अमेरिका के हाल के इतिहास में पहली बार आस्था और पंथ को व्यवसाय संचालन, अर्थव्यवस्था, निवेश और भर्ती का आधार बनाया जा रहा है। विविध संस्कृतियों को महत्व देना देश के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसकी आत्मा है। लेकिन ‘ईसाई राष्ट्र’ के नाम पर कंपनियों को तीसरी दुनिया के कम मेहनताने पर प्रतिभाशाली लोगों की भर्ती पर ‘पुनर्विचार’ करने का सुझाव घोर अन्यायपूर्ण है।
‘टर्निंग पॉइंट’ के ‘अमेरिका फर्स्ट-2025’ सम्मेलन में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेंडी. वेंस ने कहा, ‘‘अमेरिका एक ‘ईसाई राष्ट्र’ है। हमें अपनी नौकरियां विदेशों के सस्ते श्रमिकों से बचानी होंगी। अन्य देशों के लोगों को प्रतिस्पर्धी शर्तों पर नौकरी देना ‘सच्ची ईसाई राजनीति’ नहीं है।’’ वेंस को आईना दिखाने की जरूरत है। उनकी ये टिप्पणियां अमेरिकी राजनीति के लिए खतरनाक साबित हो सकती हैं। भले ही, ज्यादातर लोग राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप या उपराष्ट्रपति वेंस की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति की शिकायत नहीं करेंगे, लेकिन भर्ती, रोजगार, व्यवसाय संचालन को पंथ या आस्था से जोड़ना अस्वीकार्य है।
2028 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव अभियान के लिए बेसब्र रिपब्लिकन पार्टी ने वैचारिक रूप से हद पार कर दी है। वह एक साम्प्रदायिक और राजनीतिक रूप से खतरनाक एजेंडा चला रहा है। भले ही आज अलग-अलग संप्रदायों के ईसाई अमेरिका में बहुसंख्यक हैं, लेकिन यह भी याद रखना होगा कि अमेरिका रेड इंडियंस की लाशों पर खड़ा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में व्यवसाय संचालन और कर्मचारियों की भर्ती लचीली होनी चाहिए, जो उनकी शिक्षा, प्रशिक्षण, प्रतिभा, मूल्य-संवर्धन, उपलब्धियों और लागत पर आधारित हो।
अमेरिका में व्यवसाय और उद्योग शायद जेडी वेंस को अधिक गंभीरता से न लें और अपने बहुत सारे कर्मचारियों को सिर्फ इसलिए नौकरी से न निकालें, क्योंकि वे ईसाई नहीं हैं या उनकी विशेषता वाले राजनीतिक एजेंडे से सहमत नहीं हैं। अगर कंपनियां प्रतिभा ढूंढने में अपनी पसंद को सिर्फ अमेरिकी ईसाइयों तक सीमित कर देती हैं, जैसा कि वेंस ने सुझाव दिया है, तो नास्तिकों, संशयवादियों और दूसरे अल्पसंख्यकों की बड़ी आबादी का क्या होगा? हालांकि 162 मिलियन प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक ईसाइयों को खुश करने की लालसा भले ही लुभावनी हो, लेकिन प्रतिभा और आर्थिक मूल्य के मामले में उनके योगदान की परवाह किए बिना, अंदर और बाहर के अन्य लोगों को ठुकराना कम समय के लिए भी असंभव है।
क्या जेडी वेंस अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मूल्यवान योगदान देने वालों के खिलाफ माहौल बना रहे हैं? क्या वेंस को नहीं पता कि कितने विश्वविद्यालय और संस्थान सिर्फ विदेशी छात्रों और पेशेवरों की वजह से ही चल रहे हैं? क्या वेंस ‘ईसाई और अन्यों’ के बीच विभाजनकारी, आक्रामक राजनीतिक अभियानों का खाका तैयार कर रहे हैं? अमेरिका के सांस्कृतिक और सभ्यतागत विकास ने इसे ‘उच्च मूल्य वाले कर्मचारियों की भूमि’ बनाने पर जोर दिया है, चाहे वे किसी भी मूल के हों या उन्हें कितना भी वेतन मिलता हो। क्या वेंस पांथिक अल्पसंख्यकों के योगदान को नहीं समझते, जिनमें यहूदी, हिंदू, बौद्ध, जैन या अश्वेत लोग शामिल हैं?
जॉर्ज वाशिंगटन के समय से ही संयुक्त राज्य अमेरिका की शासन-प्रणाली में चर्च का बड़ा प्रभाव रहा है। हालांकि, राज्य के कामकाज में पांथिक दखलंदाजी के खिलाफ जबरदस्त विरोध भी रहा। अब कट्टर कैथोलिक बने वेंस इसे निजी कंपनियों तक फैलाने की योजना बना रहे हैं। यह एक ऐसा कदम है, जिसे अपनाने से अमेरिकी व्यवसायों पर गहरे प्रभाव पड़ेंगे, क्योंकि दुनिया भर से प्रतिभा की आसान पहुंच ने ही इन्हें अब तक टिकाए रखा है। प्रतिभा की कमी या सीमित विकल्पों का मतलब होगा अमेरिकी अर्थव्यवस्था के औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों में उच्च मूल्य शृंखला में खालीपन आना।
इसलिए कई विश्लेषकों ने यह बड़ा सवाल उठाया है कि क्या अमेरिका पर देश के संविधान से शासन होगा या एपोस्टल्स से? क्या बिल ऑफ राइट्स पर ‘टेन कमांडमेंट्स’ हावी हो जाएंगे? ट्रंप प्रशासन के कई नीति-निर्माताओं का मानना है कि जेडी वेंस की ईसाई राष्ट्र की सोच चीन से प्रतिस्पर्धा करने के लिए सबसे प्रतिभाशाली और योग्य मानव संसाधनों की भर्ती में बाधा बन सकती है। विशेषाधिकारपूर्ण या प्रतिबंधात्मक नीतियां न केवल अन्य समुदायों के लिए अवसरों को सीमित करेंगी, बल्कि शीर्ष प्रौद्योगिकी दिग्गजों को अपने निवेश अधिक प्रतिस्पर्धी, लचीले और खुले बाजारों में स्थानांतरित करने के लिए मजबूर कर देंगी।
(लेखक नई दिल्ली स्थित गैर-राजनीतिक थिंक टैंक ‘सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड एंड होलिस्टिक स्टडीज’ के निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी हैं)

















