हरियाणा की लोक-सांस्कृतिक परंपरा में दादा लखमीचंद जी का नाम उस सूर्य के समान है जिसकी किरणें आज भी समाज को दिशा दिखा रही हैं। परिवार के अनुसार 22 जनवरी तथा सरकारी अभिलेखों के अनुसार 15 जुलाई 1903 को जन्में और 1945 में देह त्याग करने वाले दादा लखमीचंद जी स्कूली शिक्षा से औपचारिक रूप से अनभिज्ञ थे, किंतु जीवन, समाज और दर्शन शास्त्र की जो गहन समझ उनमें थी, वह किसी विश्वविद्यालय से कम नहीं थी।
गांव जांटी कलां (जिला सोनीपत, हरियाणा) के एक सामान्य ब्राह्मण परिवार में जन्मे इस लोककवि ने अपने अनुभव, संवेदना और विवेक को रागनियों व कविताओं तथा सांग के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाया। उनकी संताने, उनके विचारों को जन जन तक पहुंचाने के कार्य में आज भी उनके सॉन्ग और रागनियों के माध्यम से प्रयासरत है।
उनके पुत्र तुलाराम 55 वर्षों तक, पौत्र विष्णुदत्त जी 18 वर्षों से, उससे पहले पिता के साथ, प्रपौत्र चेतन शर्मा अपनी पढ़ाई दादा लखमीचंद राज्य प्रदर्शन और दृश्य कला विश्वविद्यालय रोहतक से इसी वर्ष पूर्ण कर अपने पिता के साथ दादा लखमीचंद के विचारों को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं।
दादा लखमीचंद को कहा जाता है हरियाणा का शेक्सपियर
दादा लखमीचंद को “हरियाणा का शेक्सपियर” यूं ही नहीं कहा जाता। जिस प्रकार शेक्सपीयर ने अपने नाटकों और कविताओं में मानव स्वभाव, सामाजिक विसंगतियों और नैतिक द्वंद्वों को उजागर किया, उसी तरह दादा लखमीचंद ने हरियाणवी लोकभाषा में समाज के मूल प्रश्नों को स्वर दिया।
वे दूरदर्शी, युगदृष्टा और एक लोक-दर्शनशास्त्री थे, जिन्होंने आज जिसे “पंच परिवर्तन” कहा जाता है देश के प्रधानमंत्री ने जो पंच प्रण की बात कही उनमें—सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन यानी नैतिक परिवार, स्व का भाव यानी स्वदेशी, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक कर्तव्य—इन विषयों को सौ वर्ष से भी पहले अपनी रचनाओं के केंद्र में रखा।

उनकी रागनियों में सामाजिक समरसता का स्वर अत्यंत प्रखर है। वे स्पष्ट कहते हैं— “मानुष-मानुष एक समान, क्यों कर बैठे जाति बखान। एक लहू, एक प्राण सभी में, फिर क्यों ऊँच-नीच का ध्यान। लखमीचंद समझावे जग ने, झूठा है ये अभिमान।।” यह केवल कविता नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय के विरुद्ध चेतावनी है। छुआछूत, जातिगत अहंकार और खोखले अभिमान पर उन्होंने करारा प्रहार किया। उनके लिए धर्म का मूल प्रेम, करुणा और कर्म है वो सबमें भगवान देखते हैं— “कर्म देखकै मान करो रे, जनम पूछना भूल।” भगवान बसे हर देह में, समझो यही उसूल॥’
आज के समय में आपसी भाईचारा और समरसता के लिए उनके विचार और भी प्रासंगिक हैं। कुटुंब प्रबोधन- नैतिक परिवार दादा लखमीचंद की रचनाओं का दूसरा सशक्त स्तंभ है। वे मानते थे कि सशक्त समाज की नींव सुदृढ़ परिवार से ही बनती है। “घर की मर्यादा टूटे जब, बिगड़े कुल की शान। बूढ़े माँ-बाप छोड़ दिए, बेटा हुआ नादान॥” परिवार में फूट, बुजुर्गों की उपेक्षा और स्वार्थ से उपजा अकेलापन—इन सबके दुष्परिणामों को उन्होंने बहुत सरल, पर मार्मिक शब्दों में रखा।
