कांग्रेस पार्टी में असंतुष्ट नेताओं खासकर मुस्लिम नेताओं की संख्या बढ़ती ही जा रही है। पूर्व केंद्रीय मंत्री शकील अहमद, राशिद अल्वी, कटिहार के सांसद तारिक़ अनवर और अब हुसैन दलवई ने भी अब राहुल गाँधी या यों कहें कि कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध बिगुल का झंडा हाथों में उठा लिया है। आखिर इन कांग्रेस पार्टी के नेताओं में अब राहुल गांधी या कांग्रेस पार्टी के खिलाफ स्वर क्यों उठाना शुरू किया हैं? इसका कारण 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस पार्टी का मुस्लिम वर्ग के प्रति दोहरा रवैया है।
2024 के लोकसभा के चुनाव में असम के धुबरी लोकसभा सीट से कांग्रेस पार्टी के रकीबुल हुसैन ने असम के बड़े मुस्लिम नेता और आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल को देश में सबसे अधिक 1012476 मतों से पराजित किया था। धुबरी लोकसभा की सीट का परिणाम काफी चौंकाने वाला था, क्योंकि अजमल लगातार तीन बार से इस सीट से बड़े मतों के अंतर से जीत कर संसद पहुंच रहे थे। धुबरी लोकसभा सीट के अंतर्गत 11 विधानसभा की सीटों में एक पर भी बदरुद्दीन अजमल बढ़त बनाने में सफल नहीं हुए थे। लोकसभा परिणाम के बाद उम्मीद की जा रही थी कि कांग्रेस पार्टी रकीबुल हुसैन को लोकसभा में पार्टी का नेता या उपनेता अवश्य बनाएगी, तब जबकि विगत लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी बहरामपुर से चुनाव हार गए थे।
रकीबुल हुसैन के जीत का अंतर कांग्रेस पार्टी के एक तिहाई से अधिक 34 सांसदों की जीत के कुल अंतर से भी अधिक था। रकीबुल हुसैन का राजनीतिक जीवन काफी उज्जवल रहा है। वो सांसद बनाने से पूर्व असम विधानसभा में विपक्ष के उपनेता थे साथ ही उन्होंने ने 2011 के असम विधानसभा के चुनाव में असम के दो बार के मुख्यमंत्री प्रफ्फुल कुमार महंत को अपने विधानसभा सीट सामगुरी पर लगभग 20 हज़ार के मतों से करारी शिकश्त दिया था। अतएव यह विदित था कि रकीबुल हुसैन को लोकसभा में पार्टी का नेता, उपनेता या कोई अन्य महत्वपूर्ण पद पार्टी अवश्य देगी। मगर इसके बावजूद भी कांग्रेस पार्टी ने राहुल गाँधी की नेता और असम के जोरहाट से लोकसभा के सांसद गौरव गोगोई को उपनेता का पद के लिए चुना। गौरव गोगोई को उपनेता का पद केवल उनके गांधी परिवार और राहुल गांधी से नजदीक होने के कारण दिया गया। गाँधी परिवार का यह निर्णय कांग्रेस पार्टी के मुस्लिम नेताओं और मुस्लिम वर्ग के बड़े मतदाता वर्ग के लिए बहुत पीड़ादायक था।
मुस्लिम मतदाताओं का कांग्रेस को सबक
इसका बदला लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस पार्टी से लेना शुरू कर दिया और महाराष्ट्र में मालेगांव सेंट्रल विधानसभा सीट पर 96.73 फीसद मत प्राप्त करके धुले सीट जीतने वाली कांग्रेस पार्टी को महज छह महीने बाद विधानसभा चुनाव में इस सीट पर महज 3.13 फीसद मत प्राप्त होता है। विदित हो कि धुले लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाली छह विधानसभा की सीटों में महज एक सीट मालेगाव सेंट्रल पर ही कांग्रेस पार्टी 194327 मतों की बढ़त बनाकर 3831 मतों से भाजपा को हराकर सीट जीतने में कामयाब रही। रकीबुल हुसैन के साथ कांग्रेस पार्टी के द्वारा किये गए नाइंसाफी का परिणाम उनके द्वारा खाली किए गए सीट सामगुरी के उपचुनाव में ही देखने को मिला जब भाजपा के दीप्लू रंजन शर्मा ने बड़े मतों के अंतर से कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार तंजील हुसैन को पटखनी दिया। कांग्रेस पार्टी के लिए यह हार और भी ज्यादा पीड़ादयक थी क्योंकि इस उपचुनाव में बदरुद्दीन अजमल ने भी कांग्रेस पार्टी को अपना समर्थन दिया था। अतएव यह कहना अनुचित नहीं होगा कि कांग्रेस पार्टी अपनी कारगुजारियों से असदुद्दीन ओवैसी और इनके जैसे दलों को मजबूत कर रही है।
दिल्ली में लगातार तीन बार शून्य पर सिमटी कांग्रेस
