कट्टरता की कोई सीमा नहीं है। पेशा वकील का, लेकिन फिर भी कानून का कोई खौफ नहीं है। मामला एक मुस्लिम वकील से जुड़ा है, जिसने अपनी पत्नी को तलाक ए हसन देने की कोशिश की। हालांकि अब सुप्रीम कोर्ट ने वकील के तलाक-ए-हसन देने के दो प्रयासों को फिलहाल रोक दिया है। अदालत ने दोनों पक्षों को आपसी समझौते के लिए मध्यस्थता में भेज दिया है, ताकि वैवाहिक विवाद सुलझ सके।
मामला क्या है
यह पूरा विवाद एक महिला बेनज़ीर हिना से जुड़ा है, जो पत्रकार हैं। उन्होंने 2022 में एक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) दायर की थी, जिसमें तलाक-ए-हसन की वैधता पर सवाल उठाया गया। उनका दावा है कि उनके पति, जो खुद एक प्रैक्टिसिंग एडवोकेट हैं, ने 2022 में तलाक-ए-हसन के जरिए उन्हें तलाक दिया और उसके बाद दूसरी शादी कर ली। पत्नी का कहना है कि इस तलाक से उन्हें बहुत मुश्किल हुई, क्योंकि इसमें कोई भरण-पोषण का प्रावधान नहीं था। वे फिर से शादी भी नहीं कर पाईं। तलाक का नोटिस पति के वकील के जरिए भेजा गया था, लेकिन महिला का आरोप है कि यह तरीका गलत था और मुस्लिम पर्सनल लॉ के हिसाब से वैध नहीं।
एक दूसरी याचिका भी जुड़ी हुई है, जिसमें दिल्ली की आसमा नाम की महिला ने अपने पति मोहम्मद अंशार के खिलाफ तलाक-ए-हसन को अवैध बताने की मांग की। अदालत ने अंशार को नोटिस जारी किया था, लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया, इसलिए कोर्ट ने करावल नगर के एसएचओ को अगली सुनवाई में उन्हें पेश करने का आदेश दिया।
अदालत की बेंच और सुनवाई
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की बेंच ने की। बेंच ने कहा कि ऐसे संवेदनशील मामलों में पक्षों को आपस में बात करके सुलझाना बेहतर है। उन्होंने दोनों पक्षों को मध्यस्थता के लिए भेज दिया और पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज कुरियन जोसेफ को मध्यस्थ बनाया। जस्टिस कुरियन जोसेफ वही जज हैं, जो 2017 में ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक घोषित करने वाली संविधान बेंच में शामिल थे।
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अदालत ने साफ कहा कि अभी तलाक-ए-हसन की वैधता पर कोई अंतिम राय नहीं दी जा रही है। न ही यह कहा गया कि यह मुस्लिमों में तलाक का अवैध तरीका है। बस इतना जोर दिया कि दोनों पक्ष मिल-बैठकर कोई रास्ता निकालें और वैवाहिक विवाद सुलझाएं।
दोनों पक्षों के वकीलों के तर्क
बेनज़ीर हिना की तरफ से वकील रिज़वान अहमद ने कहा कि तलाक-ए-हसन मुस्लिम महिलाओं को आर्थिक रूप से कमजोर छोड़ देता है, क्योंकि इसमें मेहर या भरण-पोषण का कोई पक्का इंतजाम नहीं होता। उन्होंने दावा किया कि पति ने जानबूझकर गलत एड्रेस पर नोटिस भेजे ताकि वे डिलीवर न हों। पति की तरफ से वकील एम आर शम्साद ने कहा कि पहला तलाक वैध था और दूसरा प्रयास भी मुस्लिम पर्सनल लॉ के दायरे में है। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि ऐसा कोई इंप्रेशन न बने कि तलाक-ए-हसन मुस्लिमों में गैर-कानूनी है।
तलाक-ए-हसन क्या होता है
तलाक-ए-हसन मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक का एक तरीका है। इसमें पति तीन बार ‘तलाक’ कहता है, लेकिन हर बार एक महीने के अंतराल पर। यह ट्रिपल तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) से अलग है, जिसे 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया था और 2019 में कानून बनाकर इसे अपराध घोषित किया गया। तलाक-ए-हसन को कुछ लोग ज्यादा सोचा-समझा तरीका मानते हैं, लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह महिलाओं के लिए अन्यायपूर्ण है क्योंकि इसमें कोई सुरक्षा नहीं मिलती।













