गत 1 दिसंबर को कोथरूड, पुणे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में कृतज्ञता समारोह आयोजित हुआ। इस अवसर पर कांची कामकोटि पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य विजयेंद्र सरस्वती जी ने अपने आशीर्वचन में कहा कि सनातन सभ्यता विश्व की भलाई के लिए मानवता का मार्गदर्शन करती है।
यही सभ्यता है जो सबको स्वीकार करती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने कहा कि विश्व कल्याण की पताका फहराते हुए श्रीराम मंदिर बन गया है। अब पहले से भी अधिक भव्य, शक्तिशाली और सुंदर राष्ट्र मंदिर का निर्माण करना है। उन्होंने कहा कि संघ पूरे समाज को संगठित करना चाहता है, क्योंकि समाज संगठित होगा, तभी राष्ट्र वैभव-संपन्न, बल-संपन्न होगा और तभी विश्व में सुख व शांति होगी।
हम यह नहीं मानते कि संघ ही देश का भला करेगा, बल्कि देश तभी खड़ा होगा, जब समाज खड़ा होगा। उन्होंने कहा कि कठिन समय में समाज ने संघ का साथ दिया, इसी कारण संघ बड़ा हुआ। उन्होंने कहा कि स्वयंसेवकों ने अपने प्राण देकर संघ को सींचा है। अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में अपना पूरा जीवन अर्पित कर संघ का वटवृक्ष खड़ा करने वाले डॉ. हेडगेवार, राष्ट्र के लिए अपना जीवन न्योछावर करने वाले प्रचारक, ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में जान जोखिम में डालकर काम करने वाले गृहस्थी कार्यकर्ता और स्वयंसेवकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए।
‘आदित्य प्रतिष्ठान’ के अध्यक्ष शंकर अभ्यंकर ने कहा कि आक्रमणों के कारण विश्व की कई सभ्यताएं नष्ट हो गईं, लेकिन पूरे विश्व को एक परिवार मानने वाली भारत की सनातन सभ्यता आज भी जीवंत है। कार्यक्रम में महाविष्णु मंदिर की आधारशिला रखी गई। ‘भारतीय उपासना’ नामक कोष के तीसरे संस्करण का विमोचन और जितेंद्र अभ्यंकर कृत ‘पंढरिश’ नामक ऑडियो का विमोचन हुआ।













