Masik Shivratri 2026: 16 जनवरी को मासिक शिवरात्रि, जानिए क्यों रखा जाता है ये व्रत और क्या है इसकी कथा?
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Masik Shivratri 2026: 16 जनवरी को मासिक शिवरात्रि, जानिए क्यों रखा जाता है ये व्रत और क्या है इसकी कथा?

पौराणिक मान्यता है कि इस व्रत को रखने से शिवजी प्रसन्न होते हैं और सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि जो व्यक्ति इस व्रत को रखता है उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है।

Written byLalit FularaLalit Fulara
Jan 15, 2026, 03:44 pm IST
inधर्म-संस्कृति

Masik Shivratri 2026 Vrat Katha: 16 जनवरी यानी शुक्रवार को मासिक शिवरात्रि का व्रत है। पौराणिक मान्यता है कि इस व्रत को रखने से शिवजी प्रसन्न होते हैं और सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि जो व्यक्ति इस व्रत को रखता है उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है। इस दिन व्रत रखने के साथ ही कथा पाठ ((Masik Shivratri Vrat Katha) का भी बेहद महत्व है। आइए मासिक शिवरात्रि व्रत कथा जानते हैं। 

चित्रभानु शिकारी से जुड़ी है इस व्रत की कथा
प्राचीन समय में एक चित्रभानु नामक शिकारी था। शिकार के जरिए ही उसके परिवार का भरण-पोषण होता था। वह एक साहुकार का कर्जदार था। आर्थिक परेशानियों के कारण उसका जीवन कष्टमय बीत रहा था। कर्ज न चुकाने के कारण एक दिन साहुकार ने उसे शिवमठ में बंदी बना लिया। जिस दिन उसे बंदी बनाया गया उस दिन मासिक शिवरात्रि थी।

मासिक शिवरात्रि के कारण शिवमठ में भजन कीर्तन और शिव उपासना हो रही थी। उसने भी कथा सुनी और जब साहुकार ने उसे बुलाया तो उसने अगले दिन तक ऋण चुकाने का वादा किया। साहुकार की कैद से छूटकर वह शिकार के लिए जंगल चले गया। सूर्यास्त तक जब उसे कोई शिकार नहीं मिला तो वह एक तालाब के पास पहुंचा और जल पीकर सुस्ताने के लिए बेल के पेड़ पर चढ़ गया। उस पेड़ के नीचे एक शिवलिंग था जो बेलपत्र से ढका हुआ था। पेड़ पर बैठे-बैठे शिकारी बेलपत्र तोड़ता रहा और संयोगवश वो बेलपत्र नीचे शिवलिंग पर गिरते रहे। कुछ समय बाद उसे  तालाब के किनारे एक हिरणी दिखी।

शिकारी की हिरणी पर दया और शिव का प्रसन्न होना
चित्रभानु ने हिरणी को मारने के लिए धनुष पर तीर चढ़ाया। उसे देखकर हिरणी ने कहा कि वो गर्भवती है इसलिए उसका शिकार न करे। हिरणी ने शिकारी से वादा किया कि प्रसव के बाद वो शिकारी के पास लौटेगी। शिकारी के मन में दया का भाव जाग गया और उसने उसे उस समय नहीं मारा। प्रसव के बाद जब उसने हिरणी को फिर मारना चाहा तो उसने कहा कि वो अपने पति की तलाश में है, उसे अभी न मारे। हिरणी ने शिकारी से कहा कि पति के मिलने के बाद वो खुद शिकारी के पास आ जाएगी। चित्रभानु ने  हिरणी को जाने दिया और धनुष पर चढ़ा बाण वापस खींच लिया। इस दौरान कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर गिर गए और रात्रि के दूसरे पहर की पूजा भी संपन्न हो गई।

हिरणी फिर जब उसे दिखी तो इस बार भी उसने कहा कि मुझे अभी मत मारो मैं अपने बच्चों को इनके पिता के पास छोड़कर आ जाऊं उसके बाद जब मैं वापस लौट जाऊंगी तो आप मेरा शिकार कर सकते हैं। यह बात सुनकर शिकारी का मन भावुक हो गया और उसने हिरणी को छोड़ दिया। फिर उसे हिरन दिखा और वह उसे मारने को तैयार हुआ तो हिरन ने भी न मारने की विनती की। हिरण ने कहा कि आपने मेरी तीनों पत्नियों और बच्चों को मार दिया है तो आप मुझे भी मार दें। लेकिन अगर आपने उन्हें नहीं मारा है तो एक बार आप मुझे उनसे मिलने दें। नहीं तो वो सब वियोग में मर जाएंगे। शिकारी को फिर दया आ गई और उसने धनुष पर चढ़े बाण को वापस खींच लिया। इस दौरान भी कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर गिर गए और रात्रि के अंतिम प्रहर की पूजा भी अनजाने में शिकारी ने पूरी कर दी।

जंगल के पशुओं की निष्ठा और वचनबद्धता देखकर चित्रभानु का मन बदल गया। अगले दिन उसने साहुकार का कर्ज लौटा दिया। वो मेहनत करने लगा और शिव जी की उसपर कृपा हुई। धीरे-धीरे वो वैभव संपन्न हो गया और मृत्यु के समय उसे लेने यमराज आए तो शिवगणों ने उन्हें भगा दिया। चित्रभानु को शिवलोक की प्राप्ति हुई। इस व्रत के दिन घरों में यह कथा सुनाई जाती है और व्रत रखने वाले भी इस कथा को पढ़ते हैं।

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Lalit Fulara
Lalit Fulara
उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले के सुदूर स्थित छोटे से गाँव 'पटास' में पैदाइश. कला-साहित्य में विशेष रुचि. पहला नॉवेल 'घासी: लाल कैंपस का भगवाधारी' प्रकाशित. विगत 12 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय. करियर की शुरुआत दैनिक भास्कर से हुई और उसके बाद ज़ी न्यूज़, न्यूज़18, राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला और इंडियाडॉटकॉम होते हुए वर्तमान में पांचजन्य डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर के तौर पर कार्यरत. पत्रकारिता में एम.ए माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के नोएडा कैंपस से किया है. [Read more]
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