कांग्रेस पार्टी का मुस्लिम नेताओं के साथ इस तरह के भेदभाव का असर लोकसभा के चुनाव के बाद हुए विधानसभा के चुनावों में भी बड़े पैमाने पर देखने को मिला रहा है। लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस पार्टी दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार चुनाव में बुरी तरह हारने के साथ ही केंद्रशासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में भी कमजोर और लचर प्रदर्शन किया है। कांग्रेस पार्टी दिल्ली 2025 विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरी बार कांग्रेस पार्टी शून्य सीट तक ही सिमट कर रह गई हैं। दिल्ली विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी महज एक सीट कस्तूरबा नगर पर दूसरे पायदान पर रही थी और तीन विधानसभा की सीटों पर जमानत बचा सकी थी। दिल्ली में लोकसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाताओ ने बढ़-चढ़कर कांग्रेस पार्टी के लिए मतदान किया था और मुस्लिम बाहुल्य सुल्तानपुर माजरा, चांदनी चौक, मटियामहल, बल्लीमारान, सीमापुरी, सीलमपुर और बाबरपुर विधानसभा की सीटों पर बढ़त प्राप्त किया था मगर विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी इन सभी सीटों पर अपना जमानत जब्त करवा लिया। इसका एकमात्र कारण मुस्लिम मतदाताओं का कांग्रेस पार्टी के दोहरे रवैये के कारण मत नहीं करना है।
बिहार विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन अपेक्षाकृत काफी कमजोर रहा और 19 सीटों से सिमट कर कांग्रेस पार्टी महज छह सीटों पर आ गई। कांग्रेस पार्टी का बिहार में मुस्लिम बाहुल्य सीमांचल क्षेत्र गढ़ हुआ करता था। वर्तमान में कांग्रेस पार्टी के राज्य से तीन सांसदों में सीमांचल इलाके से दो सांसद हैं। वहां भी कांग्रेस पार्टी को करारी हार मिली है। यह तब हुआ है, जब राहुल गाँधी ने भी अपने भारत जोड़ो यात्रा में सीमांचल इलाके पर काफी समय दिया था। कांग्रेस पार्टी के विधानसभा में पार्टी के नेता और दो बार के कदवा से विधायक शकील अहमद खान भी अपनी सीट बचाने में नाकाम रहे हैं। पूर्णिया जिले की मुस्लिम बाहुल्य सीट क़स्बा जिस पर कांग्रेस पार्टी लगातार तीन बार से चुनाव जीत रही थी मगर इस बार कांग्रेस पार्टी इस बार हार गई।
महाराष्ट्र में मिली मात
महाराष्ट्र में भी हाल में संपन्न हुए निकाय चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी, समाजवादी पार्टी और इसके सहयोगी दलों को पुरे राज्य में मुस्लिम मतदाताओ के हाथो मुँह की खानी पड़ी हैं और मुस्लिम मतदाताओ ने इन दलों के बदले असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन और शैख़ आसिफ शैख़ रशीद की इंडियन सेक्युलर लार्जेस्ट असेंबली ऑफ़ महाराष्ट्र को बड़े पैमाने पर मतदान किया है।
कांग्रेस पार्टी पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में मुस्लिम बाहुल्य सीट सागरदिघी विधानसभा सीट पर 2023 में उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस पार्टी को हराकर 1972 के बाद पहली बार इस सीट को जीतने में कामयाब हुई थी। मगर कांग्रेस पार्टी के राज्य में इकलौते विधायक बायरन विश्वास जीतने के तुरंत बाद अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर लिया। मेघालय में कांग्रेस पार्टी 2023 के विधानसभा चुनाव में पांच सीट जीतकर मुख्य विपक्षी दल थी मगर कांग्रेस पार्टी के सभी विधायक सत्तारूढ़ नेशनल पूपिल्स पार्टी में शामिल हो गए और कांग्रेस पार्टी मेघालय राज्य में भी शून्य सीटों वाली पार्टी बन गई।
कांग्रेस पार्टी के मुस्लिम मतदाता वर्ग में घटे जनाधार के मद्देनज़र अब अन्य सहयोगी दल कांग्रेस पार्टी से दूरी बनाते जा रहे हैं। हाल ही में केरल में कांग्रेस पार्टी की सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने कोझिकोड में हुए बैठक में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट गठबंधन में अपनी पार्टी के लिए अधिक सीटों की मांग कर दिया है। तमिलनाडु में भी द्रमुक कांग्रेस पार्टी को 2021 के 25 सीटों की अपेक्षा सीटों की संख्या कम करना चाह रही है।











