देहरादून हरिपुर कालसी जनजातीय क्षेत्र में कश्मीर के मुस्लिम के जमीन की खरीदने पर उठे सवाल, CM ने दिए जांच के आदेश
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देहरादून हरिपुर कालसी जनजातीय क्षेत्र में कश्मीर के मुस्लिम के जमीन की खरीदने पर उठे सवाल, CM ने दिए जांच के आदेश

उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर के हरिपुर कालसी इलाके में एक कश्मीरी मुस्लिम द्वारा दस बीघा जमीन खरीदने का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है।

Written byउत्तराखंड ब्यूरोउत्तराखंड ब्यूरो — edited by Mahak Singh
Dec 4, 2025, 10:17 am IST
inउत्तराखंड
प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

उत्तराखंड के जनजाति क्षेत्र जौनसार बावर के हरिपुर कालसी क्षेत्र में कश्मीरी मुस्लिम द्वारा दस बीघा भूमि खरीदने का मामला एक बार फिर से सुर्खियों में है। सामाजिक संगठनों द्वारा फर्जी दस्तावेजों के जरिए भूमि की खरीद फरोख्त किए जाने के विषय को एक बार फिर से उठाया है।

पीओके का वीडियो वायरल, देहरादून में पैतृक जमीन का दावा

मामले की जानकारी मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा नोटिस किए जाने के बाद डीएम देहरादून को जांच किए जाने के निर्देश दिए गए है।जानकारी के मुताबिक एक वीडियो सोशल मीडिया में जारी हुआ है दावा किया गया है कि ये वीडियो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से जारी हुआ है जिसमें वहां के लोगों द्वारा देहरादून जिले के हरिपुर कालसी क्षेत्र में उनकी पैतृक संपत्ति होने की बात कही गई है। ये जमीन खरीदने का मामला गुलाम हैदर से जुड़ा बताया जा रहा है जोकि जम्मू कश्मीर में पुलिस का अधिकारी रहा और आतंकियों को मदद पहुंचाने के आरोप में कई सालों तक निलंबित भी रहा।

जनजातीय क्षेत्र में बाहरी व्यक्ति की जमीन खरीद पर सवाल

गुलाम हैदर ने जनजातीय क्षेत्र में दस बीघा भूमि कैसे खरीद ली? जबकि यहां बाहर का व्यक्ति भूमि खरीद नहीं सकता। इस मामले में कालसी प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठने लाजमी है। बताया जाता है गुलाम हैदर ने यहां रहने वाले रिश्तेदारों के जरिए परिवार रजिस्टर में नाम दर्ज करवा कर निवास संबंधी दस्तावेज बनवा लिए और फिर यहां भूमि खरीद ली। जनजातीय क्षेत्र में बाहरी व्यक्ति यदि भूमि खरीदता है तो उसे एसडीएम या डीएम की अनुमति लेनी पड़ती है । ऐसे में आखिर किसने इस बारे में अनुमति दी? ये भी सवाल पूछा जा रहा है। इस बारे में स्थानीय युवक संजय खान ने भी कई शिकायती पत्र प्रशासन को लिखे थे और उच्च न्यायालय नैनीताल में भी याचिका दायर की हुई है।

बड़ा सवाल ये भी है जिस गुलाम हैदर ने सालों साल कश्मीर घाटी में नौकरी की वो उत्तराखंड में दस बीघा जमीन आखिर क्यों खरीद रहा है? सूत्र बताते है कि कश्मीर में भी गुलाम हैदर की संपति पहले से है। जानकारी के मुताबिक ये मामला जिला अधिकारी की अदालत में भी चला और तात्कालीन डीएम सोनिका ने इस प्रकरण को सुनने के बाद 24.07.2024 को उक्त भूमि को सरकार में निहित करने के आदेश भी जारी किए हुए है।बावजूद इसके उक्त भूमि का विवाद बरकार है।

डीएम को दिए जांच के निर्देश

बरहाल ये मामला सुर्खियों में आने के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने डीएम सविन बंसल को जांच करने के निर्देश दिए है।

पछुवा दून में डेमोग्राफी चेंज के प्रकरण

जिले के पश्चिम छोर यानि पछुवा देहरादून में सहारनपुर, पौंटा साहिब से लगी राज्य की सीमा में जनसंख्या असंतुलन की समस्या तेजी से राजनीतिक सामाजिक समीकरण बदल रही है। सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे कर बसे यूपी से आए मुस्लिम परिवारों के बीच रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुस्लिम भी यहां अवैध कब्जे कर रहे है। ग्राम पंचायतों की जमीनों का यहां सौदा हो चुका है ये सौदा और कोई नही मुस्लिम ग्राम प्रधान, जिला पंचायत सदस्य ही कर रहे है। वोट बैंक की राजनीति ने यहां देवभूमि की संस्कृति को ही नष्ट करना शुरू कर दिया है, बड़ी बड़ी मस्जिद मदरसे यहां गैर कानूनी रूप से खड़े हो गए है जोकि देहरादून प्रशासन के लिए अब सिर दर्द बनते जा रहे है।

पछुवा देहरादून में अवैध बसावट पर सवाल, वोट बैंक और औद्योगिक रोजगार नीति पर उठे आरोप

