'बाबर वाली सोच' पर बाबा साहेब आम्बेडकर ने क्या कहा? क्या सच हो रही बात?
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‘बाबर वाली सोच’ पर बाबा साहेब आम्बेडकर ने क्या कहा? क्या सच हो रही बात?

बाबरी मस्जिद के लिए छह दिसंबर का दिन इसलिए चुना गया, क्योंकि इसी दिन बाबरी ढांचा गिराया गया था।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Dec 6, 2025, 06:24 pm IST
in भारत
बाबा साहेब आम्बेडकर

बाबा साहेब आम्बेडकर

बंगाल के मुर्शिदाबाद में बाबर के नाम से मस्जिद की नींव हुमायूं कबीर ने रख दी है। नारा ए तकबीर भी लगा। भारत में मस्जिद बनाने की स्वतंत्रता है, लेकिन बाबर की सोच किस हद तक हावी हो रही है, यह भी दिख रहा है। छह दिसंबर का दिन इसलिए चुना गया, क्योंकि इसी दिन बाबरी ढांचा गिराया गया था। इस्लामिक आक्रांता ने हिंदू समाज को जो घाव दिए थे, उसके अधूरे प्रतीक को 6 दिसंबर को ढहाया गया था।

बाबर और बाबरी मस्जिद के नाम पर मुस्लिमों को गुमराह करने का राजनीतिक खेल फिर शुरू हो गया है। मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की आशंका के चलते ममता बनर्जी की टीएमसी ने कहा कि उसने हुमायूं कबीर को मजहबी आधार पर नहीं, बल्कि ज्यादा बयानबाजी के आधार पर पार्टी से निलंबित किया है, लेकिन हुमायूं ने अपने बयानों से यह बता दिया है कि वह टीएमसी में नहीं रहेंगे और अपनी पार्टी की घोषणा कर सकते हैं।

भारत में सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं। धर्म या मजहब के आधार पर कोई भेद नहीं है। देश संविधान और कानून के हिसाब से चलता है। यहां तक कि भगवान राम को भी अपनी जन्मभूमि वापस पाने के लिए कोर्ट का सहारा लेना पड़ा। लेकिन, यह सर तन से जुदा करने वाली और बाबर वाली सोच खतरनाक है। बाबा साहेब आम्बेडकर ने इस्लाम को लेकर क्या कहा, आइये जानते हैं-

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में मुस्लिम आक्रांता हिंदुओं के खिलाफ घृणा का राग गाते हुए आए थे। उन्होंने न केवल घृणा ही फैलाई बल्कि वापस जाते हुए हिंदू मंदिर भी जलाए। उनकी नजर में यह एक नेक काम था और उनके लिए तो इसका परिणाम भी नकारात्मक नहीं था। उन्होंने एक सकारात्मक कार्य किया जिसे उन्होंने इस्लाम के बीज बोने का नाम दिया। इस पौधे का विकास बखूबी हुआ, यह केवल रोपा गया पौधा नहीं था बल्कि यह एक बड़ा ओक का पेड़ बन गया।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, राइटिंग्स एंड स्पीचेज, वॉल्यूम 8, पृष्ठ 64-65

 

इस्लाम: लोकतंत्र विरोधी

मुस्लिम राजनीति कितनी विकृत है यह भारतीय राज्यों में हुए कुल राजनीतिक सुधारों और मुस्लिम नेताओं के तौर तरीकों से ही देखा जा सकता है। मुसलमानों की महत्वपूर्ण चिंता लोकतंत्र नहीं है। महत्वपूर्ण चिंता यह है कि बहुमत शासन वाला लोकतंत्र हिंदुओं के खिलाफ मुसलमानों के संघर्ष को किस प्रकार प्रभावित करता है ? क्या यह उनको शक्तिशाली बनाएगा या कमजोर? यदि लोकतंत्र उन्हें कमजोर करेगा तो उनके पास लोकतंत्र नहीं रहेगा। मुस्लिम राज्य सड़ी गली व्यवस्था ज्यादा पसंद करेंगे।

बनिस्पत एक अच्छे तंत्र की क्योंकि वे भी हिंदुओं के मुद्दों में ही ज्यादा रुचि रखते हैं। मुस्लिम समुदाय में जो राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता आई है उसका एक और एकमात्र कारण है मुसलमान सोचते हैं कि हिंदुओं और मुसलमानों को एक समान संघर्ष करना चाहिए। हिंदू मुसलमानों के ऊपर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहते हैं और मुसलमान फिर से राज करने वाले समुदाय की अपनी ऐतिहासिक स्थिति को देखना चाहते हैं। तब इस संघर्ष में मजबूत ही जीतेगा, और अपनी शक्ति बढाएगा। वे ऐसी किसी भी चीज के बारे में नहीं सोचेंगे जो उनकी पद प्रतिष्ठा में कोई कमी लाने वाला हो।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, राइटिंग्स एंड स्पीचेज, वॉल्यूम 8, पृष्ठ 59-60

