महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि उस परम सत्य की स्मृति का दिवस है, जो सृष्टि के मूल में स्पंदित है ,वह सत्य है शिव। शिव केवल एक देवता नहीं, बल्कि समस्त अस्तित्व का आधार, चेतना का स्रोत और ब्रह्मांड की मौलिक शक्ति हैं। सृष्टि का आरंभ हो या उसका संहार, जीवन की चेतना हो या प्रकृति की निस्तब्धता—सबके मूल में वही शिव स्थित हैं। शिव विरोधों के अद्भुत समन्वय हैं वे रुद्र भी हैं और भोलेनाथ भी, संहारक भी और करुणामय भी।
मृत्युंजय शिव आत्मा की अमरता का बोध कराते हैं और भय से मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं। उपनिषदों के अनुसार शिव चेतना की चतुर्थ अवस्था शिव-तत्त्व हैं, जहाँ पूर्ण शांति, अद्वैत और अनंतता का अनुभव होता है। शिव कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि प्रत्येक प्राणी के भीतर विद्यमान वही दिव्य, शाश्वत चेतना हैं। वही समुद्र मंथन के विष को धारण कर नीलकण्ठ बने, वही मस्तक पर चन्द्र धारण कर चन्द्रशेखर हुए, और वही योगी बनकर समाधि में ब्रह्म के रहस्य को प्रकट करते हैं।
वेदों में शिव का मूल स्वरूप : रुद्र के रूप में परम सत्ता
वैदिक साहित्य में रुद्र को भयावह और कल्याणकारी दोनों स्वरूपों में वर्णित किया गया है। यजुर्वेद (१६.२) का प्रसिद्ध मंत्र है “या ते रुद्र शिवा तनूरघोरापापकाशिनी । तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि ॥” इस मंत्र में रुद्र को शिवा तनू अर्थात् कल्याणकारी स्वरूप वाला कहा गया है। यहां शिव शब्द विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुआ है, जिसका अर्थ है, मंगलकारी, कल्याणकारी। इसी प्रकार श्वेताश्वतर उपनिषद में कहा गया है “एको हि रुद्रो द्वितीयो नास्ति” अर्थात् केवल रुद्र ही एक हैं, उनके अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं। यजुर्वेद में शिव को समस्त प्रकृति में विद्यमान बताया गया है “नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च।” इस मंत्र में शिव के प्रमुख नाम मिलते हैं जैसे शम्भु – सुख देने वाला , शंकर – कल्याण करने वाला , शिव – मंगलकारी।
धनुर्धारी, नीलकण्ठ, पशुपति और जटाधारी शिव का वैदिक आधार
धनुर्धारी शिव -यजुर्वेद में रुद्र को धनुष और बाण धारण करने वाला बताया गया है ,“अवतत्य धनुष्ट्वं सहस्राक्ष शतेषुधे” यह आगे चलकर शिव के पिनाकधारी स्वरूप का आधार बना। नीलकण्ठ शिव -यजुर्वेद (१६.७) में रुद्र को नीलग्रीव कहा गया है “असौ योऽवसर्पति नीलग्रीवो विलोहितः” यही नीलग्रीव आगे चलकर पौराणिक शिव के नीलकण्ठ स्वरूप में विकसित हुआ। पशुपति शिव -यजुर्वेद में शिव को पशुपति कहा गया है नमो पशुपतये च” पशुपति का अर्थ है , समस्त जीवों का स्वामी। यह शिव के सार्वभौमिक स्वरूप को दर्शाता है। जटाधारी शिव – यजुर्वेद में रुद्र को “कपर्दिन” कहा गया है “नमः कपर्दिने च” कपर्दिन का अर्थ है ,जटाधारी। यह शिव के योगी स्वरूप का वैदिक आधार है।
