भारत के पड़ोसी जिन्ना के कंगाल और हर देश के आगे भीख का कटोरा फैलाने वाले देश और सऊदी अरब के बीच संबंधों में हमेशा एक जटिलता ही देखने में आई है। लेकिन इधर दो विरोधाभासी घटनाओं ने इन संबंधों पर एक अलग ही रुख दिखाया है। एक ओर तो सऊदी अरब ने अभी दो दिन पहले 56,000 से ज्यादा पाकिस्तानी भिखारियों को अपने देश में भीख मांगने के आरोप में गिरफ्तार कर उनके देश वापस लौटाया है। इस कदम से पाकिस्तानी गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने इसे देश की बेइज्जती तक करार दे दिया और बड़ी नाक—भौं सिकोड़ी हैं। लेकिन इसके बरअक्स, उसी सऊदी अरब ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ किंग अब्दुलअजीज’ भी प्रदान किया है। यह विरोधाभासी कदम सऊदी-पाकिस्तान संबंधों को एक अलग ही आयाम देते दिख रहे हैं। यह वह देश है जो मुस्लिम ब्रदरहुड के नाम पर कंगाल पाकिस्तान का भीख का कटोरा भरता रहा है।
मुनीर को सम्मान की पृष्ठभूमि
जनरल असीम मुनीर को दिया गया सम्मान अपने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उस देश के इस सर्वोच्च सम्मान को आज ही रियाद में सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान द्वारा प्रदान किया गया। यह पाकिस्तान के किसी सेना प्रमुख को मिला सऊदी का सर्वोच्च सम्मान है, जो ‘राजा अब्दुलअजीज के आदेश’ के तहत दिया जाता है। मुनीर ने इसे ‘पाकिस्तान-सऊदी भाईचारे’ का प्रतीक बताया है। सम्मान समारोह में मुनीर ने सऊदी नेतृत्व की प्रशंसा की और दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई।
यह सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक प्रकार से एक रणनीतिक संदेश है। सऊदी अरब क्षेत्रीय अस्थिरता—ईरान, हूती विद्रोहियों और यमन संकट—के बीच पाकिस्तान की सैन्य क्षमता पर भरोसा करता दिख रहा है। सम्मान के लिए मुनीर का चयन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि 2022 में आर्मी चीफ का पद संभालने वाले मुनीर ने तत्कालीन इमरान खान सरकार के साथ तनावपूर्ण संबंधों के बावजूद अपनी सेना को मजबूत किया था। सऊदी अरब ने मुनीर को सम्मानित कर पाकिस्तानी सेना के साथ अपनी नजदीकियां बढ़ाने के संकेत दिए हैं। खासकर नवाज शरीफ सरकार के सत्ता में आने के बाद यह दोनों देशों के बीच एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है। यह कदम सऊदी के ‘विजन 2030’ के तहत सैन्य आधुनिकीकरण से जुड़ा है, जहां पाकिस्तान जैसे सहयोगी देश महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
दोनों देशों में हुआ रक्षा समझौता
पिछले दिनों दोनों देशों ने एक प्रमुख रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। नवंबर 2024 में रियाद में हुई बैठक में पाकिस्तान ने सऊदी अरब को सैन्य सलाहकार सेवाएं, संयुक्त अभ्यास और हथियार आपूर्ति का वादा किया है। समझौते में JF-17 थंडर फाइटर जेट्स की आपूर्ति, ड्रोन तकनीक और साइबर सुरक्षा सहयोग शामिल है। सऊदी अरब ने इसके बदले पाकिस्तान को 5 अरब डॉलर का ऋण और तेल सब्सिडी दी है। यह समझौता 2019 के समझौते के समान है, जब सऊदी अरब ने पाकिस्तानी सैनिकों को यमन भेजने की मांग की थी, लेकिन तब इमरान खान ने इनकार कर दिया था। अब शरीफ सरकार ने इसे स्वीकार किया, जिससे सऊदी-पाकिस्तान सैन्य गठबंधन मजबूत होता दिख रहा है।
सऊदी अरब की पाकिस्तान से नजदीकी के कारण
सऊदी अरब पाकिस्तानी सेना से नजदीकियां क्यों बढ़ा रहा? इसके कई रणनीतिक कारण हैं। पहला है, सऊदी अरब ईरान के विस्तारवाद, हूती हमलों और कतर-तुर्की के प्रभाव से चिंतित है। पाकिस्तान की 6 लाख की सेना, परमाणु क्षमता और आतंकवाद विरोधी अनुभव उस खाड़ी देश के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं।
दूसरे, पाकिस्तान सऊदी अरब से सालाना 10-15 अरब डॉलर का तेल आयात करता है। बदले में सऊदी अरब निवेश चाहता है—ग्वादर पोर्ट, रियासत प्रोजेक्ट और आईएमएफ ऋण गारंटी चाहता है। मुनीर को मिला सम्मान सम्भवत: इसी आर्थिक-सैन्य सौदे का हिस्सा है। तीसरे, दोनों सुन्नी बहुल देश ओआईसी के माध्यम से सहयोग करते हैं। सऊदी अरब मुस्लिम दुनिया का नेता बनना चाहता है, जबकि पाकिस्तान की सेना मजहबी कट्टरपंथ से जूझ रही है। संयुक्त अभ्यास, जैसे ‘अल-शम्स’, इससे मजबूत होते हैं।
चौथी वजह सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का शाहबाज शरीफ को समर्थन देना है। शरीफ इमरान खान के खिलाफ हैं। मुनीर का सम्मान शरीफ सरकार को एक प्रकार से वैधता प्रदान करता है।
भिखारियों को लौटाने का मामला दोनों देशों के संबंधों में कुछ खटास तो लाया ही है। सऊदी अरब ने 2024 में 1 लाख से अधिक अवैध प्रवासियों को वापस भेजा था, जिसमें पाकिस्तानी सबसे ज्यादा थे। नकवी ने इसे ‘अपमानजनक’ बताया था और पाकिस्तानी मजदूरों की सुरक्षा की मांग की थी। लेकिन सरकारों के स्तर पर संबंध बने रहे थे। तब सऊदी ने इस कदम के फौरन बाद, 2 अरब डॉलर की भीख भी पाकिस्तान को दी थी।

















