वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने पर सोमवार (8 दिसंबर) को लोकसभा में एक विस्तृत चर्चा हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वंदे मातरम् को नए भारत की ऊर्जा, एकता और संकल्प का आधार बताया। वहीं चर्चा के दौरान केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भारत के राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को देश की आत्मा का गीत कहा। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् भारत की आत्मा, उसकी आध्यात्मिक आस्था है। यह आध्यात्मिक आस्था धर्म या मजहब से जुड़ी नहीं है बल्कि राष्ट्र भक्ति से जुड़ी है और समावेशी है। इसे राजनीतिक या साम्प्रदायिक रंग तो कुछ कट्टरपंथियों ने दिया है। उन्होंने इसके गाने पर आपत्ति जताई। इन आपत्तियों के पीछे अंग्रेजी हुकूमत की ‘बांटों और राज करो’ की नीति थी। इसे दुर्भाग्य से उस समय की कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति का भी समर्थन मिला। आज हमें इस गलती को पूरी तरह से सुधारना है और मां भारती से जुड़े हर प्रतीक के प्रति जो राजनीतिक पूर्वाग्रह हैं, उनसे देश और समाज को मुक्ति दिलानी है।
जिन्ना के चश्मे से देखने वालों ने वंदे मातरम् के पदों को भूलाया
राजनाथ सिंह ने वंदे मातरम् के पदों को भूलाने की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि वो लोग वंदे मातरम् को जिन्ना के चश्मे से देख रहे थे। वंदे मातरम् की भूला दी गई वो पंक्तियां भारत की आत्मा की पंक्ति है। यह पंक्ति यह बताता है कि हमारे भारत का आध्यात्म तोड़ने का नहीं, जोड़ने का काम करता है।
वंदे मातरम् हमारा गौरव, एकता का प्रतीक है
राजनाथ सिंह ने वंदे मातरम् को भारतीयता और राष्ट्रीयता का सबसे सशक्त हस्ताक्षर बताया। उन्होंने लोकसभा में कहा कि वंदे मातरम् हमारे गौरवशाली अतीत का स्मरण है, हमारे स्वर्णिम भविष्य का आह्वान है। यह मातृभक्ति का अनुपम भाव है, संस्कृति का शाश्वत प्रकाश है, सभ्यता का गौरव है, धर्म की रक्षा का संदेश है, कर्म की प्रेरणा है, शक्ति का आह्नान है, विजय का विश्वास है, अमरत्व का स्वर है और आस्था का आधार है। वंदे मातरम् हर उस सैनिक को हौसला देता है, जो आज भी अपनी मातृभूमि के लिए हर दुश्मन का सामना कर रहा है। वंदे मातरम् हमारी एकता का प्रतीक है, स्वाधीनता का संकल्प है, वीरता का जयघोष है, त्याग का महामंत्र है, बलिदान का अमर गान है। वंदे मातरम् स्वतंत्रता संग्राम के उन अज्ञात और अवर्णित सैनिकों की याद है, जिन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। यह उस पीड़ा को भावपूर्ण श्रद्धांजलि है जो असंख्य लोगों ने आजादी प्राप्त करने के लिए सही। वंदे मातरम् हमारा गौरव है। हमारी पहचान है और हमारे स्वाभिमान की सबसे ऊंची पुकार है।
वंदे मातरम् न गाने के लिए फतवे जारी किए गए
उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् के माध्यम से बंकिम चंद्र चटर्जी ने उत्तिष्ठत जाग्रत (जागो, उठो और ज्ञान प्राप्त करो) का संदेश दिया है। यानी जब भारत का हर नागरिक वंदे मातरम् कहेगा, तब ही भारत सशक्त बनेगा। वंदे मातरम् ही विकसित भारत का मार्ग प्रशस्त करेगा। हमारे आत्मबल को बढ़ाएगा। राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देगा। आज हम आजाद हैं, हम दुनिया की एक बड़ी ताकत हैं और विकसित राष्ट्र बनने की राह पर हैं। मैं आज सदन को बताना चाहता हूं, 150 वर्ष पूर्व लिखे वंदे मातरम् गीत में, वर्तमान के भारत के उदय का मार्ग भी देखा जा सकता है। वंदे मातरम् के साथ बांग्ला भाषा के साथ भी अन्याय हुआ है। बंगाल और बांग्ला भाषा की शान बंकिम् चंद्र चटर्जी के साथ हुए अन्याय को हमारी सरकार ने बांग्ला भाषा को Classical Language का दर्जा देकर, सही करने का प्रयास किया है। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि जिस गीत के बारे में गांधी जी ने कहा था कि जब तक यह देश रहेगा, वंदे मातरम् रहेगा, उस गीत को गाने का हक मांगने के लिए अदालतों के दरवाजे खटखटाने पड़े। और तो और कई बार उसे न गाने के लिए फतवे भी जारी किए गए। वे यह भी मानते थे कि राष्ट्रीय गान का असली महत्व विदेशों में ज्यादा है, अपने देश में कम।
नेहरू ने वंदे मातरम् के खिलाफ तरह-तरह के तर्क दिए
देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लेकर केंद्रीय मंत्री ने कहा कि नेहरू ने वंदे मातरम् के खिलाफ तरह-तरह के तर्क दिए। उनके अनुसार वंदे मातरम् Orchestra पर आसानी से नहीं बजाया जा सकता था। नेताजी जब कांग्रेस से निकले और आजाद हिन्द फौज की स्थापना की, तो फौज के संचालन गीतों में वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का स्थान दिया था। इतना जन समर्थन होने के बाद भी तथाकथित Religious Sentiments Hurt होने के नाम पर, वंदे मातरम् का विरोध किया गया। कुछ लोगों द्वारा तरह-तरह के षड्यन्त्र करके, उस गीत को दोयम स्थान पर लाकर खड़ा कर दिया गया।
कांग्रेस गुलामी की मानसिकता छोड़ वंदे मातरम् को स्वीकार करे
राजनाथ सिंह ने कांग्रेस को लेकर कहा, “सन 1885 से लेकर 1905 तक कांग्रेस का न अपना कोई राष्ट्रीय गीत था, न कोई अपना झंडा। लेकिन अब समय आ गया है, कि कांग्रेस गुलामी की मानसिकता को छोड़े और वंदे मातरम् को उसके पूर्ण स्वरूप में स्वीकार करे। हो सकता है, देश के लोग आपको अभी भी माफ कर दें।” रक्षा मंत्री ने मौलाना अबुल कलाम आजाद को आजादी की लड़ाई के बड़े नेताओं में से एक बताते हुए कहा कि उन्होंने भी वंदे मातरम् की संकीर्ण और सांप्रदायिक व्याख्या को सिरे से नकार दिया था। उन्होंने वंदे मातरम् गीत को बहुत गहराई से देखा। उन्होंने, इसमें इस्लामी सिद्धांतों और वेदांत दर्शन का सुंदर मेल पाया। वेदांत कहता है- सच्चाई के बहुत सारे रूप हो सकते हैं। एक ही सत्य को अलग-अलग लोग, अलग-अलग तरीके से देखते और पूजते हैं। डॉ राजेंद्र प्रसाद जी ने भी कहा था- जहां तक वंदे मातरम् की बात है, यह मूर्ति पूजा को बढ़ावा नहीं देता। मां दुर्गा का मतलब कोई मूर्ति नहीं था, बल्कि यह उस देश का दूसरा नाम है, जो हम सबको प्यारा है। महात्मा गांधी ने कहा था- वंदे मातरम् मेरे मन में गहराई तक बैठ गया है। इसका गायन जब मैंने पहली बार सुना तो मैं रोमांचित हो गया। इस पर मैं मोहित हो गया। उसमें मुझे केवल राष्ट्रीय भावना ही दिखाई दी। मुझे ऐसा कतई नहीं लगा कि यह गीत एक हिन्दू गीत है। उन्होंने यह भी कहा था, कि वंदे मातरम् में कोई द्वेष भावना नहीं है, कोई दोष नहीं है। हम अपनी मां में जो सद्गुण देखते हैं, उन सारे गुणों को कवि ने भारत माता में देखा है।