शिव : वैद्य और रोगनाशक
यजुर्वेद में रुद्र को दिव्य वैद्य कहा गया है “प्रथमो दैव्यो भिषक्” अर्थात् रुद्र प्रथम दिव्य वैद्य हैं। वे रोगों का नाश करते हैं और स्वास्थ्य प्रदान करते हैं।
अथर्ववेद और उपनिषदों में शिव : परब्रह्म की अवधारणा
अथर्ववेद और उपनिषदों में शिव को परब्रह्म के रूप में स्थापित किया गया है। कैवल्य उपनिषद में कहा गया है “स ब्रह्मा स शिवः स हरिः” अर्थात् वही ब्रह्मा है, वही शिव है, वही विष्णु है। यह स्पष्ट करता है कि शिव ही परम ब्रह्म हैं।
पंचब्रह्म उपनिषद में शिव का ब्रह्म स्वरूप
पंचब्रह्म उपनिषद में शिव को पांच रूपों में वर्णित किया गया है सद्योजात – सृष्टि का कारण , वामदेव – संरक्षण का कारण , अघोर – संहार का कारण। तत्पुरुष – आत्मा का स्वरूप , ईशान – परम ब्रह्म का स्वरूप। यह स्पष्ट करता है कि सृष्टि, स्थिति और संहार तीनों शिव के अधीन हैं।
शिव और ब्रह्म : अद्वैत दर्शन
उपनिषदों के अनुसार शिव और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। शिव ही ब्रह्म हैं, आत्मा हैं और समस्त अस्तित्व के आधार हैं। उपनिषद का महावाक्य “सोऽहम्” अर्थात् मैं वही हूँ यह शिव और आत्मा की एकता को दर्शाता है।
एकादश रुद्र : शिव की ग्यारह ब्रह्मांडीय शक्तियों का दार्शनिक स्वरूप
देवताओं की रक्षा और ब्रह्मांडीय संतुलन की पुनर्स्थापना हेतु भगवान शिव ने स्वयं को ग्यारह रूपों में प्रकट किया, जिन्हें एकादश रुद्र कहा जाता है। ये रुद्र महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी सुरभि से उत्पन्न हुए । ग्यारह रुद्रों के नाम हैं कपाली वैराग्य और मृत्यु के सत्य का बोध कराते हैं, पिंगल जीवन ऊर्जा और सूर्य शक्ति के प्रतीक हैं, भीम अद्वितीय बल और संरक्षण के अधिष्ठाता हैं, विरूपाक्ष सर्वदृष्टा चेतना का स्वरूप हैं, विलोहित अग्नि और शुद्धि के प्रतीक हैं। शास्ता ज्ञान और धर्म के गुरु हैं, अजपाद योग और निराकार चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं, अहिर्बुध्न्य ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्यों के संरक्षक हैं, शम्भु शांति और कल्याण के स्रोत हैं, चण्ड अधर्म के विनाशक हैं और भव सृष्टि, जीवन और अस्तित्व के आधार हैं।
विश्वव्यापी शिव : द्वादश ज्योतिर्लिंग से पंचमहाभूत और भारत के बाहर स्थित शिव मंदिरों तक
गुड्डी मल्लम शिवलिंग (आंध्र प्रदेश) से 6 फीट ऊंचा और 1 फुट व्यास वाला दुनिया का पहला मानवाकार अर्धनारेश्वर लिंगम माना जाता है। सिंधु घाटी सभ्यता के मोहनजो-दारो से मिली ‘पशुपति मुहर’ पर जिसमें तीन सिर वाले देवता को पशुओं के स्वामी के रूप में दिखाया गया है। भारत में द्वादश ज्योतिर्लिंग शिव के बारह दिव्य प्रकाश-स्वरूपों के रूप में प्रतिष्ठित हैं, सोमनाथ, काशी