पुराने ढर्रे पर चले तो भारतीय राष्ट्रवाद के लिए संभावित खतरा

डॉ अंबेडकर ने यह सन्दर्भ भी दिया है कि यदि एकीकृत भारत में मुसलमान पुराने ढर्रे पर ही चलते रहे, तो यह भारतीय राष्ट्रवाद के लिए बड़ा संभावित खतरा बन जाएगा। इस्लाम एक क्लोज कॉर्पोरेशन है और इसकी विशेषता ही यह है कि मुस्लिम और गैर मुस्लिम के बीच वास्तविक भेद करता है।

मुसलमानों में एक और उन्माद का दुर्गुण है जो जिहाद के नाम से प्रचलित है। एक मुसलमान शासक के लिए जरूरी है कि जब तक पूरी दुनिया में इस्लाम की सत्ता न फैल जाए तब तक चैन से न बैठे। इस तरह पूरी दुनिया दो हिस्सों में बंटी है दर- उल-इस्लाम (इस्लाम के अधीन) और दर-उल-हर्ब (युद्ध के मुहाने पर)। चाहे तो सारे देश एक श्रेणी के अधीन आयें अथवा अन्य श्रेणी में। तकनीकी तौर पर यह मुस्लिम शासकों का कर्तव्य है कि कौन ऐसा करने में सक्षम है। जो दर-उल- हर्ब को दर उल इस्लाम में परिवर्तित कर दे।

इस्लाम में महिलाएँ

तलाक के मामले में पतियों को जो मनमानी करने की छूट दी गई है, वह उस सुरक्षा के मायने को ध्वस्त कर देती है जो एक महिला के लिए पूर्ण स्वतंत्र और खुशहाल जीवन की बुनियादी जरूरत है। जीवन के लिए ऐसी असुरक्षा जिसे कई बार मुस्लिम महिलाएं बयां कर चुकी हैं। पतियों को जिस प्रकार की मनमानी का अधिकार मुस्लिम कानून देते हैं, वह अव्याहरिक और अमानवीय ही कहा जाएगा​।

लेकिन यह भी भुला दिया जाता है कि चार वैध पत्नियों के अतिरिक्त मुस्लिम कानून किसी मुसलमान को उसकी महिला गुलाम के साथ रहने की भी अनुमति देता है। महिला गुलाम की संख्या के विषय में कुछ नहीं कहा गया है। वे उनको बांट दी जाती हैं बिना किसी रोक के, और विवाह करने के आश्वासन के भी। सबसे बड़ी और कई बीमारियों की जड़ बहुविवाह और बिना ब्याह साथ रहने की बुराई पर एक भी शब्द व्यक्त नहीं किया गया है, जो कि मुस्लिम महिला के कष्ट का सबसे बड़ा कारण है। यह भी सच है कि क्योंकि बहुविवाह और बिन ब्याह साथ रहने का प्रचलन है जिस कारण इसे मुसलमानों ने आम व्यवहार में चलाया। महिलाओं के लिए यह किसी नर्क से कम नहीं था और पुरुषों ने इसे अपना विशेष अधिकार मानते हुए अपनी पत्नियों को गाली गलौज करने, प्रताड़ित और दुखी करने का बहाना पा लिया।​ (-पाकिस्तान और पार्टीशन ऑफ़ इण्डिया, पृष्ठ 217)

गुलामी के इस मामले में कुरान मानवता की दुश्मन है और हमेशा की तरह महिलाएं इसकी सबसे बड़ी भुक्तभोगी हैं। महिलाओं से ऐसी अपेक्षा नहीं की जाती कि वे अपने कमरों से बाहर आँगन या बगीचे में घूमने जाएं। उनके कमरे घर के पिछवाड़े की तरफ रखे जाते हैं। उन सभी को चाहे वो जवान हों या वृद्धा एक ही कमरे में ठूंस दिया जाता है। उनकी उपस्थिति में पुरुष नौकर से भी काम नहीं लिया जाता।

एक महिला को केवल अपने बेटे, भाई, पिता चाचा और पति अथवा अन्य नजदीकी रिश्तेदार जिस पर भरोसा किया जा सके, को ही देखने का अधिकार है। वह प्रार्थना के लिए मस्जिद में भी नहीं जा सकती और यदि उसे जाना भी पड़े तो बुर्का पहनकर जाना पड़ेगा।

(पाकिस्तान और पार्टीशन ऑफ़ इण्डिया, पृष्ठ 217)

 

Topics: ममता बनर्जी बाबरीहुमायूं कबीर मस्जिदइस्लाम और आंबेडकर के विचारइस्लाम और बाबा साहेब आम्बेडकरबाबर की सोचमुर्शिदाबादमुस्लिम आक्रांताबाबरी मस्जिद बंगालबाबरी मस्जिद हुमायूं कबीर
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