कांग्रेस ने वंदे मातरम् के साथ संविधान को भी खंडित किया
राजनाथ सिंह ने लोकसभा में देश की सबसे पुरानी पार्टी को लेकर को आगे कहा कि वंदे मातरम् के साथ कांग्रेस ने संविधान को भी खंडित करने का कार्य किया है। वर्ष 1951 में पहला संविधान संशोधन करके मूल संविधान के चरित्र को ही बदल दिया गया। यह इतना बड़ा परिवर्तन था कि कानून के जानकारों ने इस संशोधन को ‘The Second Constitution’ की संज्ञा दी थी। आजादी के बाद कांग्रेस ने भारत की सभ्यता, संस्कृति और यहां तक कि भारत के संविधान को भी हमेशा अपने संकीर्ण हितों की बलि चढ़ाया। तुष्टिकरण की राजनीति, कांग्रेस के लिए हमेशा संविधान, भारत की संस्कृति, सभ्यता, संप्रभुता और मानवता के ऊपर रही है। हम लोग तब भी वंदे मातरम् के साथ हुए अन्याय के विरोध में खड़े थे और आज भी हम वंदे मातरम् के सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं होने देंगे।
वंदे मातरम् में मूर्ति-पूजा की कोई बात नहीं
उन्होंने चर्चा के दौरान कहा कि बंकिमचंद्र चटर्जी के लेखन यह भी स्पष्ट होता है कि उनका मानना था, कि भारतीय संस्कृति में भगवान की प्रतिमा भावगम्य है। एक सेतु है। एक माध्यम है, सत्य को जानने का। माध्यम है, ईश्वर के स्वरूप को समझने का। इसलिए वंदे मातरम् की मां भारती, कोई मूर्तिमान देवी नहीं हैं। बल्कि वह एक प्रतीक हैं, उस भावना की, जिसके लिए हर भारतीय के हृदय में प्रेम हैं जो लोग वंदे मातरम् का विरोध इस आधार पर करते हैं, कि यह मूर्ति-पूजा को बढ़ावा देता है, वे बंकिमचंद्र चटर्जी के विचारों की रत्ती भर भी समझ नहीं रखते हैं। वंदे मातरम् में मूर्ति-पूजा की कोई बात नहीं है। बंकिम चंद्र चटर्जी, स्वयं मूर्ति पूजा के समर्थक नहीं थे। यह बात उनके द्वारा सन् 1874 में लिखे गए एक लेख से बिल्कुल साफ होती है। सच यह है कि वंदे मातरम् ने भारत के सभी लोगों के दिलों को स्पंदित किया है। चाहे वो हिंदू हो, या मुस्लिम हो। बंगाली और संस्कृत में लिखा गया यह गीत, तमिल, मराठी, कन्नड़, गुजराती, हिंदी, तेलुगु, मलयालम और भारत की हर भाषा बोलने वालों के दिलों में घर कर गया। यह गीत अनेकता में एकता का सबसे बड़ा उदाहरण है और इसी वजह से, इसने उन लोगों को विचलित किया, जो ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के विचार से डरते थे। कुछ लोगों ने इस गीत का मतलब गलत निकाला और समझा। अब इस समझ को बदलना होगा। सही समझ पैदा करनी होगी। वंदे मातरम् का सही अर्थ समझाना होगा। सच्चाई यह है कि भारतीय मुस्लिमों ने बंकिम चंद्र चटर्जी के भाव को, कांग्रेस के कुछ नेताओं या मुस्लिम लीग के नेताओं से, कहीं अधिक गहराई से और सही अर्थ में समझा था।
बंगाल में सबसे बड़े सामाजिक सुधारों, सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नींव रखी गई
रक्षा मंत्री ने बंगाल की संस्कृति का जिक्र करते हुए कहा कि बंगाल वह भूमि रही है, जहां भारत के सबसे बड़े सामाजिक सुधारों और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नींव रखी गई। जहां सती प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई गई। विधवा पुनर्विवाह को बढ़ावा दिया गया। बाल विवाह की कुरीति के खिलाफ आवाज उठाई गई। बंकिम चंद्र चटर्जी ने कहा था कि बंगाल, हिन्दू और मुसलमान दोनों का है। बंगाल की भलाई के लिए यह जरूरी है, कि हिंदुओं और मुसलमानों में एकता हो। जिस व्यक्ति के ऐसे विचार हों, क्या वे कोई सांप्रदायिक गीत लिख सकते थे। बंगाल वह पवित्र भूमि है, जहां चैतन्य महाप्रभु, स्वामी प्रणवानंद, संत रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद जैसे संतों ने जन्म लिया। उनकी उपस्थिति ने बंगाल को अध्यात्म, संस्कृति और हमारी सभ्यतागत चेतना का एक उज्ज्वल केंद्र बना दिया।
