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जानिए क्यों मां कर्मा की खिचड़ी भगवान जगन्नाथ के लिए सबसे प्रिय है?

मां कर्मा रोज सुबह उठकर सबसे पहले भगवान मुरार अर्थात् जगन्नाथ प्रभु के लिए खिचड़ी बनाती थी। वे इतनी भोली और भावुक भक्त थीं कि उन्हें विधि-विधान या मंत्रों का ज्ञान नहीं था। वे बस भगवान को पुकारतीं और कहतीं-  "प्रभु, आओ और भोग लगाओ।"

Written byडॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानीडॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी — edited by Mahak Singh
Mar 15, 2026, 11:02 am IST
in भारत
भगवान जगन्नाथ

भगवान जगन्नाथ

भारतीय संस्कृति में लोकदेवियों और लोकदेवताओं का विशेष महत्व रहा है। ये केवल किसी एक समाज के नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय समाज के प्रेरणा-स्रोत होते हैं। ऐसी ही महान लोकदेवी हैं भक्त शिरोमणि मां कर्मा। कर्मा बाई की जयंती चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को समूचे देश में मनाई जाती है।

“कर्मा जैसी भक्ति कर, खिचड़ी खायें मुरार, छप्पन भोग को त्याग कर, आये भक्त के द्वार।”

मां कर्मा रोज सुबह उठकर सबसे पहले भगवान मुरार अर्थात् जगन्नाथ प्रभु के लिए खिचड़ी बनाती थी। वे इतनी भोली और भावुक भक्त थीं कि उन्हें विधि-विधान या मंत्रों का ज्ञान नहीं था। वे बस भगवान को पुकारतीं और कहतीं-  “प्रभु, आओ और भोग लगाओ।” उनकी भक्ति इतनी भावप्रबल थी कि स्वयं भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) बालक का रूप धरकर उनके घर आते और बड़े चाव से वह खिचड़ी खाते थे।

प्रेम भाव की खिचड़ी

एक बार किसी विद्वान संत ने देखा कि कर्मा बाई बिना स्नान किए, बिना शुद्धता के नियमों का पालन किए ही खिचड़ी बनाकर भगवान को खिला रही हैं। उन्होंने कर्मा बाई को डांटा और कहा, “अरी पगली! भगवान को ऐसे भोग नहीं लगता। पहले स्नान करो, पवित्र हो, मंत्र पढ़ो, तब भोग लगाओ।” अगले दिन कर्मा बाई ने डर के मारे स्नान किया, विधि-विधान में समय लगाया और खिचड़ी बनाने में देर हो गई। उधर पुरी के मंदिर में जब भगवान के भोग का समय हुआ, तो पुजारियों ने देखा कि भगवान की मूर्ति के मुख पर खिचड़ी के कण लगे हुए हैं और भगवान के होंठों पर एक संतोष वाली मुस्कान है। इसके बाद भगवान ने मंदिर के पुजारी को सपने में दर्शन दिए और कहा, “मुझे कर्मा के प्रेम की खिचड़ी भाती है, तुम्हारे सूखे नियमों की नहीं। वह देर से आई तो मैं खुद उसके पास भोजन करने चला गया।”

मां कर्मा के मंदिर के सामने रुकता है श्री जगन्नाथ स्वामी का रथ

आज भी पुरी में होने वाली दिव्य जगन्नाथ रथ यात्रा में भगवान का रथ मां कर्मा के मंदिर के सामने रुकता है व उनकी खिचड़ी खाकर ही आगे बढ़ता है। इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया कि ईश्वर को आडंबर, वैभव नहीं, बल्कि सच्चा प्रेम और भक्ति प्रिय होते हैं। मां कर्मा की यह कथा आज भी लोगों को यह सिखाती है कि श्रद्धा और निष्कपट भाव से किया गया छोटा-सा कार्य भी ईश्वर को प्रिय होता है।

