भारत के पड़ोसी इस्लामवादी देश बांग्लादेश में आज जैसी परिस्थितियां हैं उनमें साफ दिख रहा है कि आतंक और डर के दम पर कट्टर मजहबी तत्व यूनुस सरकार में सिर चढ़कर मनमानी कर रहे हैं। इससे विशेषज्ञों को ऐसा लग रहा है कि कहीं 12 फरवरी के चुनावों में मजहबी उन्मादियों को शह देने वाली जमाते इस्लामी तो प्रभावी स्थिति में नहीं आ जाएगी! अगर ऐसा होता है यह हिन्दू बहुल भारत के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर सकती है। लेकिन इन हालात में अमेरिका का बांग्लादेश की इस्लामी पार्टी जमाते इस्लामी पर डोरे डालने की कोशिशें दिखना एक अलग हैरानी को जन्म दे रहा है।
ढाका में लगातार सरकारों द्वारा प्रतिबंधित रही जमाते इस्लामी पार्टी शरिया आधारित शासन की वकालत करती रही है। 1971 में बांग्लादेश के गठन के वक्त इसी जमात ने पाकिस्तान से बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया था। यह पार्टी अनेक बार राष्ट्रीय राजनीति से प्रतिबंधित रही है।
लेकिन आश्चर्य यह है कि अमेरिका ने कट्टरपंथ के खिलाफ होने के अपने मत से हटते हुए कथित तौर पर इस दक्षिण एशियाई देश में चुनावों से पहले जमाते-इस्लामी पार्टी से निकटताएं बढ़ानी शुरू की हैं। माना जा रहा है कि जमात का कद पिछले साल के कथित ‘छात्र आंदोलन’ के बाद शेख हसीना सरकार के गिरने के बाद बढ़ता गया है। उस आंदोलन में भी जमात के कट्टर तत्वों ने छात्रों के बाने में हिस्सा लिया था।

अमेरिकी अखबार द वाशिंगटन पोस्ट ने एक रिपोर्ट छापी है। इसके अनुसार, ढाका में अमेरिकी राजनयिक एक समय प्रतिबंधित रही पार्टी के साथ जुड़ने की अपनी इच्छा के संकेत दे रहे हैं। अखबार ने इसकी पुष्टि करती एक ऑडियो रिकॉर्डिंग का संदर्भ भी दिया है।
अमेरिकी अखबार की रिपोर्ट कहती है, गत दिसंबर में बांग्लादेशी महिला पत्रकारों के साथ एक बंद कमरे में हुई बातचीत में, ढाका में स्थित एक अमेरिकी राजनयिक ने देश को “बदला हुआ इस्लामिक” देश बताया और भविष्यवाणी जैसी की कि 12 फरवरी के चुनावों में जमात “पहले से कहीं बेहतर प्रदर्शन करेगी”। रिपोर्ट में इसी बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग से तथ्य दिए गए हैं।
अमेरिकी राजनयिक ने महिला पत्रकारों से पूछा कि क्या वे पार्टी के ‘प्रभावशाली छात्र विंग’ इस्लामी छात्र शिबिर के सदस्यों को अपने कार्यक्रमों में ला सकते हैं, और कहा कि ‘हम चाहते हैं कि वे हमारे दोस्त बनें।’