दादा लखमीचंद पर्यावरण संरक्षण को भी मानवीय कर्तव्य मानते थे
जहां बड़े हों सिर पे छाया, बच्चे सीखें धर्म। लखमीचंद कहे समझ ले रे, घर से बनते कर्म॥ संयुक्त परिवार और परस्पर सहयोग को वे सामाजिक स्थिरता की कुंजी मानते थे। स्व का भाव—अर्थात आत्मबोध और स्वदेशी चेतना, अपनी संस्कृति, विरासत के प्रति गर्व—उनकी दूरदृष्टि का प्रमाण है। वे चेताते हैं कि अपनी जड़ों से कटना आत्मसम्मान खोने जैसा है। “देश की माटी माँ है अपनी, इसमें जनम लियौ। परदेसी रंग में रंग कै, निज गौरव बिसरियौ॥” भाषा, भेष, खान-पान और अपने श्रम के सम्मान की बात वे इतने पहले उठाते हैं, जब वैश्वीकरण जैसा शब्द भी प्रचलन में नहीं था। “अपने हाथ का काम छोड़ कै, दूजे माथे टेक। लखमीचंद समझावे जग ने, इससे टूटे एक।। भाषा, भेष अर खान-पान में, अपनापन रख मान। स्व का भाव जगा ले मन में, तभी बचे पहचान॥”
दादा लखमीचंद पर्यावरण संरक्षण को भी मानवीय कर्तव्य मानते थे। “पेड़ कटे तो प्राण कटे, यह बात समझ ले आज।” लखमीचंद समझावे जग ने, बचाओ धरती की लाज॥ नदियाँ रोवें मैली होके, सूखा पड़े कुआँ। आज सँभाल ले प्रकृति ने, कल ना मिलेगी क्षमा। धुआँ उगलती गाड़ियाँ, रोगन का अंबार। अशुद्ध हवा-पाणी ले डूबे, घर-घर बीमार॥” आज जब पर्यावरण संकट वैश्विक चिंता बन चुका है, तब उनकी रचनाएँ भविष्यवाणी जैसी प्रतीत होती हैं। जंगलों की कटाई, प्रदूषण और लालच के दुष्परिणाम उन्होंने लोकभाषा में जन-सामान्य को समझाए। इसी क्रम में नागरिक कर्तव्य की उनकी अवधारणा अत्यंत स्पष्ट है। अधिकार से पहले कर्तव्य—यह उनका मूल मंत्र था। “कर्तव्य बिन अधिकार न मिलते, यह जग का है ज्ञान। जो फरज छोड़ बस माँगे हक, खो बैठे सम्मान॥ नियम, कानून, मतदान, श्रमदान—इन सबमें सहभागिता को वे मजबूत लोकतंत्र का आधार मानते थे। गर ना निभाए वोट का, गर ना माने कानून। लखमीचंद समझावे जग ने, बढ़े तभी अराजून॥”
100 वर्ष से पहले कही उनकी एक – एक बात अनुकरणीय है।वो साफ कहते हैं कि व्यक्ति कर्तव्य निभाकर ही अधिकार की बात करे। तब ही भारत विकसित देश होगा। “पहले फरज निभा ले मन से, तब अधिकार पुकार। कर्तव्य से ही देश चले, बिन इसके अंधकार॥” संक्षेप में, दादा लखमीचंद जी केवल लोककवि नहीं, बल्कि समाज-सुधारक, लोकदार्शनिक और सांस्कृतिक पथप्रदर्शक थे। सीमित आयु और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने जो विचार विरासत में दिए, वे आज भी उतने ही प्रासंगिक, सशक्त और प्रेरक हैं। उनकी गाई रागनियां केवल भारत ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व के लिए अनुकरणीय है। उनके द्वारा रचित रागनियों में कही बात – प्रत्येक व्यक्ति – अपने जीवन में, प्रत्येक परिवार – अपने व्यवहार में लाए । अपने कार्य स्थल पर, गांव, बस्ती में लोगों को बता कर अपने दायित्व को निभाए। हरियाणा की माटी से उपजे इस “सूर्य कवि” का प्रकाश आने वाली पीढ़ियों को भी राह दिखाता रहेगा।











