फरवरी के प्रथम सप्ताह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले दक्षिण असम प्रांत के प्रवास पर रहे। इस दौरान उन्होंने संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लिया। 6 फरवरी को रामकृष्ण नगर में आयोजित प्रबुद्ध नागरिक सम्मेलन में उन्होंने कहा कि एक समय भारतवर्ष ‘सोने की चिड़िया’ के नाम से विश्वभर में प्रसिद्ध था। अनेक आक्रमणों और संघर्षों के बावजूद भारत एक पुण्यभूमि रहा है, जहां ऋषि-मुनियों की परंपरा विकसित हुई और भगवान श्रीराम व श्रीकृष्ण का अवतार हुआ है।
भारत की समृद्ध संस्कृति, साहित्य, संगीत एवं कला परंपरा पर सरकार्यवाह जी ने कहा कि नई शिक्षा नीति में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ को शामिल किया जाना, एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी कदम है। 7 फरवरी को हैलाकांडी स्थित श्रीकृष्ण सरदा कॉलेज खेल मैदान में ‘विशाल हिंदू सम्मेलन एवं वैदिक शांति यज्ञ’ का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर श्री दत्तात्रेय होसबाले ने हिंदू समाज से एकजुट रहने का आह्वान किया तथा पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण से बचने की सलाह दी। उन्होंने अपने सांस्कृतिक मूल्यों, परंपराओं और आचार-विचार को अपनाकर एक नवसृजित, मूल्य-आधारित समाज के निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया। 7 फरवरी की शाम को सिल्चर के गुरुचरण विश्वविद्यालय के प्रेक्षागृह में प्रमुख नागरिक सम्मेलन का आयोजन हुआ।
इसे संबोधित करते हुए श्री दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि राष्ट्र निर्माण में सजग, चरित्रवान और जिम्मेदार नागरिकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले सौ वर्ष से समाज को एकजुट कर राष्ट्र निर्माण के इसी लक्ष्य के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। 8 फरवरी को सिल्चर के सुभाष नगर मैदान में स्वयंसेवकों का नगर एकत्रीकरण हुआ।
अपने उद्बोधन में श्री होसबाले ने कहा कि संघ का अर्थ ही शाखा है और शाखा ही संघ है। शाखा व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला है। उन्होंने स्वयंसेवकों से आह्वान किया कि प्रत्येक स्वयंसेवक को शाखामुखी होना चाहिए तथा संघ को समझने के लिए नियमित रूप से शाखा में आना आवश्यक है। सरकार्यवाह जी ने स्वयंसेवकों के व्यक्तित्व निर्माण, चरित्र विकास एवं संगठन की सुदृढ़ता पर बल दिया।

