बता दें कि जमात के इसी छात्र विंग ने पिछले साल ढाका और अन्य विश्वविद्यालयों में कई छात्र संघ चुनाव जीते थे। अमेरिकी राजनयिक, जिसका नाम द वाशिंगटन पोस्ट ने सुरक्षा कारणों से नहीं छापा है, ने इस डर को कम किया कि जमाते इस्लामी बांग्लादेश पर इस्लामी कानून की अपनी सोच थोपेगी और कहा कि वाशिंगटन के पास ऐसी ताकत है कि जिसके बूते वह यह सुनिष्चित करने को तैयार है।
उस अमेरिकी राजनयिक ने कहा कि अगर जमात ने इसे कट्टर रास्ते पर बढ़ने को विवश किया जो वे अगले ही दिन बांग्लादेश पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगा देंगे। ढाका में अमेरिकी दूतावास की प्रवक्ता मोनिका शी ने कहा कि दिसंबर की वह बैठक ‘अमेरिकी दूतावास के अधिकारियों और स्थानीय पत्रकारों के बीच एक नियमित, ऑफ-द-रिकॉर्ड चर्चा थी,’ और कहा कि इसमें ‘कई राजनीतिक दलों पर चर्चा हुई’ और ‘अमेरिका किसी एक राजनीतिक दल के सामने दूसरे का पक्ष नहीं लेता। वह बांग्लादेशी लोगों द्वारा चुनी गई किसी भी सरकार के साथ काम करेगा।’
विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि जमाते इस्लामी के साथ अमेरिकी संपर्क से भारत—अमेरिकी संबंध और तनावपूर्ण हो सकते हैं। कुछ विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि जमात के साथ अमेरिकी संपर्क संभावित रूप से अमेरिका और भारत के बीच एक और दरार पैदा कर सकता है।
पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत में निर्वासन और बांग्लादेश की एक अदालत द्वारा उनकी गैरमौजूदगी में उन्हें मौत की सजा सुनाए जाने के बाद, भारत के साथ ढाका के रिश्ते पहले से ही तनावपूर्ण रहे हैं। हिंदुओं के खिलाफ पिछले लगभग एक साल से चल रही सांप्रदायिक हिंसा ने इस तनाव को और बढ़ाया है।
बांग्लादेश के चुनावों में जमाते इस्लामी की मुख्य टक्कर विपक्षी दल बीएनपी से है, जिसका नेतृत्व पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान कर रहे हैं। तारिक का जमाते इस्लामी की बदनामी की वजह से उसे संभावित गठबंधन सरकार में शामिल करने का कोई इरादा नहीं दिख रहा है। हालांकि जमाते इस्लामी के प्रमुख शफीकुर रहमान ने बीएनपी के साथ काम करने की इच्छा जताई है। यही जमात 2001 से 2006 के बीच बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल रह चुकी है।
वाशिंगटन पोस्ट की खबर को जमाते इस्लामी ने एक ‘पत्रकार की राय’ बताकर खारिज कर दिया है। हसीना को हटाए जाने के बाद, जमात ने वाशिंगटन और ढाका, दोनों में अमेरिकी अधिकारियों से बंद कमरों में मुलाकातें की है।
जमाते इस्लामी का इतिहास
जमाते इस्लामी की स्थापना 1941 में मौलाना मौदूदी नाम के कट्टरपंथी मौलाना ने की थी। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान यह पार्टी पाकिस्तानी सेना की सक्रिय समर्थक रही और इसने बांग्ला राष्ट्रवादी तत्वों का विरोध किया था। स्वतंत्रता के बाद 1972 में इस पर प्रतिबंध लगा, लेकिन 1975 में जियाउर रहमान के शासन में इसे चुनाव लड़ने की अनुमति मिली थी। पार्टी का मुख्य लक्ष्य शरिया आधारित इस्लामी राज्य स्थापित करना है।

12 फरवरी 2026 को प्रस्तावित चुनावों से पहले जमात ने प्रमुखत: 162 से 188 सीटों पर फोकस किया हुआ है। इन पर यह करोड़ों रुपये खर्च कर रही है और मतदाताओं को तरह तरह के लालच दे रही है। एक आंतरिक सर्वे में यह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर तो उभरी है, लेकिन यह भी सच है कि कट्टरपंथी जमात का उभार वहां रह रहे हिन्दू अल्पसंख्यकों के लिए बड़ा खतरा होगा।
जमात की रणनीति है बीएनपी को दरकिनार कर इस्लामी वोट एकजुट करना। अगर चुनाव जीती तो यह शरिया लागू करने, अल्पसंख्यक अधिकारों को कुचलने और पाकिस्तान के साथ गठजोड़ बढ़ाने के रास्ते पर चल सकती है।

















