जब एक नाबालिग सिख बच्ची को बचाने के लिए कानून नहीं, बल्कि भीड़ को सड़कों पर उतरना पड़े —तो यह सिर्फ एक अपराध नहीं रहता, यह लोकतंत्र की विफलता बन जाता है। लंदन के हॉन्सलो इलाके में सामने आया यह मामला पश्चिमी मानवाधिकार मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जहां मजबूत कानून, आधुनिक संस्थाएं और बच्चों की सुरक्षा के बड़े दावे किए जाते हैं — वहीं एक बच्ची तंत्र की आंखों के सामने शोषण का शिकार होती रही। यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है। रोदरहैम से लेकर हॉन्सलो तक, पैटर्न वही है — लक्षित समुदाय, संगठित गिरोह और सत्ता की चुप्पी। Parakh में हम पूछते हैं: चेतावनियों को समय रहते क्यों नहीं सुना गया? कार्रवाई दबाव के बाद ही क्यों होती है? और क्यों हर बार गैर-मुस्लिम बच्चियां ही सबसे पहले असुरक्षित होती हैं? यह कार्यक्रम किसी आस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ है जो बच्चों की सुरक्षा से पहले राजनीतिक सुविधा चुनती है। देखिए संपादक हितेश शंकर के साथ ब्रिटेन की घटना की परख और खुद तय कीजिए — जब बच्ची को बचाने के लिए भीड़ चाहिए, तो लोकतंत्र कहां था?










