मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध के बीच जहां दुनियाभर के देशों के जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने पर रोक लगा दी गई है। वहीं भारतीय तेल टैंकरों को ईरान ने वहां से सुरक्षित तरीके से निकलने दिया। लेकिन, कुछ लोगों के मन में एक सवाल उठते हैं कि ये कैसे संभव हुआ। इस सवाल का जबाव खुद विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर ने दिया है। उन्होंने कहा कि उनके साथ बातचीत चल रही है और उसके कुछ नतीजे निकले हैं। अगर ऐसे ही नतीजे रहे तो हम बातचीत आगे भी करते रहेंगे।
क्या कहा विदेश मंत्री ने
विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर ने फाइनैंशियल टाइम्स को दिए साक्षात्कार में ये बातें कही। इस दौरान उन्होंने उन सवालों पर भी विराम लगा दिया, जिसमें ये कहा जा रहा था कि अगर ईरान ने भारत के जहाजों को निकलने दिया है तो कुछ तो लिया होगा। इस सवाल को लेकर विदेश मंत्री ने दो टूक कहा कि ये किसी भी प्रकार के आदान-प्रदान का मामला है ही नहीं। भारत और ईरान के बीच संबंध हैं। हम इस संघर्ष को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं।
उन्होंने ये भी कही कि भारत के नजरिए से बेहतर यही है कि हम आपस में तर्क-वितर्क करें, तालमेल बिठाएं और कोई समाधान निकालें। उन्होंने इस बात से साफ इनकार किया कि ईरान को बदले में कुछ दिया गया है।
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ईरान ने इजाजत क्यों दी?
मुख्य वजह भारत और ईरान के बीच पुराने संबंध और लगातार चल रही डिप्लोमैटिक बातचीत है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से लेन-देन का इतिहास रहा है, इसी आधार पर दिल्ली और तेहरान ने संपर्क किया। जयशंकर ने जोर दिया कि यह कोई डील या बदले की बात नहीं, बल्कि रिश्तों और संवाद पर आधारित है। ईरान ने भारतीय जहाजों को सुरक्षित गुजरने दिया, जबकि अमेरिका, यूरोप या इजरायल से जुड़े जहाजों पर पाबंदी बनी हुई है।
हालांकि, विदेश मंत्री का ये भी कहना था कि यह शुरुआत भर है। वहां और भी कई भारतीय जहाज हैं, इसलिए बातचीत जारी रखनी होगी। प्रक्रिया चल रही है और हर कदम पर अलग से देखा जा रहा है। भारत इस पूरे संघर्ष को दुर्भाग्यपूर्ण मानता है और डिप्लोमेसी से ही समाधान निकालना चाहता है।

















