छापीहेड़ा हिंदू सम्मेलन: सामाजिक समरसता, स्वदेशी और संस्कारों की जीवंत यात्रा
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छापीहेड़ा हिंदू सम्मेलन: सामाजिक समरसता, स्वदेशी और संस्कारों की जीवंत यात्रा

21 से 31 दिसंबर 2025 तक मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के छापीहेड़ा में सकल हिंदू समाज द्वारा आयोजित 11 दिवसीय उत्सव ने सामाजिक समरसता, स्वदेशी चेतना, संस्कारों की पुनर्स्थापना और नारी शक्ति के सम्मान का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।

Written byपाञ्चजन्यपाञ्चजन्य — edited by कुलदीप सिंह
Jan 11, 2026, 02:38 pm IST
in मध्य प्रदेश
Chhapihera Hindu sammelan

मध्यभारत प्रांत के राजगढ़ जिले के छापीहेड़ा जैसे अपेक्षाकृत छोटे नगर में 21 से 31 दिसंबर 2025 के बीच जिस प्रकार का सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक वातावरण निर्मित हुआ, वह केवल एक आयोजन नहीं था, बल्कि सामूहिक चेतना का सजीव रूप था। यह ग्यारह दिवसीय उत्सव इस बात का प्रमाण बना कि जब समाज बिना किसी आग्रह, विवाद या प्रदर्शन की प्रवृत्ति के, केवल अपने मूल्यों और दायित्वों के प्रति सजग होकर आगे बढ़ता है, तो वह स्वयं एक उदाहरण रच देता है। छापीहेड़ा के सकल हिंदू समाज द्वारा आयोजित यह क्रमबद्ध आयोजन नगर के इतिहास में लंबे समय तक स्मरणीय रहेगा।

इस पूरे आयोजन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी निरंतरता और व्यापकता रही। यह कोई एक दिन का सम्मेलन या एक मंचीय कार्यक्रम नहीं था, बल्कि सुबह की प्रभातफेरियों से लेकर रात्रि की महाआरती तक, साधना से लेकर संवाद तक, पूजा से लेकर सामाजिक सम्मान तक और योग से लेकर वैचारिक विमर्श तक फैला हुआ एक सुविचारित उत्सव था। इसमें आयु, वर्ग, जाति, पेशा या लिंग का कोई भेद दिखाई नहीं दिया। महिलाएं, पुरुष, युवा, बच्चे, वरिष्ठ नागरिक, विद्यार्थी, कर्मचारी, व्यापारी, गोपालक, मातृशक्ति, संत और कथावाचक सभी इस यात्रा के सहभागी बने।

संस्कारों की पुन: स्थापना का प्रयास

उत्सव की शुरुआत जिस वातावरण में हुई, वही पूरे आयोजन की दिशा तय करता है। प्रभात के समय नगर की गलियों में भजन, कीर्तन और रामधुन के स्वर गूंजना केवल धार्मिक गतिविधि नहीं थी, बल्कि यह दिनचर्या में संस्कारों की पुनः स्थापना का प्रयास था। प्रतिदिन प्रातः 5:15 बजे निकाली गई रामधुन संकीर्तन यात्रा ने यह सिद्ध किया कि यदि समाज ठान ले तो अनुशासन और निरंतरता कोई कठिन लक्ष्य नहीं है। सैकड़ों लोगों की नियमित उपस्थिति यह दर्शाती है कि यह आयोजन लोगों के जीवन का हिस्सा बन गया था, न कि केवल देखने या सुनने का विषय।

प्रभातफेरियों और संकीर्तन यात्राओं ने नगर के वातावरण को शोर या प्रदर्शन से नहीं, बल्कि सौम्यता और श्रद्धा से भर दिया। यह एक ऐसा वातावरण था जहां भक्ति और सामाजिक अनुशासन एक-दूसरे के पूरक बनकर सामने आए। लोग बिना किसी आग्रह के समय पर निकलते, मार्ग तय रहता, गीत तय रहते और पूरा नगर धीरे-धीरे इस लय में ढलता चला गया।

स्वदेशी पर जोर

इस उत्सव का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी रहा कि इसमें राष्ट्र और समाज से जुड़े विषयों को सहज रूप से जोड़ा गया। मानव श्रृंखला का आयोजन केवल प्रतीकात्मक नहीं था। इसमें विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता यह दर्शाती है कि भावी पीढ़ी को केवल भाषणों से नहीं, बल्कि अनुभव के माध्यम से जोड़ा गया। दो किलोमीटर लंबी श्रृंखला, हाथों में तख्तियां, नारों की जगह संदेश और विदेशी सामान की होली के माध्यम से स्वदेशी का आग्रह, यह सब किसी विरोध के स्वर में नहीं, बल्कि आत्मबोध के भाव से किया गया। संदेश स्पष्ट था कि आत्मनिर्भरता कोई नारा नहीं, बल्कि रोजमर्रा के व्यवहार से जुड़ा विषय है।

