समावेशी विकास-सामाजिक परिवर्तन के उत्प्रेरक बनें विश्वविद्यालय: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु
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समावेशी विकास-सामाजिक परिवर्तन के उत्प्रेरक बनें विश्वविद्यालय: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय के नव-निर्मित ऑडिटोरियम का भी उद्घाटन किया, जो संस्थान की अकादमिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

Written byडॉ. समन्वय नंदडॉ. समन्वय नंद — edited by Lalit Fulara
Feb 3, 2026, 11:04 pm IST
in ओडिशा

भुवनेश्वर: राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने मंगलवार को कहा कि विश्वविद्यालयों की यह विशेष जिम्मेदारी है कि वे समावेशी विकास, नवाचार और सामाजिक परिवर्तन के उत्प्रेरक के रूप में कार्य करें। वह बालेश्वर स्थित फकीर मोहन विश्वविद्यालय (एफएमयू) के दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रही थीं। इस अवसर पर राष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय के नव-निर्मित ऑडिटोरियम का भी उद्घाटन किया, जो संस्थान की अकादमिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

दीक्षांत समारोह में स्नातक छात्रों, शिक्षकों और गणमान्य अतिथियों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि राष्ट्र की प्रगति समाज के सभी वर्गों की वृद्धि, सुरक्षा और तकनीकी उन्नति पर निर्भर करती है। उन्होंने इस प्रक्रिया में उच्च शिक्षण संस्थानों की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। राष्ट्रपति ने कहा, “विश्वविद्यालय केवल डिग्रियां प्रदान करने वाले संस्थान नहीं हैं। वे ज्ञान-आधारित समाज की रीढ़ हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों की यह विशेष जिम्मेदारी है कि वे आलोचनात्मक चिंतन, नैतिक नेतृत्व और नवाचार को प्रोत्साहित करें तथा समावेशी विकास और सामाजिक परिवर्तन के उत्प्रेरक बनें।”

ओड़िया साहित्य के जनक व्यासकवि फकीर मोहन सेनापति को भावभीनी श्रद्धांजलि
उन्होंने आगे कहा कि विश्वविद्यालयों को ऐसा अनुसंधान बढ़ावा देना चाहिए जो स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक चुनौतियों के प्रति संवेदनशील हो, साथ ही मानवीय मूल्यों में गहराई से निहित हो। राष्ट्रपति ने फकीर मोहन विश्वविद्यालय की अकादमिक दृष्टि और सामुदायिक सहभागिता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि यह संस्थान क्षेत्र और राष्ट्र के विकास में परिवर्तनकारी भूमिका निभाने के लिए सक्षम है। राष्ट्रपति मुर्मु ने विश्वविद्यालय के नामकरण से जुड़े महान ओड़िया लेखक, समाज सुधारक और आधुनिक ओड़िया साहित्य के जनक व्यासकवि फकीर मोहन सेनापति को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने उनके साहित्यिक योगदान के साथ अपने व्यक्तिगत जुड़ाव को याद करते हुए कहा कि छात्र जीवन में उनकी कालजयी लघुकथा ‘रेवती’ से वह गहराई से प्रभावित हुई थीं।

राष्ट्रपति ने ‘रेवती’ को 19वीं शताब्दी में शिक्षा की आकांक्षा रखने वाली एक बालिका के संकल्प का सशक्त चित्रण बताते हुए कहा कि यह कहानी आज भी पीढ़ियों को प्रेरित करती है। उन्होंने साझा किया कि उन्होंने स्वयं एक दूरदराज के आदिवासी गांव में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और बाद में भुवनेश्वर आकर उच्च विद्यालय एवं महाविद्यालय की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने कहा, “हाशिए पर स्थित और दूरस्थ क्षेत्रों से आने वाले अनेक विद्यार्थियों की तरह मेरी शैक्षिक यात्रा भी चुनौतियों से भरी रही। फकीर मोहन सेनापति की रचनाओं ने सामाजिक यथार्थ और आकांक्षाओं को स्वर दिया, और उनके आदर्श आज भी मुझे प्रेरित करते हैं।” राष्ट्रपति ने कहा कि उनका साहित्यिक विरासत आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है।

अतीत को समझकर और वर्तमान को जानकर विद्यार्थी गढ़ सकते हैं राष्ट्र का भविष्य
फकीर मोहन सेनापति के मातृभाषा प्रेम का उल्लेख करते हुए राष्ट्रपति ने उनके प्रसिद्ध कथन “मेरी मातृभाषा मेरे लिए सर्वोपरि है” को उद्धृत किया। उन्होंने कहा कि मातृभाषा में दी गई शिक्षा से विद्यार्थी अपने परिवेश, परंपराओं और सांस्कृतिक वातावरण को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं, साथ ही औपचारिक शिक्षा भी अधिक प्रभावी होती है। राष्ट्रपति ने कहा कि ऐसी शिक्षा से शिक्षार्थी अपनी सभ्यतागत जड़ों और जीवनशैली से जुड़े रहते हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 में मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं के उपयोग पर विशेष बल दिया गया है, जिससे समझ, सृजनात्मकता और अधिगम परिणामों में सुधार हो सके।

