तमिलनाडु में आगामी विधानसभा चुनाव नई दिशा में बढ़ता दिख रहा है। यह बदलाव कांग्रेस पार्टी नीत सेक्युलर प्रोग्रेसिव गठबंधन (एसपीए) में देखने को मिल रहा है। यह गठबंधन आपसी स्वार्थ के कारण टूटने की कगार पर पहुंच चुका है। दो प्रमुख दल कांग्रेस और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) में सीटों के बंटवारे को लेकर कलह है और गठबंधन के टूटने की सिर्फ घोषणा बाकी है।
कांग्रेस का नहीं बचा जनाधार
तमिलनाडु में 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-द्रमुक नीत सेक्युलर प्रोग्रेसिव गठबंधन, भाजपा-अन्नाद्रमुक नीत एनडीए से महज चार प्रतिशत मतों से आगे था। कुल मतों की संख्या में सेक्युलर प्रोग्रेसिव गठबंधन एनडीए से महज 21 लाख मतों से आगे था। ऐसा कयास लगाया जा रहा है कि द्रमुक का कांग्रेस के जनाधार पर विश्वास समाप्त हो चुका है। वहीं कांग्रेस को आभास है कि द्रमुक सरकार के खिलाफ इतनी सत्ता विरोधी लहर है कि वह राज्य में अपनी शेष ताकत को भी समाप्त कर लेगी। इसलिए दोनों दल एक-दूसरे से पीछा छुड़ाना चाहते हैं। कांग्रेस अपनी जमीनी ताकत से अधिक सीटों की मांग कर रही है तो द्रमुक कम सीट देना चाहती है।

विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन
दरअसल स्टालिन नीत द्रमुक के सामने कांग्रेस पार्टी का अन्य राज्यों के चुनावी प्रदर्शन है, जिसमें वह सहयोगियों के लिए घाटे का कारण बनती दिख रही है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने नेशनल कांफ्रेंस से 38 सीटें गठबंधन में ली जो कुल सीटों का 43 प्रतिशत था, मगर कांग्रेस महज 6 सीट जीत सकी। चुनाव बाद नेशनल कांफ्रेंस ने खुद और निर्दलीयों के बूते सरकार बनाई। जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने पूरे मन से चुनाव प्रचार भी नहीं किया और नेशनल कांन्फ्रेंस प्रमुख फ़ारूक़ अब्दुल्ला को चुनाव मध्य में यह बयान जारी करना पड़ा की राहुल गांधी को अपनी सीटों पर जम्मू संभाग में ज्यादा चुनाव प्रचार करना चाहिए।
बिहार विधानसभा चुनाव ने दिया संकेत
बिहार में कांग्रेस ने राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन में अपनी ताकत से लगभग दोगुनी सीटें आवंटित करवाई और 61 सीटों पर चुनाव लड़कर महज 6 सीट जीत सकी। चुनाव बाद राजद के कई बड़े नेताओं ने कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने और अधिक सीटों के आवंटन को पार्टी के लिए घातक बताया। इसलिए स्टालिन भी कांग्रेस के साथ सावधानी से आगे बढ़ना चाहते हैं।
क्या विजय की पार्टी से होगा समझौता
कांग्रेस पार्टी द्रमुक को भय दिखा रही है कि वह अभिनेता विजय थलपति की नई पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम के साथ गठबंधन कर सकती है। तमिलगा वेत्री कझगम का आधार वोट मुख्यतः द्रमुक और उसके गठबंधन का ही है। कांग्रेस को इस बात की टीस है कि स्टालिन ने कभी भी उनकी पार्टी को उचित सम्मान नहीं दिया और हमेशा दोयम दर्जे की पार्टी बना कर रखा।
द्रमुक, कांग्रेस पार्टी के साथ सत्ता की हिस्सेदारी नहीं करती है। इसलिए कांग्रेस के बड़े वर्ग, विरुद्धनगर के सांसद मणिकम टैगोर और वरिष्ठ नेता प्रवीण चक्रवर्त्ती का मानना है कि आगामी चुनाव में विजय थलपति की तमिलगा वेत्री कझगम के साथ गठबंधन किया जाए। इससे कांग्रेस को राज्य में दूरगामी राजनीतिक लाभ मिलता दिख रहा है। सबसे पहले तमिलगा वेत्री कझगम के साथ गठबंधन की स्थिति में कांग्रेस को अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने का मौका मिलेगा। वह चुनाव पूर्व सत्ता में हिस्सेदारी का समझौता करके अपने कार्यकर्ताओं को उत्साहित कर सकती हैं
द्रमुक चली जाएगी हाशिये पर
अगर कांग्रेस तमिलगा वेत्री कझगम के साथ गठबंधन कर लेती है तो 2026 का विधानसभा चुनाव भाजपा-अन्नाद्रमुक नीत एनडीए और कांग्रेस पार्टी-तमिलगा वेत्री कझगम गठबंधन के बीच होगा और द्रमुक पूरी तरह से हाशिये पर चली जाएगी। कांग्रेस के तमिलनाडु इकाई के कार्यकर्ता द्रमुक पार्टी के द्वारा गठबंधन में बहुत कम सीटों का आवंटन और सत्ता में साझेदारी नहीं करने के कारण उदास हैं। कांग्रेस का सेक्युलर प्रोग्रेसिव गठबंधन में बने रहने की स्थिति में भी इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उसके कार्यकर्ता द्रमुक की ताकत को कम करने के लिए उसके खिलाफ अन्य दल को मतदान करें। एनडीए के लिए कांग्रेस और तमिलगा वेत्री कझगम में गठबंधन राजनीतिक तौर पर ज्यादा मुफीद रहेगा।
















