बीएमसी चुनाव में महायुति की बड़ी जीत हुई है। पहली बार मुंबई में भाजपा का मेयर बनेगा। पिछले करीब 30 साल से ठाकरे परिवार का इस देश के सबसे अमीर नगर निगम पर कब्जा था, लेकिन अब बड़ा बदलाव आ गया है।
चुनाव के नतीजे
16 जनवरी 2026 को आए रुझानों और आंकड़ों के मुताबिक, बीएमसी की 227 वार्डों में महायुति (भाजपा + एकनाथ शिंदे की शिवसेना) ने बहुमत हासिल कर लिया। भाजपा अकेले 88-90 के आसपास वार्ड जीत चुकी या आगे थी, जबकि शिंदे की शिवसेना ने 28-29 वार्डों में जीत दर्ज की। कुल मिलाकर महायुति के पास 117-118 सीटें आईं, जबकि बहुमत का आंकड़ा 114 है।
उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को 64-65 वार्ड मिले। कांग्रेस ने 24 के करीब सीटें लीं। एमएनएस (राज ठाकरे) को 6 सीटें मिलीं। ये नतीजे दिखाते हैं कि महायुति ने मजबूत प्रदर्शन किया और ठाकरे बंधुओं की सत्ता खत्म हो गई।
महायुति की जीत की 5 बड़ी वजहें
1. पीएम मोदी पर जनता का भरोसा
पिछले 10 साल से ज्यादा समय से भाजपा पीएम मोदी के नेतृत्व में चुनाव जीतती आ रही है। लोकसभा में लगातार तीन बार सत्ता में आई, महाराष्ट्र विधानसभा में भी हाल में बड़ी जीत मिली। मुंबई में भी लोगों ने मोदी के विकास के विजन पर भरोसा जताया। देवेंद्र फडणवीस ने खुद कहा कि मोदी जी के नेतृत्व में विकास का एजेंडा लेकर चुनाव लड़ा गया और जीत मिली। विपक्ष के पास मोदी का कोई जवाब नहीं दिख रहा।
2. शिवसेना में टूट
2019 में भाजपा और शिवसेना की सरकार बनी, लेकिन सीएम पद को लेकर विवाद हुआ। उद्धव ठाकरे ने एनसीपी-कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई। 2022 में एकनाथ शिंदे के कई विधायक-सांसद उनके साथ चले गए। शिंदे को सीएम बनाया गया और उनकी पार्टी को शिवसेना का नाम मिला। उद्धव वाली पार्टी शिवसेना यूबीटी कहलाने लगी। इस टूट से उद्धव की ताकत कमजोर हुई। बीएमसी में शिंदे की शिवसेना ने 28 वार्ड जीते, जिससे उद्धव के वोट कटे और फायदा महायुति को मिला।
3. मनसे के साथ गठबंधन से उत्तर भारतीय वोटर नाराज
राज ठाकरे ने 2006 में अलग पार्टी बनाई थी। इस बार उद्धव के साथ गठबंधन किया। मराठी वोटरों में मनसे को अच्छा सपोर्ट मिलता है, लेकिन उत्तर भारतीयों के खिलाफ राज ठाकरे की पुरानी छवि रही है। एग्जिट पोल और नतीजों से लगता है कि उत्तर भारतीय वोटरों ने भाजपा-महायुति को ज्यादा समर्थन दिया। मनसे-शिवसेना यूबीटी का गठजोड़ ज्यादा असर नहीं दिखा सका।
4. भाजपा ने पूरी ताकत लगाई
भाजपा ने बीएमसी चुनाव को बहुत गंभीरता से लिया। खुद देवेंद्र फडणवीस ने कमान संभाली, जमकर प्रचार किया। महाराष्ट्र के कई मंत्री और नेता मैदान में उतरे। उद्धव और राज ठाकरे ने भी रैलियां कीं, भीड़ जुटाई, लेकिन वोट में तब्दील नहीं हो सका। महायुति का प्रचार और संगठन ज्यादा मजबूत रहा, जो नतीजों में साफ दिखा।
5. उद्धव के खिलाफ एंटी इनकमबेंसी
बीएमसी पर ठाकरे परिवार का लंबे समय से राज रहा। पिछले तीन दशक से उनका कब्जा था। लंबे समय तक सत्ता में रहने से लोगों में नाराजगी बनी। विकास के कामों में कमी या पुरानी शिकायतों का फायदा भाजपा को मिला। साथ ही शिंदे की शिवसेना का साथ मिलने से महायुति का पलड़ा भारी हो गया। ये वजहें मिलकर महायुति को ऐतिहासिक जीत दिलाईं और मुंबई में पहली बार भाजपा का मेयर बनने का रास्ता साफ हुआ।














