शिरोधार्य हैं और महाकौशल के मंदिरों और अन्यत्र अधिष्ठानों में स्थापित खेरदाई की प्रतिमाएं नवरात्र पर्व में माँ भगवती के विविध स्वरूपों में पूजनीय हैं। खेरमाई (खेरदाई) अपकारी शक्तियों से हमारी धरती के साथ सभी प्राणियों और वनस्पतियोंकी रक्षा करती हैं।भारत में नवरात्र पर्व का यह अद्वैत भाव अद्भुत एवं अद्वितीय होने के साथ मार्गदर्शी भी है।
विमुक्त-घुमंतू जनजातियों में देवी उपासना और नवरात्र की समृद्ध परंपरा
भारत में विमुक्त, घुमंतू और अर्ध घुमंतू जनजातियों की देवी उपासना और नवरात्र की परंपरा और मान्यताएं हिंदू धर्म की धरोहर हैं। ये जनजातियां आदिशक्ति के विभिन्न स्वरूपों को शिरोधार्य करती हैं इसलिए हिंदू धर्म का अविभाज्य हिस्सा हैं। महादेवी माँ काली और महाविद्या माँ बगलामुखी की उपासना की प्रमुखता है,तो वहीं परिवारों में कुल देवियों का महात्म्य है। मध्य भारत छत्तीसगढ़ और राजस्थान सहित विभिन्न प्रदेशों में इनके द्वारा स्थापित मूर्तियां और मंदिरों में नवरात्र का महापर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। गौरतलब है कि छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी मां तुलजा भवानी थी इसलिए पिंडारी भी मां तुलजा भवानी की उपासना करते थे, वहीं ठगों में महाकाली की उपासना की प्रधानता थी।
ठगों में तो यह विशेष बात थी कि कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म और जाति का क्यों ना हो वह महाकाली की ही उपासना करता था। संपूर्ण भारतवर्ष में छत्तीसगढ़ के रायपुर में बंजारी माता का मंदिर बंजारों की कुलदेवी का मंदिर है जो मां बगलामुखी देवी के रूप में प्रतिष्ठित है। इस प्रकार पूरे भारतवर्ष में यत्र- तत्र- सर्वत्र देवी उपासना और नवरात्र का महापर्व मनाया जाता है। गौरतलब है कि पिंडारी और ठगों ने बरतानिया सरकार के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया है इसलिए अंग्रेजों ने इनका सर्वनाश करने के लिए षड्यंत्र रचने कर जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया। विडंबना तो देखिए कि बरतानिया सरकार के सुर में सुर मिलाकर वामपंथी और तथाकथित सेक्यूलर इतिहासकारों ने भी इनको अपराधी मानकर इतिहास लिख डाला। अब सही इतिहास लिखने का समय आ गया है। घूमंतू जातियों का बहुत ही गौरवशाली इतिहास है , जो समय-समय पर सामने आ रहा है । धार्मिक दृष्टि से पूरे भारत में घूमंतू जातियों ने हिंदू धर्म की न केवल रक्षा की है वरन मूर्तियां और मंदिरों की स्थापना भी की है। विमुक्त ,घुमंतू और अर्धघुमंतू जनजातियों में देवी उपासना और नवरात्र पर्व का विशेष महत्व है।
इतिहास साक्षी है कि महाराष्ट्र के धाराशिव जिले में स्थित तुलजापुर ,एक ऐसा स्थान जहाँ छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी माँ तुलजा भवानी स्थापित हैं, जो आज भी महाराष्ट्र व अन्य राज्यों के कई निवासियों की कुलदेवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। मध्य प्रदेश में भी खंडवा के पास तुलजा भवानी का मंदिर है। छत्रपति शिवाजी महाराज के निर्देशन में पिंडारियों ने मुगलों की खटिया खड़ी कर दी थी और तुलजा भवानी को अपनी कुलदेवी ही मानते थे। पिंडारियों ने बरतानिया सरकार के खिलाफ भी भारत की स्वाधीनता के लिए मरते दम तक संघर्ष किया था, जिसका इतिहास अतीत के गर्भ में है जो शीघ्र ही सामने आएगा।
रायपुर का बंजारी माता मंदिर: बंजारों की कुलदेवी स्थल

छत्तीसगढ़ के रायपुर और मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के बंजारी माता का मंदिर पूरे भारत में प्रसिद्ध हैं। छत्तीसगढ़ के रायपुर का बंजारी माता का मंदिर पूरे भारत के बंजारों की कुलदेवी के मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है , जो मां बगलामुखी की प्रतिमूर्ति है। मंदिर परिसर में भगवान विष्णु, भगवान शिव (बंजारेश्वर महादेव), श्री राम, गणेश, हनुमान आदि के उप-मंदिर हैं।
