मैं 4-5 फरवरी की दरम्यानी रात को यह रिपोर्ट भेज रहा हूं। तारीख की बात जरूरी है क्योंकि बलूचिस्तान एक तारीखी दौर से गुजर रहा है। पाकिस्तान से आजाद होने की लड़ाई में बलूचों ने ऑपरेशन हेरॉफ-2 के तहत तकरीबन एक तिहाई बलूचिस्तान में जगह-जगह हमले करके सैकड़ों फौजियों को मार डाला। इससे भी बड़ी बात, लड़ाकों ने कई चौकियों और सेंट्रल फौजी कैंप पर धावा बोलकर वहां कब्जा कर लिया। ऐसे कई सैन्य ठिकानों पर छठे दिन भी बलूचों का कब्जा रहा।
मस्तुंग के एक ओर है क्वेटा और दूसरी ओर है नुश्की। दोनों का अपना-अपना प्रतीकात्मक महत्व। क्वेटा बलूचिस्तान की राजधानी है और 31 तारीख को सुबह जब बलोचों की कई टुकड़ियों ने एक साथ धावा बोला तो उन्हें बहुत बड़ा प्रतिरोध नहीं झेलना पड़ा। हालांकि हमले में एक डीएसपी, एक एसएचओ समेत 30 से ज्यादा पुलिसकर्मी मारे गए। केवल क्वेटा का आर्मी कैंटोनमेंट पूरी तरह फौज के नियंत्रण में रहा, हालांकि हमले उसपर भी हुए।
बलूचिस्तान हाईकोर्ट और सरकारी दफ्तरों वाले बेहद संवेदनशील इलाके में आईईडी के जरिये गाड़ी में धमाका किया गया। थानों और सरकारी भवनों में आग लगा दी गई और कागजों को जला दिया गया। थानों में बंद लोगों को रिहा कर दिया गया। बीएलए ने थानों और सरकारी कागजातों को जलाने का वीडियो भी जारी किया।
अब नुश्की की बात। नुश्की वह इलाका है जहां दुर्लभ खनिजों का भंडार है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के हाथों बुरी तरह पिटने के बाद फील्ड मार्शल बने आसिम मुनीर ने कुछ ही समय पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जो दुर्लभ खनिजों से भरा डिब्बा भेंट किया था, उसमें नुश्की के ही खनिज थे। नुश्की खास तौर पर नियोडिमियम और लैंथेनम के विशाल भंडार के लिए जाना जाता है। इसलिए शायद बलोच लड़ाके नुश्की के जरिये पाकिस्तान और अमेरिका, दोनों को संदेश देना भी चाह रहे थे।
नुश्की के अहमद वाल इलाके समेत आसपास की कई फौजी चौकियों पर बलूचों ने कब्जा कर लिया है। इतना ही नहीं, शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर गलनगोर कैंप भी बलूचों के कब्जे में है।
गलनगोर का कैंप क्यों खास
गलनगोर में पाकिस्तानी फौज का सेंट्रल कैंप है। यहां सैकड़ों की संख्या में सेना और फ्रंटियर कॉर्प्स के जवान तैनात रहते हैं। इस कैंप पर धावा बोलने वाली टुकड़ी में फिदायीन हमलावर भी थे। फिलहाल कैंप पर बलूच लड़ाकों का कब्जा है और अनुमान है कि अकेले इस कैंप पर हुई झड़प में 200 के आसपास पाकिस्तानी फौज और फ्रंटियर कॉर्प्स के जवान मारे गए। दावा किया जा रहा है कि पूरे नुश्की शहर पर बलूच लड़ाकों का कब्जा हो गया है। जो जानकारी आ रही है, उसके मुताबिक शहर की कई इमारतों पर बलूच शार्प शूटरों ने मोर्चा थाम रखा है। उधर पाकिस्तानी फौज बीच-बीच में ड्रोन से हमले कर रही है। मेन रोड के पीछे की बस्ती समेत अन्य रिहाइशी इलाकों में ड्रोन से किए गए हमलों में दो दर्जन लोगों के मारे जाने की खबर है। इसके अलावा एक यात्री गाड़ी पर किए गए फौजी हमले में भी 10 लोग मारे गए।
फौज की आम लोगों पर अंधाधुंध गोलीबारी
बलूची भाषा में हेरॉफ का शाब्दिक अर्थ है ‘आंधी’।
पहली बार, यानी हेरॉफ-1 2024 के अगस्त में शुरू किया गया था जिसमें 12 से ज्यादा जिलों के लगभग 50 ठिकानों पर हमले किए गए थे। सबसे बड़ा हमला लासबेला में हुआ था जहां मजीद ब्रिगेड यानी फिदायीन दस्ते ने सेना के कैंप पर हमला करके 40 से अधिक जवानों को मार डाला था। तब पूरे ऑपरेशन में लगभग सौ फौजी मारे गए थे। वैसे, इस बार के ऑपरेशन में भी फिदायीन दस्ते ने भाग लिया है और खास बात यह है कि इनमें महिलाएं भी शामिल हैं। बलूचिस्तान की आजादी की लड़ाई में महिलाओं का इस तरह भाग लेना संघर्ष के खतरनाक दौर में प्रवेश का संकेत है। हेरॉफ-1 दरअसल, अभ्यास था कि हमला करने के बाद किसी इलाके को नियंत्रण में कैसे रखा जाए। यही कारण है कि लासबेला के फौजी कैंप पर गोलाबारी 20 घंटों से ज्यादा देर तक चलती रही। साथ ही, बलूच लड़ाकों ने एनएच-10, एनएच-25 और एनएच-60 को 12 से 24 घंटे तक अपने कब्जे में रखा और इस दौरान यातायात ठप रहा।
