बहुप्रतीक्षित भारत यूरोपीय संघ के बीच मदर आफ आल डील्स कहकर प्रचारित की जा रही मुक्त व्यापार संधि ने अमेरिका से लेकर अमेजन तक एक खलबली सी पैदा कर दी है। इस संधि से जहां भारत और यूरोपीय देशों के बीच निकटताएं बढ़ेंगी, व्यापारिक आदान—प्रदान बढ़ेंगे तो वहीं अमेरिकी थानेदारी और दादागिरी पर भी एक हद तक लगाम लगेगी। विश्व के लगभग सभी प्रमुख अखबार इस संधि को लेकर आलेख और रिपोर्ट छाप रहे हैं। यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला के इस संधि को लेकर दावोस से जारी हुए बयान ने पहले से भी अमेरिकी सत्ता की नींद उड़ाई हुई है, वहीं अब संधि पर हस्ताक्षर होने के बाद से, अमेरिका का अक्खड़ रवैया और नरम पड़ने के संकेत भी अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट के बयान से मिलने लगे हैं। बेसेंट ने रूस से तेल खरीदने के लिए भारत पर लगाए गए 25 प्रतिशत पेनल्टी टैरिफ को हटाने का संकेत दिया है।
बेसेंट ने दावोस में कहा था, “हमने रूस से तेल खरीदने के लिए भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया था, और उनकी रिफाइनरियों द्वारा रूसी तेल की खरीद में भारी गिरावट आई है। तो यह एक सफलता है। टैरिफ अभी भी लागू हैं। मुझे लगता है कि उन्हें हटाने का रास्ता निकलेगा, तो यह एक अच्छी बात है। बेसेंट ने आगे यह भी कहा कि, ‘अमेरिका और भारत अपने व्यापार समझौते के रास्ते में आए मतभेदों को कम करने की कोशिश कर रहे हैं।’

तो इससे क्या संकेत मिलता है? विशेषज्ञ कहते हैं कि भातर और यूरोपीय संघ के बीच होने जा रही ‘मदर आफ आल डील्स’ से अमेरिकियों में उपजा भय एक बड़ी वजह हो सकता है। बेसेंट ने अपने बयान में आगे कहा कि ‘अजीब बात है कि यूरोपीय संघ ने नई दिल्ली पर इसी तरह के टैरिफ नहीं लगाए और इसके बजाय भारत से रिफाइंड रूसी तेल उत्पाद खरीदे।’ यह ट्रंप प्रशासन की चिढ़ अब और बढ़ेगी जब भारत और यूरोपीय संघ आज इस संधि को अंतिम रूप देकर इस पर हस्ताक्षर करेंगे।

असल में यह अमेरिका की यह एकतरफा गलतफहमी ही सिद्ध हुई है कि भारत मॉस्को के युद्ध प्रयासों को अप्रत्यक्ष रूप से फंड दे रहा है। इस पर कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि अमेरिका तो खुद हाल तक रूसी यूरेनियम खरीद रहा था और यूक्रेन मुद्दे पर ट्रंप प्रशासन का रूस के प्रति नरम रवैया भी युद्ध खत्म करने में मदद नहीं कर रहा है।
जैसा पहले बताया, बेसेंट की उक्त टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब यूरोपीय संघ और भारत उस मुक्त व्यापार संधि को मूर्त रूप देने जा रहे हैं, जिस पर लगभग एक दशक से सघन प्रयास जारी थे। बेशक वाशिंगटन परेशान है। इसी परेशानी के चलते अब बेसेंट ने भारत पर रूसी तेल टैरिफ हटाने की संभावना जताई है। तो संभवत: अमेरिकी प्रशासन वस्तुस्थिति को समझने की कोशिश कर रहा है।
इधर व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि इस संधि से दोनों पक्षों को फायदा होगा। संधि होने से भारत और यूरोपीय संघ के बीच भरोसेमंद गठबंधन और स्थिर व्यापार साझेदारी मजबूत होगी। यूरोपीय संघ के कृषि और खाद्य आयुक्त क्रिस्टोफ हैनसेन ने एक संतुलित यूरोपीय संघ-भारत मुक्त व्यापार संधि को दोनों पक्षों के लोगों, किसानों और व्यवसायों के लिए फायदेमंद बताया ही है।
यहां बता दें कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच FTA या मुक्त व्यापार संधि पर बातचीत 2022 में नए सिरे से शुरू हुई थी। पिछले दो साल में बातचीत के अनेक दौर हुए हैं और सभी शर्तों और नियमों पर विस्तार से बात हुई है।
भारत के लिए, इस संधि का अर्थ है अहम निर्यातों के लिए टैरिफ-फ्री एंट्री, अस्थिर अमेरिकी बाजारों पर निर्भरता कम करना और यूरोप के मुख्य एशियाई साझेदार के तौर पर अपनी स्थिति को मजबूत करना। और यूरोपीय संघ के लिए इस संधि के मायने हैं आपूर्ति में विविधता आना।

