पछुवा देहरादून में आखिर किसने और क्यों इन मुस्लिमो को अवैध रूप से बसने दिया? इसके पीछे वोट बैंक की राजनीति सबसे बड़ा कारण बताई जाती है, राज्य बनने के तुरंत बाद यहां नारायण दत्त तिवारी की सरकार आई और पछुवा देहरादून में सेलाकुई को सिडकुल यानी औद्योगिक क्षेत्र होने का दर्जा मिला, कांग्रेस की सरकार ने यहां सत्तर फीसदी रोजगार स्थानीय लोगो को दिए जाने का जीओ जारी किए सोच कर कि पहाड़ के युवाओं को रोजगार मिलेगा लेकिन यहां उद्योगो ने कॉन्ट्रैक्ट लेबर लगाई और यहां यूपी के मुस्लिम ठेकेदारों ने अपने यहां की लेबर लाकर उनके फर्जी प्रमाण पत्र बनवा कर उन्हे स्थानीय बेरोजगार दिखाकर नौकरियां दिलवा दी।

अतिक्रमण मुद्दे पर राजनीतिक संरक्षण के आरोप

इसी तरह नदियों के खनन में लगे मजदूरों के लिए खेल खेला गया। इनके पीछे स्थानीय विधायको, ब्लाक प्रमुख, ग्राम प्रधानों के द्वारा संरक्षण दिए जाने का खेल शुरू हुआ,बीजेपी की सरकार यहां थी नही लिहाजा कांग्रेस के जन प्रतिनिधियों को ये फायदा दिखा कि यहां अवैध रूप से काबिज होने वाले मुस्लिम ,कांग्रेस को ही वोट देंगे बीजेपी से उनकी हमेशा दूरी ही रहती है। यही वजह है कि कांग्रेस आज भी इन्हे संरक्षण देती है। पिछले दिनों उत्तराखंड जलविद्युत निगम की जमीन पर अवैध रूप से बसे लोगो को हटाने के लिए जब धामी सरकार का बुल्डोजर चलने वाला था तब भी कांग्रेस के नेताओ ने ही इसका विरोध किया,खास बात ये कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करवाने वाले बीजेपी के नेताओ के यहां भी अपना वजूद बनाए हुए है और उन्हे वोटो का प्रलोभन देकर अपने आप पर उनकी राजनीतिक छत्र छाया रखते रहे है।

जानकारी के मुताबिक पछुवा दून के गांव शंकरपुर,रामपुर बड़ा,शिव नगर,लक्ष्मी पुर, जो कभी हिंदू नाम से इसलिए जाने जाते थे कि ये हिंदू बाहुल्य थे आज ये ग्राम मुस्लिम बाहुल्य हो गए है। नदी श्रेणी की वन भूमि हो या फिर ग्राम सभाओं की जमीनों पर अवैध कब्जे कर मुस्लिम आबादी ने डेरा डाला हुआ है इन गांवों की झोपड़ पट्टी अब पक्के मकान का रूप लेने लगी है, मुस्लिम ही ग्राम प्रधान है और वे बाहरी लोगो को यहां बसाने के लिए सरकारी जमीनों के सौदे कर रहे है। ऐसे कई भू माफिया क्षेत्र में सक्रिय है जिन्होंने विनोवा भावे ट्रस्ट की गोदान भूमि को भी बेचना शुरू कर दिया है। सहसपुर,इस्लाम नगर, खुशहालपुर, मेहुवाला, शीशम बाड़ा, सिंघनी वाला, आमवाला चौकी,धौलासू, चाहन चक, शेरपुर समावला, जमनपुर, अकबरपुर, कुन्जा ग्रांड आदि ग्राम सभाएं ऐसी है जहां मुस्लिम जनसंख्या पिछले कुछ सालो में नब्बे प्रतिशत हो चुकी है।

ऐसी भी जानकारी में आया है कि यहां बनने वाले ग्राम प्रधान भी फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर राजनीति कर रहे है। सहसपुर के ग्राम प्रधान अनीस के हाई स्कूल के प्रमाण पत्र की जांच हुई है जोकि कथित रूप से फर्जी पाया गया है और ये जांच अभी फाइलों में दबी पड़ी है।

पछुवा देहरादून में बिना सरकार की अनुमति के दर्जनों मस्जिदों का निर्माण वो भी सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे करके कर दिया गया। एक जानकारी के मुताबिक इस क्षेत्र में सौ से ज्यादा मस्जिदे करीब चालीस मजारे यहां अवैध रूप से बन गई, जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश ये कहते है कि बिना डीएम की अनुमति के कोई भी नया धार्मिक स्थल नही बन सकता फिर भी यहां धडल्ले से मस्जिदों मदरसों के निर्माण कार्य चल रहे है। हैरानी की बात ये भी है कि सड़क किनारे पीडब्ल्यूडी की जमीन पर भी मजारे मस्जिदें बन गई है।जिसे कभी भी जिला प्रशासन ने रोकने की जहमत तक नही उठाई है। बरहाल पछुवा देहरादून की जनसंख्या जो कभी हिंदू बाहुल्य थी अब मुस्लिम बाहुल्य हो चुकी है,ये जनसंख्या असंतुलन की बड़ी समस्या देवभूमि उत्तराखंड के प्रवेश द्वार पर मुंह उठाए खड़ी है। जो राज्य की धामी सरकार को चुनौती भी दे रही है।

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