भारत में जब भी केरल का नाम लिया जाता है तो हरे-भरे मैदान और साथ ही अप्पम, सांभर, रसम और पुत्तू जैसे व्यंजन याद आ जाते हैं। कहीं भी दक्षिण भारतीय स्टोर होता है तो वहाँ पर अप्पम आदि मिलते हैं। मगर अब केरल के स्वभाव का मिजाज बदलने लगा है, या कहें कि उसका अरबीकरण होने लगा है। केरल में अब स्थानीय स्वाद के स्थान पर शावरमा, मंडी जैसे स्वाद हावी हो गए हैं। ऐसा लग रहा है जैसे कि केरल के खानपान पर अतिक्रमण हो गया है या कब्जा हो गया है।
भारत में इस्लाम का प्रवेश और मोपिला मुस्लिम समुदाय
ऐसा कहा जाता है कि केरल ही पहला राज्य था, जहां से इस्लाम ने भारत में प्रवेश किया। और वह भी किसी सैन्य अभियान के कारण नहीं, अपितु व्यापार और शादी के द्वारा। केरल और अरब के बीच इस्लाम से पूर्व भी व्यापार होता था। इस्लाम के आगमन के बाद केरल में इस्लाम का आगमन भी अरब व्यापारियों के माध्यम से हुआ और वहाँ पर स्थानीय लोगों और अरब व्यापारियों की औलादों को मोपिला मुस्लिम कहा गया।
अरबी स्वाद का धीरे-धीरे विस्तार
धीरे धीरे इस्लाम का प्रभाव केरल पर बढ़ता गया। और उनके खानपान भी बदलते गए। या कहें जो स्थानीय था, उसी में कुछ न कुछ अरबी स्वाद जोड़ा जाता रहा। जब उन लोगों ने यहाँ की महिलाओं से शादी करने के बाद बच्चे पैदा करके अपना परिवार यहीं पर रखना आरभ किया तो यहाँ की महिलाओं ने अरब के लोगों के स्वाद के अनुसार ही खाना बनाना आरंभ कर दिया और इससे कई बाहरी व्यंजन स्थानीय व्यंजनों में शामिल हो गए और इसके चलते मोपिला व्यंजनों का आरंभ हुआ।
यूरोपीय शासन के बाद मोपिला प्रभाव का फिर बढ़ना
हालांकि यूरोपीय शासन के दौरान मोपिला प्रभाव कुछ कम हुआ था, मगर अब फिर से केरल के स्थानीय बाजारों में अरबी व्यंजनों की भरमार है। द प्रिन्ट ने हाल ही मे खानपान पर हुए अरबी कब्जे के विषय में एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। हालांकि काफी पहले से ही इस प्रभाव के विषय में लिखा जाता रहा है। 2022 में द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने भी केरल के खानपान पर अरबी प्रभाव को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी।
मालाबार क्षेत्र और मोपला इतिहास
इसमें उसने मालाबर क्षेत्र अर्थात मल्लपुरम, कोझिकोड, कन्नूर, पलक्कड, वायानद और कसर्गोडे का उल्लेख किया था। गौरतलब है कि ये वही क्षेत्र हैं, जहां पर वर्ष 1921 में मोपला मुसलमानों ने मालाबार के हिंदुओं का जीनोसाइड किया था। हालांकि लोग इसे किसान विद्रोह और अंग्रेजों के खिलाफ किया गया विद्रोह बताते हैं। जबकि ऐसा नहीं है। यह मालाबार के हिंदुओं को मारने का सुनियोजित कदम था और योजना थी। इसमें असंख्य हिन्दू मजहबी कट्टरता का शिकार हुए थे, जिनकी कहानियाँ आज तक सिहरा देती हैं।
मीडिया में मोपला पहचान का महिमामंडन
परंतु फिर भी इन क्षेत्रों की मोपला पहचान को मीडिया में गर्व के साथ बताया जाता है। और केरल पर इस अरबी अतिक्रमण को भी सगर्व ही लिखा जाता है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की वर्ष 2022 की इस रिपोर्ट में भी यही था कि कैसे मालाबार के स्वाद पूरे राज्य में अब फैल रहे हैं। और यह क्षेत्र केरल व्यंजनों के कैसे सबसे स्वादिष्ट स्वादों के लिए विख्यात है और कैसे कुछ सालों में अरब के व्यंजनों ने पूरे राज्य को अपनी गिरफ्त में ले लिया है।
स्थानीय व्यंजनों पर बढ़ता अरबी प्रभाव
इसमें शेफ सुरेश पिल्लई के हवाले से लिखा था कि पिछले दस वर्षों से अरब के व्यंजनों का प्रभाव केरल में बहुत तेजी से बढ़ रहा है। उन्होनें कहा था कि “मालाबार के खाने में फ़ारसी-अरबी का असर तो है, लेकिन इसमें स्थानीय चीजों का इस्तेमाल किया गया है। ये डिश केरल के खाने का हिस्सा हैं। वहीं, शावरमा और मंडी विदेशी डिश हैं जो अब मार्केट में धूम मचा रही हैं।”
क्या यह मोपलिस्तान के सपने की तरफ बढ़ता कदम?