हेरॉफ-2 के दौरान उसी रणनीति को आगे बढ़ाया गया है और हाईवे के अलावा शहरों-कस्बों को भी हमला करके कब्जे में रखने का अभ्यास किया जा रहा है। स्थिति यह है कि नुश्की और मस्तुंग को जोड़ने वाली सड़क पर बनी चौकी पर तैनात बलूच लड़ाकों ने फौजियों की भी तलाशी ली। ‘आंधी’ का यह दूसरा दौर क्वेटा, ग्वादर, चमन, पसनी, नुश्की, खरान, दल्बंदिन, टंप, कलात समेत 12 से ज्यादा शहरों और उसके आसपास के इलाकों में चला। हमलों में पुलिस स्टेशन, फौजी चौकियां, जेलों, हाइवे चेकपोस्ट और सीपीईसी के साइट निशाना बनाए गए। बीएलए का दावा है कि ऑपरेशन के दौरान कम से कम 280 फौजी मारे गए। प्रवक्ता जीयंद बलोच ने हालांकि यह भी कहा कि अंतिम संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है क्योंकि कई इलाकों में मारे गए फौजियों की सही संख्या अंदाजा नहीं। दूसरी ओर पाकिस्तान सेना का कहना है कि उसने क्लीयरिंग ऑपरेशन में 147-177 बलोच आतंकवादियों को मार गिराया।
नया कलेवर, नई रणनीति
बलूच लड़ाकों ने अभी हाल ही में खरान में कुछ इसी तरह का हमला किया था और तब भी पूरे शहर को नियंत्रण में रखने का जैसे अभ्यास किया गया था। बलूचों के आंदोलन में एक बड़ा अंतर यही आया है। अब वे छापामार युद्ध के दौर से बाहर आ गए हैं और न केवल खुलकर सैन्य-नागरिक प्रशासन को चुनौती दे रहे हैं, बल्कि शहरों, कस्बों, सैन्य ठिकानों पर कब्जा कर ले रहे हैं। बलूचिस्तान में छामापार युद्ध के बड़े नेता और बलोचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (बीएलएफ) के मुखिया डॉ. अल्लाह नजर बलोच हेरॉफ-2 की कामयाबी से बेहद खुश हैं। उन्होंने कहा, “ हेरॉफ-2 ने बता दिया कि बलूचिस्तान पर फौजी कब्जा अब अपनी अंतिम सांसे ले रहा है।” इसके साथ ही उन्होंने फौज को चुनौती दी कि उसका मुकाबला आजादी की लड़ाई लड़ रहे बलूचों से है तो उनसे ही दो-दो हाथ करे, बेकसूर आम लोगों को क्यों निशाना बनाती है। डॉ. अल्लाह नजर ने ग्वादर में एक ही परिवार के 13 लोगों को मार डालने, नुश्की में यात्री गाड़ी पर हमला करके 10 लोगों की जान ले लेने और नुश्की में ही ड्रोन से आम लोगों को निशाना बनाने को निहायत “कायराना हरकत” करार दिया है।
वैसे, हेरॉफ-2 से एक और चीज साफ होती है, जो बहुत अहम है और बलूच आंदोलन के लिए उम्मीदें पैदा करती है। वह है, आम लोगों का साथ। बलूच लड़ाकों ने एक साथ 12 शहरों, उससे लगते कस्बों, राजमार्गों को कब्जे में लिया, लेकिन संचार-बंद बलूचिस्तान के अलग-अलग इलाकों से जो भी जानकारी थन-छनकर आ रही है, उसमें एक भी जगह पर आम लोगों के प्रतिरोध की बात नहीं आई है। यानी, पाकिस्तान और उसकी फौज के लिए दोहरी चिंता।
बीएनएम चेयरमैन के पिता और रिश्तेदारों को उठाया
ऑपरेशन हेरॉफ-2 के तहत बलूचिस्तान के कई इलाकों में आर-पार जैसी स्थिति का सामना कर रही पाकिस्तानी फौज ने बलोच नेशनल मूवमेंट (बीएनएम) के चेयरमैन डॉ. नसीम बलोच के पिता को कब्जे में ले लिया है।
मिली जानकारी के मुताबिक फौज 2 फरवरी को तड़के डॉ. नसीम बलोच के पिता मुहम्मद बख्श सजदी, चाचा नईम सजदी और उनके मामा इंजीनियर रफीक बलोच को हुब स्थित उनके घर से उठा ले गई। उसके बाद से इन लोगों का कोई पता नहीं। रिश्तेदारों ने थाने जाकर पता लगाने की कोशिश की लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली।
बीएनएम ने बयान जारी कर कहा है पाकिस्तान के गैरकानूनी कब्जे से आजाद होने के लिए बलूचिस्तान में अलग-अलग तरीके से लोग संघर्ष कर रहे हैं। “बीएनएम एक राजनीतिक दल है, जो शांतिपूर्ण आंदोलन के जरिये यह लड़ाई लड़ रही है। ऐसे में बीएनएम के नेताओं और कार्यकर्ताओं के रिश्तेदारों पर जुल्म करना सरासर गलत है”। वैसे, आजादी की लड़ाई लड़ रहे बलूचों के रिश्तेदारों पर जुल्म करना, उन्हें गायब कर देना पाकिस्तान की रणनीति रही है। 00000
हेरॉफ-2 ने बता दिया कि बलूचिस्तान पर फौजी कब्जा अब अपनी अंतिम सांसे ले रहा है : डॉ. अल्लाह नजर बलोच

















