यह संघ का शताब्दी वर्ष है, मुझे जून में नागपुर के वार्षिक कार्यक्रम में विशेष प्रमुख अतिथि बनने का अवसर प्राप्त हुआ। यह अवसर इसलिए भी अद्भुत था क्योंकि मेरा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बहुत गहरा व्यक्तिगत संबंध नहीं रहा, हालांकि राजनीति में रहने के कारण भारतीय जनसंघ और भाजपा से अवश्य जुड़ा रहा हूं। पहली बार जब मैं नागपुर गया, वहीं मेरी भेंट सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत से हुई। मैंने उनसे कहा, इस देश में एक कहावत है, ‘उगते सूरज को हर कोई सलाम करता है, डूबते सूरज को कोई नहीं करता।’ मैं तो डूबता सूरज भी नहीं हूं, मैं तो डूब चुका हूं, राजनीति से संन्यास ले चुका हूं और समाज में छोटा-मोटा कार्य करता रहता हूं। ऐसे में डूबते हुए आदमी को भी प्रमुख अतिथि बनाकर जो सम्मान संघ ने दिया, वह मेरे जीवन का अनोखा अनुभव है। आपने इस कहावत को झूठा साबित कर दिया।
दो दिन के प्रवास में संघ को समझने का प्रयास किया और एक उत्कृष्ट अनुभव के साथ नागपुर से लौटा। आज का विषय दो प्रमुख मुद्दों से जुड़ा है, पहला, कन्वर्जन, जो मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण विषय रहा है कि कन्वर्जन के विरुद्ध समाज को कैसे जागृत किया जाए। दूसरा, नक्सलवाद, क्योंकि मैं बस्तर से आता हूं और नक्सलवाद को शुरू से देखा है।
इस देश में नक्सलवाद या वामपंथी आंदोलन कोई नई बात नहीं है। आजादी से पहले भी निजाम-शाही क्षेत्र में भूमि आंदोलन हुए, बाद में नक्सलबाड़ी में बड़ा आंदोलन उठा। उस समय मैं संसद में था और इंदिरा जी की ओर से नक्सलवाद पर अध्ययन करने को कहा गया था। तब इस आंदोलन को समझने का अवसर मिला। मैंने कभी नहीं सोचा था कि बस्तर में वैसी ही स्थिति आएगी, जैसी कभी नक्सलबाड़ी में देखी गई थी।
नक्सलवाद की एक बात से मैं कभी सहमत नहीं रहा कि वे संविधान और कानून को नहीं मानते। राजनीति में रहते हुए हम कहते थे कि नक्सलियों को भी देश के निर्माण में संविधान और कानून के दायरे में रहकर कार्य करना चाहिए और गरीब, विशेषकर जनजातीय समाज का भला करना चाहिए। पर नक्सलवाद बाहरी ‘राजनीतिक थ्योरी’ पर आधारित था, और उसका दुष्प्रभाव देश ने लंबे समय तक झेला। यदि शुरुआत से ही उनकी सोच सकारात्मक होती, तो देश और जनजातीय समाज के लिए बहुत कुछ हो सकता था, परंतु ऐसा हुआ नहीं। संसद और मंत्रालय में रहते हुए मैंने नौकरशाहों और नेताओं से कई बार पूछा कि नक्सलवाद की जड़ क्या है, इसका मूल कारण क्या है? लेकिन कभी संतोषजनक उत्तर नहीं मिला।
जब शंकरराव चव्हाण केंद्रीय गृह मंत्री थे, मैंने उनसे कहा, आप नक्सलवाद पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं देते। उन्होंने कहा कि एक बार आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन.टी. रामा राव दिल्ली आए तो मैंने उनसे कहा था कि नक्सलवाद पर गंभीरता से काम करते हैं? इस पर उन्होंने उत्तर दिया कि चौहान साहब मेरे विधानसभा चुनाव में छह महीने बचे हैं, अभी कोई छेड़छाड़ मत कीजिए, बाद में देखेंगे। यह सुनकर मुझे समझ में आ गया कि समस्या का हल क्यों नहीं हुआ, क्योंकि जिस देश में कुछ राजनीतिक दल नक्सलियों की पूंछ पकड़कर वैतरणी पार करना चाहते हों, वहां समाधान कैसे मिलेगा?
उस समय कई राज्य ऐसे रहे, जिन्होंने नक्सलियों के प्रभाव का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की। कांग्रेस हमेशा इस नक्सलवाद के प्रति नरम रही, लेकिन भाजपा की सरकार आने के बाद नीति सख्त हुई। इस समस्या को आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगभग सुलझा दिया है, गृहमंत्री अमित शाह ने जो समाधान निकाला है वह आज सार्थक रूप से सामने आ रहा है।

















