आर. वैरमुथु तमिल साहित्य और फिल्म उद्योग के एक प्रमुख स्तंभ हैं। वे कवि, गीतकार, उपन्यासकार और निबंधकार के रूप में जाने जाते हैं। उनके नाम पर 7,500 से अधिक फिल्मी गीत दर्ज हैं, जिनमें से कई राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके हैं। उन्होंने पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे सम्मान प्राप्त किए हैं।
उनकी प्रमुख रचनाओं में कविताएं, उपन्यास जैसे ‘कल्लिक्कट्टु इथिहासम’ और ‘थन्नीर देशम’ शामिल हैं। तमिल साहित्य में उनकी रचनाएं भावनात्मक गहराई, सांस्कृतिक समृद्धि और विशिष्ट काव्य शैली के लिए प्रशंसित हैं। मार्च 2026 में, भारतीय ज्ञानपीठ ने उन्हें 2025 के लिए 60वां ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की घोषणा की, जो भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान है। यह पुरस्कार उन्हें तमिल भाषा के तीसरे प्राप्तकर्ता बनाता है (पहले अकिलन और जयकांतन को मिला है)। पुरस्कार में 11 लाख रुपये नकद, प्रमाण पत्र और देवी सरस्वती की कांस्य प्रतिमा शामिल है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन, कमल हासन और रजनीकांत जैसे हस्तियों ने उन्हें बधाई दी।
पुरस्कार की घोषणा के साथ ही आर. वैरमुथु से जुड़े #MeToo आरोप, हिंदू देवी-देवताओं पर कथित अपमानजनक टिप्पणियां और अन्य विवाद फिर से उभर आए हैं। कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या भारतीय ज्ञानपीठ की चयन समिति ने इन मुद्दों को नजरअंदाज किया, या क्या तमिल साहित्य में कोई अन्य योग्य लेखक नहीं था?
MeToo आरोप: महिलाओं की आवाजें
2018 में भारत के MeToo आंदोलन के दौरान वैरमुथु पर गंभीर यौन उत्पीड़न के आरोप लगे। प्रसिद्ध गायिका चिन्मयी श्रीपदा ने सबसे पहले खुलासा किया कि वैरमुथु ने उन्हें कई बार अनुचित तरीके से छुआ, करियर के बदले यौन संबंधों की मांग की और विदेशी कॉन्सर्ट के दौरान उत्पीड़न किया। चिन्मयी ने कहा कि वे तब युवा थीं और वैरमुथु को मेंटर मानती थीं, लेकिन उनका विश्वास टूट गया। उनके अलावा लगभग 17 महिलाओं ने आगे आकर आरोप लगाए- जिसमें ग्रोपिंग, जबरन चुंबन, ऑफिस में 18 साल की लड़की के साथ दुर्व्यवहार और करियर को ब्लैकलिस्ट करने की धमकियां शामिल हैं। एक रिपोर्ट में एक महिला ने बताया कि वैरमुथु ने अपने ऑफिस में उसे गले लगाकर चुंबन किया।
वैरमुथु ने इन आरोपों से इनकार किया और उन्हें राजनीतिक बदला बताया। चिन्मयी ने कानूनी कदम उठाए और 2019 में शिकायत दर्ज की गई। पुरस्कार की घोषणा पर चिन्मयी ने सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी: “2018 में कई महिलाओं ने एक कवि-गीतकार पर मोलेस्टेशन के आरोप लगाए थे। आज उसी व्यक्ति को ज्ञानपीठ मिल रहा है। महिलाओं की आवाज दबा दी गई। मैंने भारी कीमत चुकाई, बाकी महिलाओं ने अपने सपने छोड़ दिए।” उन्होंने रजनीकांत और कमल हासन की बधाई पर भी सवाल उठाया, कहा कि “क्या कई महिलाओं के ट्रॉमा से कोई फर्क नहीं पड़ता?”