बंजारी माता: व्यापार, आस्था और दिशा-निर्देशन की परंपरा
बंजारी माता का प्राकट्य बंजर भूमि से माना जाता है। बंजारी माता के मंदिर विभिन्न स्थानों पर पाए जाते हैं जहां वर्ष भर देवी की उपासना और नवरात्र का महापर्व बड़े उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है। व्यापारिक दृष्टि से रेशम महापथ पर जब बंजारे व्यापार करने जाते थे , तब विदेश में भी बंजारी माता की स्थापना करते थे। 10वीं सदी के पहले से इनके पूजन एवं स्थापना होती चली आ रही थी, परंतु बाद में इस्लामी आक्रांताओं ने इन्हें विनष्ट कर दिया। बंजारी माता एक देश से दूसरे देश तक व्यापार करने वाले बंजारा समाज के ठीये और दिशा दिग्दर्शिका के रूप में स्थापित की जाती थीं। अधिकतर बंजारी माता की प्रतिमाओं और उनके मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर ही मिलेगा। वे सूर्य उपासक हुआ करते थे। जंगलों व रास्तों में भटकने वालों को दिशाओं का ज्ञान भी इन मंदिरों के माध्यम से उपलब्ध हो जाता था। मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले की चारों दिशाओं में माता बंजारी के दरबार हैं। गोसलपुर, मंडला रोड की घाटी, तेंदूखेड़ा की पहाड़ी, सिवनी के गणेशगंज की दुर्गम पहाड़ी पर इनके दरबार आज भी आस्था का केंद्र हैं।
महाकौशल में कुलदेवी पूजन और नवरात्र की परंपरा
महाकौशल क्षेत्र में दिवालों में मरही, बंजारी और भूलन माता कुल देवी, के रूप में पूजी जाती हैं।जय हो मरही माता, जय-जय बंजारी माई की…जय बोलो भूले की शक्ति, भूलन माई की जय हो, …कुछ ऐसे ही जयकारे नवरात्र के दिनों लोगों के घर में बने देवी दिवालों में प्रतिदिन सुबह शाम सुनाई दे जाते हैं। नवरात्रि में भले ही माता के नौ रूपों की व्याख्या व पूजन का विधान है, लेकिन श्रद्धालु अपने कुल देवी देवताओं का पूजन पहले करते हैं। ये परम्परा सदियों पुरानी है। इनका निर्वहन आज भी पूरी आस्था के साथ किया जा रहा है।
भूलन माता: पथिकों की मार्गदर्शक देवी
महाकौशल और बुंदेलखंड में पथिकों को राह दिखने वाली देवी भूलन माता के नाम से प्रसिद्ध हैं। प्रमाण के लिए जबलपुर में भूलन देवी माता के दो स्थान हैं। पहला कठौंदा गांव के पीछे बना भूलन देवी दरबार, दूसरा संजीवनी नगर से लगे भूलन गांव की मढिय़ा में माता विराजमान हैं। यह प्रतिमाएं आठवीं और नवी शताब्दी से विद्यमान है ।भूलन गांव का दरबार दक्षिण दिशा की ओर जाने वालों का मार्ग तय करता था। कठौंदा वाला दरबार उत्तर दिशा को प्रदर्शित करता था। जंगलों में जानवरों का भय आदि होता था, ऐसे में यहां से गुजरने वालों के रात्रि विश्राम स्थल व साधना केंद्र भी होते थे।
हर समाज में गोंडी परम्परा की पूजा विधि सम्मिलित हो गई है। कालांतर से जो लोग यहां निवास कर रहे हैं, उन सभी समाजों में भले ही पूजन विधि कितनी अलग हो, लेकिन थोड़ी बहुत गोंडी परंपरा की पूजा विधि सभी में शामिल है। बाना छेदन, खप्पर आरती, नींबू रस की धार, आटा की खीर ये सब जनजाति परम्पराओं में आते हैं।
मरही माता, खेरदाई और खप्पर वाली के उपासक सर्वाधिक, महाकौशल और बुंदेलखंड क्षेत्र में हैं। सदियों से इन क्षेत्रों में स्थानीय व लोक परंपरा में पूजे जाने वाले देवी- देवता जनसाधारण के कुल देवी -देवता हैं। यही कारण है कि यहां शास्त्रों में बताए गए देवी देवताओं की अपेक्षा इनके मंदिर व दरबार सबसे अधिक हैं। घरों के देवी दरबारों में मरही माता, खेरदाई, खप्पर वाली, वनदेवी के दरबार बने हैं। यहां मंत्रों के बजाय तंत्र पूजन होता है। इनकी पूजन विधि पूर्वजों द्वारा तय परम्परानुसार किया जाता है। कहीं जवारे बोने के साथ बाना भी पूजा जाता है। कहीं खप्पर आरती की परम्परा पीढिय़ों से चल रही है। यही तो एक भारत , समरस भारत और श्रेष्ठ भारत की पहचान है।