धार्मिक आयोजनों में भी यही संतुलन दिखाई दिया। सामूहिक गो पूजन, सत्यनारायण कथा, सुंदरकांड पाठ, हनुमान चालीसा और महाआरती जैसे कार्यक्रमों में आस्था के साथ-साथ सामूहिकता का भाव प्रमुख रहा। गो पूजन के अवसर पर गोपालकों की सहभागिता ने यह बताया कि परंपरा और आजीविका एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। गोमाता के माध्यम से संस्कृति, कृषि और पर्यावरण तीनों का संदेश एक साथ सामने आया।

सामाजिक समरसता से जुड़े कार्यक्रम इस उत्सव की आत्मा कहे जा सकते हैं। वाल्मीकि समाज और स्वच्छता कर्मियों का सम्मान केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था। यह नगर की उस मौन शक्ति को पहचानने का प्रयास था, जो प्रतिदिन बिना किसी प्रशंसा की अपेक्षा के अपना दायित्व निभाती है। वक्ताओं द्वारा जाति और सामाजिक विभाजन के ऐतिहासिक संदर्भों को सरल भाषा में समझाना और समाज को जोड़ने का आग्रह करना इस आयोजन को वैचारिक गहराई प्रदान करता है। यहां किसी प्रकार की कटुता या आरोप नहीं था, बल्कि भविष्य की दिशा स्पष्ट करने का प्रयास था। नागरिक कर्तव्य प्रदर्शनी और प्रश्नोत्तरी जैसे कार्यक्रमों ने यह सिद्ध किया कि यह उत्सव केवल भावनाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि नागरिक बोध और बौद्धिक सहभागिता को भी समान महत्व दिया गया। बच्चों और युवाओं को मंच देने से उनमें आत्मविश्वास और जुड़ाव दोनों बढ़ा।

नारी तय करती है समाज की दिशा

मातृ सम्मेलन इस आयोजन का विशेष अध्याय रहा। यहां नारी शक्ति को केवल प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि समाज की दिशा तय करने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया। शबरी और श्रीराम के प्रसंग के माध्यम से समरसता का संदेश देना केवल कथा नहीं था, बल्कि व्यवहारिक सामाजिक दृष्टि का उदाहरण था। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संकल्प इस बात के प्रमाण थे कि यह आयोजन अतीत की स्मृति तक सीमित नहीं, बल्कि भविष्य की चिंता से भी जुड़ा हुआ है।

शस्त्र और शास्त्र पूजन, योग और ध्यान जैसे कार्यक्रमों ने भारतीय जीवन दृष्टि के संतुलन को रेखांकित किया। यहां शक्ति और शांति, अनुशासन और आत्मसंयम, परंपरा और आधुनिकता के बीच कोई टकराव नहीं, बल्कि सामंजस्य दिखाई दिया। उत्सव के अंतिम चरण में आयोजित कलश यात्रा और विशाल हिंदू सम्मेलन ने इस पूरे आयोजन को एक व्यापक स्वरूप प्रदान किया। हजारों की संख्या में मातृशक्ति की सहभागिता, वस्त्रों की एकरूपता, अनुशासित पदयात्रा और नगरवासियों की स्वाभाविक सहभागिता ने यह स्पष्ट किया कि यह आयोजन किसी एक संस्था या समूह तक सीमित नहीं था। पूरा नगर इसमें सहभागी बन चुका था।

शोभायात्रा की झांकियां, पुष्पवर्षा और संतों का स्वागत किसी प्रदर्शन की भावना से नहीं, बल्कि उत्सव और सम्मान के भाव से किया गया। धर्मसभा में वक्ताओं के संबोधन भी इसी संतुलन को दर्शाते हैं। हिंदू एकता, जागृति, सेवा और संगठन जैसे विषयों को बिना उग्रता, बिना नकारात्मकता और बिना किसी तुलना के प्रस्तुत किया गया। पंडित प्रदीप मिश्रा द्वारा घर और परिवार से संस्कारों की शुरुआत की बात, साध्वी रंजना दीदी द्वारा संगठन की आवश्यकता पर दिया गया संदेश और हेमंत मुक्तिबोध द्वारा संगठनात्मक सेवा पर रखा गया दृष्टिकोण, तीनों मिलकर इस उत्सव की वैचारिक परिधि को पूर्ण करते हैं। यहां न तो किसी के प्रति विरोध था और न ही किसी प्रकार की अतिशयोक्ति। यह आत्मचिंतन और आत्मनिर्माण की प्रक्रिया थी।

छापीहेड़ा का यह ग्यारह दिवसीय आयोजन इस अर्थ में भी महत्वपूर्ण है कि इसमें कोई जल्दबाजी नहीं थी। हर दिन का अपना स्वर, अपना उद्देश्य और अपनी गति थी। लोगों को जोड़ने के लिए शोर नहीं, बल्कि सहभागिता का सहारा लिया गया। यही कारण है कि यह आयोजन समाप्त होने के बाद भी नगर के जीवन में अपनी छाप छोड़ गया।

यह आयोजन इस बात का उदाहरण है कि समाज यदि अपने मूल्यों के साथ खड़ा हो, तो बिना किसी टकराव के भी व्यापक और प्रभावशाली कार्य संभव है। छापीहेड़ा ने यह दिखाया कि सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय दायित्व जब एक सूत्र में बंधते हैं, तो एक साधारण नगर भी असाधारण उदाहरण बन सकता है।

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