अन्य कलाकारों जैसे टी.एम. कृष्णा ने कहा कि यह पुरस्कार वैरमुथु को वैधता देता है और पीड़ित महिलाओं को और हाशिए पर धकेलता है। लेखक बी. जेयमोहन ने तीखी आलोचना की, कहा कि वैरमुथु पुरस्कारों के लिए किसी के भी पैर चाट सकता है और वह शर्मनाक राजनीतिक अवसरवादी है।
हिंदू देवताओं पर विवादास्पद टिप्पणियां
वैरमुथु पर हिंदू विरोधी होने का आरोप भी लगता रहा है। 2018 में उन्होंने आंध्र (आंदल) पर विवादास्पद बयान दिया । आंदल की मूर्ति सभी श्रीवैष्णव मंदिरों में होती है, क्योंकि उन्हें अन्य अलवारों के साथ विष्णु की पत्नी श्री (लक्ष्मी) के अवतार के रूप में पूजा जाता है। वे 12 वैष्णव संतों में एकमात्र महिला हैं जिन्हें अलवार कहा जाता है।
वैरमुथु ने 7वीं शताब्दी की भक्त कवयित्री और अलवार संत को ‘देवदासी’ बताया, जो श्रीरंगम मंदिर में रहती और वहीं उनकी मृत्यु हुई। यह बयान हिंदू संगठनों को नागवार गुजरा, क्योंकि आंदाल को श्री विष्णु की भक्त और दिव्य रूप माना जाता है। वैरमुथु ने सफाई दी कि ‘देवदासी’ का मतलब ईश्वर की सेवा करने वाली महिला है, वेश्या नहीं, लेकिन विवाद बढ़ा। उन्होंने माफी मांगी, लेकिन कई लोगों ने इसे अपमानजनक माना।
एक अन्य घटना में, उन्होंने कंब रामायण पर व्याख्यान दिया, जिसमें राम को सीता से अलग होने पर ‘मानसिक असंतुलन’ में बताया और भारतीय दंड संहिता की धारा 84 (अस्वस्थ मन वाले व्यक्ति को अपराध से मुक्ति) से जोड़ा। उन्होंने कहा कि कंबन ने राम को ‘बचाया’ और उन्हें अपराधी से मानव बनाया। कई हिंदू समूहों ने इसे राम और आंडाल का अपमान माना। उन्होंने राम जन्मभूमि मंदिर पर भी सवाल उठाए और हाथरस स्टांपेड पर हिंदू रीति-रिवाजों का मजाक उड़ाया। 2021 में एक गीत में कथित तौर पर बाल यौन शोषण को रोमांटिक बनाया गया, जिसमें 16 साल की अभिनेत्री थी।
ज्ञानपीठ पुरस्कार और सवाल
भारतीय ज्ञानपीठ एक निजी संगठन है, जो भाषा सलाहकार समितियों और चयन बोर्ड के माध्यम से फैसला लेता है। पुरस्कार साहित्यिक योगदान पर आधारित है, लेकिन विवादों को नजरअंदाज करने पर सवाल उठे हैं। आलोचक कहते हैं: “क्या तमिल में कोई अन्य लेखक नहीं मिला? क्या #MeToo और धार्मिक भावनाओं को अनदेखा किया गया?”
पुरस्कार मां सरस्वती की प्रतिमा के साथ आता है, वह प्रतिमा, महिलाओं का अपमान करने और देवी आंदल के लिए अपशब्द कहने वाले को कैसे सौंपी जा सकती है? तमिल हिन्दुओं के लिए यह विडंबना से कम नहीं है।
वैरमुथु के समर्थक इसे साहित्यिक उपलब्धि मानते हैं और आरोपों को राजनीतिक बताते हैं। लेकिन पीड़ितों और आलोचकों के लिए यह संस्थागत विफलता है, जहाँ शक्ति और प्रभाव पुराने ‘शिकारी मानसिकता’ को बचाता है।
यह कहानी बताती है कि साहित्य और नैतिकता कैसे टकराते हैं। वैरमुथु की रचनाएं तमिल संस्कृति को विद्रूप करती हैं। वैरमुथु पर लगे आरोप और विवाद उनकी विरासत पर सवाल उठाते हैं। क्या पुरस्कार योग्यता का प्रमाण है या विवादों को धो देता है? समय बताएगा, लेकिन महिलाओं की आवाज़ें और धार्मिक भावनाएं अब भी गूंज रही हैं।
.

