राष्ट्रपति मुर्मु ने भारत की समृद्ध और प्राचीन ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के शास्त्र और पांडुलिपियां केवल कविता और साहित्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विज्ञान, चिकित्सा, खगोलशास्त्र, गणित और वास्तुकला जैसे क्षेत्रों में भी ज्ञान का विशाल भंडार हैं। उन्होंने युवाओं को इस विरासत में अनुसंधान के अवसर तलाशने के लिए प्रोत्साहित किया।
उन्होंने कहा, “अतीत को समझकर और वर्तमान को जानकर विद्यार्थी न केवल अपना भविष्य बल्कि राष्ट्र का भविष्य भी गढ़ सकते हैं।” दीक्षांत समारोह में स्नातक छात्रों को बधाई देते हुए राष्ट्रपति ने विश्वास जताया कि ज्ञान, लगन और प्रतिबद्धता के साथ वे समाज में सम्मान और पहचान अर्जित करेंगे। उन्होंने कहा कि किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए समर्पण और दृढ़ता आवश्यक है।


सफलता और उद्देश्य के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि सफल जीवन महत्वपूर्ण है, लेकिन अर्थपूर्ण जीवन उससे भी अधिक मूल्यवान है। उन्होंने छात्रों से आह्वान किया कि वे केवल यश, प्रतिष्ठा और आर्थिक सुरक्षा की आकांक्षा न रखें, बल्कि समाज के कल्याण के लिए भी कार्य करें, विशेषकर उन लोगों के लिए जो विकास की दौड़ में पीछे रह गए हैं।
उन्होंने कहा, “समाज का विकास सभी के विकास में निहित है,” और युवाओं से राष्ट्र निर्माण एवं सामाजिक उत्थान में सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया। दीक्षांत समारोह का समापन छात्रों, शिक्षकों और प्रशासकों के बीच नव उत्साह और उद्देश्यबोध के साथ हुआ, क्योंकि राष्ट्रपति के संबोधन ने समावेशी, ज्ञान-आधारित और सामाजिक रूप से उत्तरदायी भारत के निर्माण में विश्वविद्यालयों की अहम भूमिका को रेखांकित किया।

जाजपुर में राष्ट्रपति का दौरा, बिरजा मंदिर में दर्शन और नाभि गया में पिंडदान
इससे पहले दिन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जाजपुर जिले के ऐतिहासिक बिरजा मंदिर का दौरा किया, जो उनका इस जिले का पहला आधिकारिक दौरा था। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार राष्ट्रपति सुबह 9.30 बजे जाजपुर के प्रशासनिक भवन परिसर स्थित हेलीपैड पर पहुंचीं। वहां ओडिशा के राज्यपाल डॉ. हरिबाबू कंभमपति, मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि के रूप में पंचायती राज मंत्री रवि नारायण नायक, सहकारिता, हथकरघा, वस्त्र एवं हस्तशिल्प मंत्री प्रदीप बल सामंत, जाजपुर सांसद डॉ. रवींद्र नारायण बेहरा, जिले के सभी विधानसभा क्षेत्रों के विधायक एवं महिला विधायक, जिला परिषद अध्यक्ष तथा वरिष्ठ पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों ने उनका औपचारिक स्वागत किया।

राष्ट्रपति के दौरे को देखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस द्वारा कड़े सुरक्षा एवं लॉजिस्टिक इंतजाम किए गए थे। हेलीपैड से राष्ट्रपति विशेष सुरक्षा घेरे में बिरजा मंदिर के लिए रवाना हुईं। मंदिर पहुंचने पर राष्ट्रपति ने गर्भगृह में प्रवेश से पहले विधिवत स्नान एवं शुद्धिकरण किया। उन्होंने सबसे पहले पवित्र नाभिगया में अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान किया। यह धार्मिक अनुष्ठान लगभग एक घंटे तक चला और चार मंदिर पुजारियों द्वारा संपन्न कराया गया। पिंडदान के बाद राष्ट्रपति ने मां बिरजा के दर्शन किए और मंदिर परिसर की परिक्रमा की। उन्होंने गंगेश्वर, मुक्तेश्वर, संहार भैरव, 108 शिवलिंग और पार्श्व देवता सहित अन्य प्रमुख देवालयों में भी पूजा-अर्चना की तथा मुक्ति मंडप सभा में आशीर्वाद ग्रहण किया। मंदिर परिसर वेद मंत्रोच्चार और पारंपरिक हुलुहुली ध्वनि से गूंज उठा, जिससे आध्यात्मिक वातावरण निर्मित हो गया। इस अवसर पर जिला प्रशासन की ओर से राष्ट्रपति को बौद्ध प्रतिमा और टसर रेशमी साड़ी भेंट की गई। ब्रह्माकुमारी संस्थान के सदस्यों ने भी राष्ट्रपति से मुलाकात की।

Topics: Convocation ceremonyPresident droupadi murmuFakir Mohan University
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