बलूचिस्तान की आजादी के लिए आवाज उठाते आ रहे बलूच संगठन फ्री बलूच मूवमेंट के प्रमुख बलूच नेता ने ईरान और पाकिस्तान की ईंट से ईंट बजाने का आह्वान किया है। इस बलूच नेता ने इन दोनों देशों के खिलाफ एक साथ संघर्ष शुरू करने की अपील की है। उसका कहना है कि बलूचिस्तान को इन देशों की आधुनिक गुलामी से मुक्त कराना है।
ये बलूच नेता है, हर्बयार मरी। हर्बयार ने दो दिन पहले सोशल मीडिया पर बयान जारी किया है जिसमें उसने कहा है, “कल ईरानी कब्जे वाले बलूचिस्तान के कई शहरों, जैसे जाहेदान, चाबहार, ईरानशहर और कोनार्क में ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने बलूच नागरिकों पर हमले किए हैं। बलूच लोग अब इसे और बर्दाश्त नहीं करेंगे। कब्जा करने वाले हमारे साथ जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, अब समय आ गया है कि हम भी उन्हें उसी भाषा में जवाब दें। तभी वे समझेंगे।” उसने आगे कहा, “उसी भाषा में जवाब देने से ही हमें आजाद और स्वतंत्र बलूचिस्तान मिलेगा। अब समय आ गया है कि हम बलूचिस्तान और दूसरे कब्जे वाले क्षेत्रों को ईरान और पाकिस्तान की आधुनिक गुलामी और कब्जे से आजाद करें।”
इसी बयान में मरी ने बलूच लोगों से उक्त दोनों देशों के कब्जे के खिलाफ एकजुट होकर खड़े होने का आह्वान किया है। उसने कहा है कि दशकों से अंतरराष्ट्रीय समुदाय बलूचों की पीड़ा को अनदेखा करता आ रहा है।
बलूचिस्तान असल में पाकिस्तान, ईरान और अफगानिस्तान में बंटा क्षेत्र है। 1947-48 में पाकिस्तान ने बलूचिस्तान को जबरन अपने में मिला लिया था, जबकि ईरान ने सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत के रूप में अपना हिस्सा कायम रखा था। बलूच लोग अपनी सांस्कृतिक पहचान, भाषा और संसाधनों को किसी भी बाहरी कब्जे से मुक्त कराना चाहते हैं। 1970 के दशक से पाकिस्तान में कम से कम पांच विद्रोह हुए थे, जबकि ईरान में भी इस दृष्टि से जुदावल्लाह जैसे संगठन सक्रिय हैं। बलूचों का दावा है कि गैस, तांबा और बंदरगाह जैसे संसाधनों से होने वाली कमाई को उन पर खर्च नहीं किया जाता और उन्हें दोयम दर्जे की जिंदगी गुजारने को मजबूर किया जाता है।
क्यों चाहिए पाकिस्तान से आजादी
पाकिस्तान में बलूचों को लंबे समय से मानवाधिकार उल्लंघन का सामना करना पड़ रहा है। और यह कोई छुपा तथ्य नहीं है। दुनियाभर के अखबारों में और वहां बसे बलूचों के विरोध प्रदर्शनों में यह बात खुलकर सामने आती रही है कि बलूचों के साथ पाकिस्तानी फौज बहुत बुरा व्यवहार करती है। बलूच युवाओं को जबरन अगवा कर लेना, उनमें से कई की हत्याएं कर देना और आवाज उठाने पर सैन्य दमन झेलना पड़ रहा है।
इतना ही नहीं चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) परियोजना ने ग्वादर बंदरगाह के कारण स्थानीय असंतोष को बढ़ाया ही है, क्योंकि इस्लामाबाद के तमाम वादों के बावजूद बलूचों को इससे कोई लाभ नहीं मिला है। हर्बयार मरी जैसे नेता पाकिस्तानी सेना को ‘कब्जा करने वाली फौज’ बताते हैं। हाल के वर्षों में बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने पाकिस्तानी सेना पर कई हमले किए हैं जिनमें पाकिस्तान के अनेक फौजी मारे भी गए हैं। इसके अलावा आएदिन बलूच विद्रोही सेना और चीनियों के विरुद्ध जहां—तहां हमले करते रहे हैं। मरी का उक्त आह्वान इन सब मानवाधिकार से जुड़े प्रश्नों से उपजा लगता है।

ईरान से क्या है नाराजगी
ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान में निवास कर रहे सुन्नी बलूच वहां की शिया बहुल सरकार के खिलाफ ही रहे हैं। उन क्षेत्रों में बलूच नागरिकों पर हिंसक हमले किए गए हैं। इनके अलावा बेवजह की गिरफ्तारियां और मानसिक दमन के आरोप भी समय समय पर उठते रहे हैं। मरी ने विशेष रूप से जाहेदान और चाबहार जैसे शहरों में हाल के हमलों का जिक्र किया। ईरान में बलूचों को आर्थिक रूप से पिछड़ा बनाए रखा जाता है, उनसे मजहबी भेदभाव होना तो आम हो चला है। जुदावल्लाह संगठन वहां की सत्ता के खिलाफ आवाज उठाता रहता है। मरी अपने बयान में ईरान की नीतियों को ‘क्रूर’ बताता है, जो कुर्दों और अन्य अल्पसंख्यकों पर भी लागू होती हैं।
ट्रंप के बयान का स्वागत
एक अन्य प्रसिद्ध बलूच नेता मीर यार बलूच ने मरी के इस बयान की तारीफ की है। मीर यार ने बयान को दूरदर्शी बताया है। इस बलूच नेता ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान की तारीफ की है जिसमें ट्रंप ने ईरान के आम लोगों के प्रदर्शनों को कूटनीतिक संबल देने का इशारा किया है। बलूचों के अनुसार, ट्रंप का यह आह्वान ग्रेटर बलूचिस्तान की अवधारणा को मजबूत करता है। हालांकि, पाकिस्तान और ईरान ने इसे ‘आतंकवादी गतिविधि’ बताया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि हर्बयार की यह अपील बलूच आंदोलन को एक नई दिशा दे सकती है। सीमा पर ईरान-पाकिस्तान तनाव पहले से ही बढ़ा ही है। यदि बलूच एकजुट होते हैं तो CPEC और ईरानी बंदरगाह इससे प्रभावित हो सकते हैं।

फ्री बलूचिस्तान मूवमेंट के इसी नेता हुरबयार मरी ने 2024 में पंजगुर में ईरान और पाकिस्तान के संयुक्त हवाई हमले की निंदा की थी और उसे बलूचों के खिलाफ साझा दमन के सबूत के तौर पर उछाला था। उसका का कहना था कि अगर ईरान और पाकिस्तान बलूच प्रतिरोध को दबाने के लिए हाथ मिला सकते हैं, तो बलूच समर्थकों को भी आत्मनिर्णय के लिए एकजुट होना चाहिए।

















