उत्तराखंड हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक जरूरी कानूनी फैसले में यह साफ कर दिया है कि प्राइवेट तौर पर चलाए जा रहे मकतब मदरसों में काम करने वाले इंस्ट्रक्टर सरकारी स्कूलों या एजुकेशन गारंटी स्कीम सेंटर्स में तैनात शिक्षा मित्रों जैसे सरकारी सर्विस में वही फायदे या एडजस्टमेंट का दावा नहीं कर सकते। जस्टिस रवींद्र मैथानी और जस्टिस आलोक मेहरा की डिवीजन बेंच ने राज्य की स्पेशल अपील को स्वीकार करते हुए कहा था कि सिंगल बेंच के आदेश से इंस्ट्रक्टरों को राहत मिलेगी।
खंडपीठ ने सिंगल बेंच का फैसला पलटा
मामले के अनुसार हरिद्वार जिले के विभिन्न मकतब मदरसों में काम करने वाले अनुदेशकों ने खुद को शिक्षा मित्र के रूप में समायोजित करने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। सिंगल बेंच ने 17 नवंबर 2017 को उनके पक्ष में फैसला देते हुए उन्हें शिक्षा आचार्य और शिक्षा मित्र के समान लाभ देने का आदेश दिया था। राज्य सरकार ने इस निर्णय को दायर की थी। सुनवाई के आधार पर कोर्ट ने पाया कि ईजीएस और एआईई केंद्र सरकार की ओर से सर्व शिक्षा अभियान के तहत स्थापित किए गए थे। वहां नियुक्तियां ग्राम शिक्षा समितियों के माध्यम से सरकारी नियमों के तहत होती थीं। इसके विपरीत, मकतब मदरसों का संचालन निजी प्रबंध समितियों की ओर से किया जाता था। वहां अनुदेशकों की नियुक्ति बिना किसी विज्ञापन या सरकारी अनुमोदन के की गई थी। कोर्ट ने कहा कि सरकार की ओर से मदरसों केवल वित्तीय सहायता प्रदान की गई थी। उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि मात्र वित्तीय सहायता मिलने से किसी निजी संस्थान के कर्मचारी को सरकारी सेवा में नियमितीकरण का कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता।
कोर्ट जरू ने यह भी कहा कि एनसीटीई के 2010 जिनके नियमों के अनुसार, प्राथमिक शिक्षकों जम के लिए डीएलएड और टीईटी अनिवार्य लिए योग्यताएं हैं। याचिकाकर्ता इन निर्धारित योग्यताओं को पूरा नहीं करते थे और ना ही उनकी नियुक्ति किसी वैध चयन कोर्ट ने माना कि एकलपीठ ने तथ्यों कुर्कन और कानूनी स्थिति को समझने में त्रुटि कानू की थी। मदरसा अनुदेशकों के पास वाले समायोजन का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है क्योंकि उनकी नियुक्ति पूर्णतः निजी और गैर-सरकारी थी।

