तो क्या यह कहा जा सकता है कि मोपलिस्तान का सपना जो देखा गया था, वह अब सॉफ्ट अतिक्रमण के माध्यम से पूरा किया जा रहा है? क्योंकि किसी भी क्षेत्र की पहचान का एक बहुत बड़ा अंग उसके स्थानीय व्यंजन होते हैं, जो पूरी संस्कृति का निर्माण करते हैं, जो भूमि की पहचान को निर्धारित करते हैं। जैसे केरल अर्थात सांभर, रसम और चावल की भूमि।
अरबीकरण के बढ़ते संकेत
मगर जब वह मालाबार में अरबी अतिक्रमण के बाद मोपला मुस्लिमों की भूमि बनती है तो फिर शावरमा और मंडी वहाँ पर मुख्य हो जाते हैं।
द प्रिन्ट के अनुसार केरल में अब अरबी भोजन बहुत तेजी से बढ़ रहा है। केरल में कई विदेशी ब्रांड अरबी भोजन के साथ आ रहे हैं। जैसे कि मिस्र की डिज़र्ट चेन बी लाबान, जो पूरे राज्य में लाबान सफिक्स के साथ वहाँ की मिठाई उपलब्ध करा रही है।
यमन से टर्किश भोजन तक—तेजी से फैलता अरबी फूड कल्चर
इसमें लिखा है कि यमन से लेकर टर्किश भोजन केरल में तेजी से बढ़ रहे हैं। एक रेस्टोरेंट का नाम है जम जम रेस्टोरेंट। और इसका नाम मक्का में मुस्लिमों के लिए पाक कुएं ज़मज़म का संदर्भ देता हुआ सा है।
कोरोना के बाद अरब व्यंजनों का विस्फोट
इस रिपोर्ट में लिखा गया है कि वर्ष 2020 में जब कोरोना की महामारी फैली थी और लोग घरों में ही रहे तो मलयाली लोगों ने गल्फ के स्वादों को घर पर पकाना आरंभ कर दिया। इसमें लिखा है कि इस दौरान लगभग 25000 अरबी फूड रेस्टोरेंट खुले, और यह ऐसा कदम था, जिसने मंडी नामक व्यंजन के लिए केरल में जुनून सा पैदा कर दिया।
स्थानीय स्वाद की जगह अरबी व्यंजनों का बढ़ना
यह देखना बहुत हैरान करता है कि स्थानीय व्यंजनों के स्थान पर केरल में अरबी व्यंजनों के रेस्टोरेंट खुल ही नहीं रहे हैं, बल्कि लोगों के बीच उनकी दीवानगी भी बढ़ रही है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या स्थानीय या भारतीय व्यंजनों को जानबूझकर प्रोत्साहित नहीं किया जा रहा है? या फिर यह केरल की परंपरागत स्वाद की पहचान को मिटाने का ही एक नया कदम है?











