केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में आगामी विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी अपने सहयोगी दल ऑल इंडिया एन आर कांग्रेस के साथ फिर से बड़े बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की ओर मजबूती से बढ़ रही है। भाजपा पुडुचेरी में भी अन्य प्रदेशों की तरह ही गठबंधन धर्म का पालन करते हुए एन. रंगास्वामी की पार्टी ऑल इंडिया एन आर कांग्रेस के साथ पूरे पाँच साल सरकार के कार्यकाल के बाद गठबंधन में चुनावी मैदान में उतरने जा रही है।
गठबंधन धर्म निभाने में भाजपा की भूमिका
भाजपा ने पुडुचेरी सरकार में उपमुख्यमंत्री पद या मुख्यमंत्री के क्रमवार पद की मांग किए बिना पूरे पाँच साल सरकार में शामिल रहकर जनसेवा की भावना से काम किया। भाजपा पूरे देश में कभी भी अपने सहयोगी दलों से सत्ता के लिए या चुनाव में अधिक सीटों के लिए दबाव नहीं बनाती है। भाजपा ने क्रमवार मुख्यमंत्री पद के बदलाव वाले राज्यों में भी अधिक सीट होने के बावजूद मुख्यमंत्री पद पहले अपने सहयोगी दल को दिया है।
उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में गठबंधन की मिसाल
1997 में उत्तर प्रदेश में मायावती की पार्टी के साथ इस तरह के गठबंधन में बसपा से लगभग ढाई गुनी सीट होने के बावजूद भी भाजपा ने पहले मायावती को मुख्यमंत्री का पद सौंपा। 2006 में कर्नाटक में जनता दल (सेक्युलर) के साथ क्रमवार मुख्यमंत्री पद वाले समझौते की स्थिति में पहले एच. डी. कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री का पद सौंपा गया, जबकि भाजपा के पास जेडीएस से अधिक सीटें थीं।
जम्मू-कश्मीर में भी सहयोगी दल को प्राथमिकता
जम्मू-कश्मीर में 2014 में पीडीपी के साथ गठबंधन की स्थिति में भाजपा ने मुख्यमंत्री का पद सहयोगी दल को सौंपा और क्रमवार मुख्यमंत्री पद की मांग भी नहीं की। यह तब हुआ जब भाजपा ने 2014 के विधानसभा चुनाव में जम्मू-कश्मीर में पीडीपी से अधिक मत प्राप्त किए थे। अतः भाजपा हमेशा राजनीतिक फैसले जनहित में लेती है और अपने सहयोगियों पर पद के लिए दबाव नहीं बनाती।
पुडुचेरी में भाजपा का चुनावी प्रदर्शन
पुडुचेरी में भी भाजपा ने 2021 के विधानसभा चुनाव में अन्य प्रदेशों की तरह शानदार प्रदर्शन करते हुए गठबंधन में 9 सीटों पर चुनाव लड़कर 6 सीटें जीतने में सफलता प्राप्त की थी। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी अन्य राज्यों की तरह न्यूनतम प्रदर्शन करते हुए 2016 विधानसभा चुनाव में 15 सीटें जीतने के बाद 2021 में महज दो सीटों पर सिमट गई थी।

अन्य राज्यों में भी सहयोगियों को मजबूत करने की नीति
भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में झारखंड में अपनी मजबूत सीट गिरिडीह, जिसे पार्टी ने 1996 के बाद केवल एक बार 2004 में हारी थी, वह सीट अपने सहयोगी आजसू को दी थी। बिहार में 2019 लोकसभा चुनाव में अपनी पाँच जीती हुई सीटें अपने सहयोगी नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड को दे दीं, ताकि अपने सहयोगी को भी मजबूत बनाया जा सके। भाजपा अपने सहयोगियों के मजबूत होने को खुद को मजबूत समझने की नीति पर काम करती है।
पुडुचेरी का तमिलनाडु की राजनीति पर प्रभाव
पुडुचेरी राजनीतिक तौर पर काफी महत्वपूर्ण प्रदेश है और इसका सीधा असर तमिलनाडु की राजनीति पर पड़ता है। एम. जी. रामचंद्रन के नेतृत्व में 1972 में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम से अलग होकर अपनी पार्टी अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) बनाने के बाद इस दल की पहली सरकार 1974 में पुडुचेरी में बनी थी।
पुडुचेरी की जीत का तमिलनाडु चुनाव पर असर
पुडुचेरी की 1974 की चुनावी विजय के बाद 1977 में हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में एआईएडीएमके ने 1967 से तमिलनाडु में सत्तारूढ़ डीएमके को चुनाव में बुरी तरह पराजित किया था। एआईएडीएमके की इस जीत में पुडुचेरी की जीत की बड़ी भूमिका थी, क्योंकि इस जीत ने तमिलनाडु के मतदाताओं को एआईएडीएमके के पक्ष में मतदान करने के लिए प्रेरित किया था।
तमिलनाडु में आगामी चुनाव और संभावित समीकरण
तमिलनाडु का आगामी विधानसभा चुनाव भी 1977 की तरह आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा एआईएडीएमके और कुछ अन्य सहयोगी दलों के साथ गठबंधन में सत्तारूढ़ डीएमके को कड़ी चुनौती देते हुए सत्ता में आने के लिए मजबूत दावेदारी कर रही है। इतना ही नहीं, बल्कि तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी का डीएमके के साथ गठबंधन टूटने के कगार पर है और इसका सीधा असर पुडुचेरी की राजनीति में देखने को मिलेगा।
कांग्रेस के संभावित अलग चुनाव लड़ने की स्थिति
अगर तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी का गठबंधन टूटता है तो कांग्रेस पार्टी पुडुचेरी में भी अपने बूते या अन्य छोटे दलों के साथ चुनाव लड़ सकती है।

