वंदे मातरम्,आनंदमठ कभी भी इस्लाम विरोधी नहीं रहे
राजनाथ सिंह ने आनंदमठ के प्रसंगों को रेखांकित करते हुए कहा कि वंदे मातरम् और आनंदमठ कभी भी इस्लाम विरोधी नहीं रहे। उस समय बंगाल भयंकर अकाल का सामना कर रहा था। लोग भुखमरी के कगार पर थे। अंग्रेजों के दबाव में बंगाल का नवाब, लोगों से भारी लगान वसूल रहा था। आनंदमठ इस अन्याय के खिलाफ लिखा गया था। इस बात से यह साफ हो जाता है, कि वंदे मातरम् और आनंदमठ कभी भी इस्लाम-विरोधी नहीं थे। यह तो उस दौर के बंगाल के नवाब और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के गठजोड़ के खिलाफ आम जनता की पुकार थी। शुरू में वंदे मातरम की रचना स्वतंत्र रूप से की गई थी और बाद में इसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने आनंदमठ उपन्यास में शामिल किया। कुछ लोगों को आनंदमठ भी सांप्रदायिक लगा। इस कारण वंदे मातरम् को भी निशाना बनाया गया।
पहले की सरकारें नक्सलवाद का समाधान नहीं ढूंढ पाईं
उन्होंने चर्चा के दौरान कहा कि पहले की सरकारें नक्सलवाद या वामपंथी उग्रवाद की समस्या का समाधान नहीं ढूंढ पाईं। इस समस्या का समाधान अगर किसी ने ढूंढा, तो वह हैं, हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। उनके नेतृत्व में वामपंथी उग्रवाद आज पूर्णतः समाप्ति की ओर है। भारतीय संस्कृति के प्रति, उनकी इस पैथोलॉजिकल नफरत के कारण ही वंदे मातरम् भी इसका शिकार बन गया। आजादी के आंदोलन के दौरान ही, कांग्रेस के कुछ लोगों की अपने आप को ‘सेक्युलर’ दिखाने की बेचैनी इतनी बढ़ चुकी थी कि भारतीय संस्कृति, भारतीय परंपरा और हमारी महान सभ्यता से जुड़ी कोई भी बात उन्हें कम्युनल दिखाई देती थी। जहां एक ओर कांग्रेस ने तुष्टीकरण की राजनीति की है, वहीं हमने ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ की भावना से कार्य किया है। वंदे मातरम् के दो पद तो सभी ने सुने हैं, लेकिन बाकी के बारे में लोगों को ज्यादा नहीं पता है। मूल संस्करण में से अधिकांश अंशों को भुला दिया गया है। उन पदों में भारत की विशेषताओं को दर्शाया गया है। अब उन पदों के महत्व और अर्थ को पूरी तरह समझने का समय आ गया है।
वोट बैंक की राजनीति के लिए राम मंदिर का भी निरंतर विरोध किया गया
राम मंदिर का उदाहरण देते हुए रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि राम मंदिर निर्माण की मांग करोड़ों भारतीयों की आस्था की प्रतीक थी। लेकिन कुछ दलों ने केवल वोट बैंक की राजनीति के कारण इसका निरंतर विरोध किया। सदियों के संघर्ष, एक लंबी न्यायिक लड़ाई और माननीय सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय के बाद कहीं जाकर, भगवान राम के मंदिर का निर्माण हुआ। यह केवल एक मंदिर का निर्माण नहीं, बल्कि यह भारतीय सभ्यता के आत्मगौरव की पुनर्स्थापना भी थी।

