साहू समाज की कुलदेवी हैं मां कर्मा

साहू / तैलिक समाज मां कर्मा को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजता है, परंतु उनके आदर्श समस्त हिंदू समाज के लिए समान रूप से प्रेरणादायी व पूजनीय हैं। लोककथाओं और जनश्रुतियों के अनुसार उनका जीवन अत्यंत सरल और ईश्वर के प्रति समर्पित था। उन्होंने यह संदेश दिया कि सच्ची भक्ति केवल मंदिरों में पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह कर्म, सेवा और समाज के प्रति दायित्व निभाने में प्रकट होती है। उनके नाम में ही “कर्म” शब्द जुड़ा है, जो जीवन में सत्कर्म, श्रम व उद्यम की महत्ता का प्रतीक है। मां कर्मा का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि श्रम और स्वाभिमान मनुष्य के सबसे बड़े आभूषण हैं। साहू / तैलिक समाज परंपरागत रूप से परिश्रम, व्यापार और सेवा के लिए जाना जाता है। इस समाज में एक कहावत प्रचलित है-
“तैलिक का तेल और साहू का सौदा, दोनों मेहनत से ही चमकते हैं।”

कर्म ही पूजा है का संदेश

मां कर्मा के जीवन में भी यही भाव दिखाई देता है। उन्होंने समाज को सिखाया कि कर्म ही पूजा है और श्रम ही सबसे बड़ा धर्म है। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि यदि व्यक्ति अपने कार्य को ईमानदारी और समर्पण से करता है, तो वही उसका सबसे बड़ा साधना-पथ बन जाता है। मां कर्मा केवल साहू समाज की देवी नहीं हैं, वे समूचे सनातनी समाज की आराध्य हैं। वे सामाजिक समरसता की भी प्रतीक हैं। उनके जीवन में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था। यही कारण है कि उनकी जयंती केवल एक समाज का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का पर्व बन गई है।

आज देश के विभिन्न राज्यों जैसे, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, झारखंड और महाराष्ट्र में मां कर्मा जयंती बड़े उत्साह से मनाई जाती है। यह उत्सव केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और सेवा का भी माध्यम है। साहू समाज में एक और कहावत कही जाती है-

साहू का शुद्ध सच्चा है तौल
तब ही तो है समाज का मोल   

उनकी कथा यह भी सिखाती है कि समाज की शक्ति उसकी एकता में होती है। यदि समाज के लोग आपसी सहयोग, विश्वास और परिश्रम के साथ आगे बढ़ें, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रहता। मां कर्मा का जीवन इस सत्य का प्रतीक है कि साधारण जीवन जीते हुए भी असाधारण आदर्श स्थापित किए जा सकते हैं।

मूल्यों को स्मरण करने का दिन

मां कर्मा जयंती केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह अपने मूल्यों और आदर्शों को स्मरण करने का अवसर है। यह दिन हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में सेवा, परिश्रम और भक्ति को स्थान दें। समाज के युवा वर्ग के लिए यह अवसर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्हें अपने इतिहास और परंपराओं से जुड़ने का मौका मिलता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि माँ कर्मा के आदर्शों को केवल पूजा-अर्चना तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें अपने जीवन में उतारा जाए। यदि हम उनके संदेश- सत्य, श्रम, भक्ति और समरसता- को अपनाएँ, तो हमारा समाज और राष्ट्र दोनों ही अधिक सशक्त और समृद्ध बन सकते हैं।

Topics: work is worshipsocial unity and devotionfolk deities in Indian cultureMother Karmafolk goddessfamily deity of the Sahu communityMother Karma Jayantidevotee Shiromani Karma Baidevotion to Lord JagannathKhichdi of love
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
मूलतः मध्य प्रदेश के बैतूल से हैं. छह पुस्तकों का लेखन एवं दो पुस्तकों का संपादन. 'जनसंख्या असंतुलन एक चुनौती' एवं 'कांग्रेस मुक्त भारत की अवधारणा' विशेष तौर पर चर्चित. कविता संग्रह 'स्वप्न ही तो है कविता', साहित्य अकादमी से सम्मानित. विदेश मंत्रालय भारत सरकार में सलाहकार, छिंदवाड़ा यूनिवर्सिटी में कार्य परिषद् सदस्य रह चुके हैं. [Read more]
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