विश्वनाथ, महाकालेश्वर, केदारनाथ, रामेश्वरम् आदि जो शिव की अनंत चेतना के केंद्र माने जाते हैं। इसी प्रकार दक्षिण भारत में स्थित पंचमहाभूत स्थल शिव के उस स्वरूप को प्रकट करते हैं, जिसमें वे प्रकृति के पाँच मूल तत्त्वों में एकाम्बरेश्वर मंदिर कांचीपुरम (पृथ्वी तत्त्व) , जम्बुकेश्वर मंदिर तिरुवनैकवल (त्रिची के पास) (जल तत्त्व) , अरुणाचलेश्वर मंदिर तिरुवन्नामलाई (अग्नि तत्त्व) , श्री कालहस्तीश्वर मंदिर श्रीकालहस्ती (वायु तत्त्व) और थिल्लई नटराज मंदिर चिदंबरम (आकाश तत्त्व) है। ये मंदिर इस सत्य को व्यक्त करते हैं कि समस्त सृष्टि इन पाँच तत्त्वों से बनी है और इन तत्त्वों के मूल में स्वयं शिव ही स्थित हैं।
भारत के बाहर प्रमुख शिव मंदिर : वैश्विक शिव चेतना के केंद्र
पशुपतिनाथ मंदिर, काठमांडू (नेपाल) – यह मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है प्रम्बानन मंदिर, जावा (इंडोनेशिया) – 9वीं शताब्दी में निर्मित प्रम्बानन मंदिर इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर है। काटासराज मंदिर, पंजाब (पाकिस्तान) -पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित काटासराज मंदिर महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है। मुन्नेश्वरम् मंदिर, श्रीलंका – मान्यता है कि रावण वध के पश्चात भगवान राम ने यहाँ शिव की आराधना कर प्रायश्चित किया। अरुल्मिगु श्री राजाकलियम्मन मंदिर, मलेशिया , श्री सोमेश्वर मंदिर, नॉर्थ कैरोलिना (अमेरिका) पश्चिम का कैलाश कहा जाता है। ,शिव-विष्णु मंदिर, मेलबर्न (ऑस्ट्रेलिया) , मुक्ति गुप्तेश्वर मंदिर, ऑस्ट्रेलिया ,शिव मंदिर, ज्यूरिख (स्विट्जरलैंड) , मध्य कैलाश मंदिर, दक्षिण अफ्रीका , शिव मंदिर, मस्कट (ओमान) अदि है।
आधुनिक विज्ञान और शिव का नटराज स्वरूप
आधुनिक विज्ञान भी शिव की इस अवधारणा से गहरे स्तर पर जुड़ा हुआ दिखाई देता है। इसका सबसे सजीव उदाहरण स्विट्ज़रलैंड स्थित विश्व की प्रसिद्ध भौतिकी प्रयोगशाला सर्न (CERN) में स्थापित भगवान शिव के नटराज रूप की मूर्ति है। सर्न परिसर में स्थापित लगभग 2 मीटर ऊँची नटराज की यह कांस्य प्रतिमा भारत सरकार द्वारा 2004 में भेंट की गई थी। प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी फ्रिटजॉफ कैप्रा ने अपनी पुस्तक द ताओ ऑफ़ फिजिक्स (The Tao of Physics) में लिखा है कि शिव का यह कॉस्मिक डांस आधुनिक भौतिकी की उस अवधारणा से मेल खाता है, जिसमें ब्रह्मांड निरंतर ऊर्जा के कंपन और परिवर्तन से संचालित होता है। क्वांटम फील्ड थ्योरी के अनुसार, ब्रह्मांड के सूक्ष्मतम कण निरंतर गति और ऊर्जा के नृत्य में संलग्न रहते हैं। यह प्रक्रिया ही सृष्टि के निर्माण और विनाश का आधार है। नटराज का नृत्य इसी वैज्ञानिक सत्य का प्रतीक है कि ब्रह्मांड स्थिर नहीं, बल्कि निरंतर परिवर्तनशील है।
हर हर महादेव।













