आत्मनिर्भर भारत की समुद्री मुहर: आईएनएस माहे और तारागिरी
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आत्मनिर्भर भारत की समुद्री मुहर: आईएनएस माहे और तारागिरी

नवंबर 2025 में मात्र 4 दिनों के अंतर पर भारतीय नौसेना को मिले स्वदेशी INS Mahe (माहे-क्लास ASW कॉर्वेट) और INS Taragiri (प्रोजेक्ट-17A स्टील्थ फ्रिगेट)। पढ़ें कैसे ये दोनों पोत हिंद महासागर में भारत की सामरिक बादशाहत को नई ऊँचाई दे रहे हैं।

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल — edited by कुलदीप सिंह
Nov 30, 2025, 02:27 pm IST
in रक्षा, विश्लेषण
Mahe shallow water craft

प्रतीकात्मक तस्वीर

बीते कुछ वर्षों में भारत के समुद्री सामरिक परिदृश्य में जितने व्यापक और निर्णायक बदलाव देखने को मिले हैं, वे केवल प्लेटफॉर्म अधिग्रहण का हिस्सा नहीं बल्कि एक व्यापक रणनीतिक पुनरुत्थान का संकेत हैं। हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती दखलंदाजी, पश्चिमी समुद्री मार्गों पर उभरती सुरक्षा चुनौतियां, साइबर-सक्षम नौसैनिक युद्ध और ‘ब्लू वॉटर नेवी’ बनने की भारत की दीर्घकालिक आकांक्षा ने भारतीय नौसेना को अपनी क्षमताओं को तेजी से उन्नत करने के लिए प्रेरित किया है। इसी क्रम में नवंबर 2025 भारतीय नौसेना के सैन्य इतिहास में स्वर्णाक्षरों से दर्ज करने योग्य महीना बन गया क्योंकि मात्र चार दिनों के अंतराल में दो अत्यंत आधुनिक, स्वदेशी युद्धक प्लेटफॉर्म (आईएनएस माहे और आईएनएस तारागिरी) नौसेना को प्राप्त हुए। इन दोनों पोतों ने भारत की नौसैनिक क्षमता, आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन और समुद्री प्रभुत्व स्थापित करने की नीति को अभूतपूर्व बल प्रदान किया है।

तटीय जलरक्षाओं का मौन शिकारी आईएनएस माहे

24 नवंबर को भारतीय नौसेना में शामिल हुआ ‘आईएनएस माहे’ केवल एक नया पोत नहीं, हिंद महासागर में बदलती सामरिक परिस्थितियों के बीच भारत की नौसैनिक सोच के निर्णायक परिवर्तन का प्रतीक है। यह माहे-श्रेणी का पहला एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट (एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी) है, एक ऐसा प्लेटफॉर्म, जो समुद्र की सतह के नीचे छिपे उन खतरों का शिकार करने के लिए जन्मा है, जो आधुनिक युद्धक रणनीतियों में सबसे जटिल और घातक माने जाते हैं। आज का समुद्री युद्धक्षेत्र पनडुब्बियों के इर्द-गिर्द घूम रहा है, जो अदृश्य हैं, चुपचाप आगे बढ़ती हैं और रणनीतिक लक्ष्यों पर बिना चेतावनी के हमला कर सकती हैं। भारत के विस्तृत तटीय क्षेत्र, महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक रूट और हिंद महासागर में बढ़ती भू-सामरिक प्रतिस्पर्धा यह अनिवार्य बना चुके थे कि नौसेना के पास ऐसा साधन हो, जो उथले समुद्री इलाकों में भी आसानी से प्रवेश कर सके और पनडुब्बी-रोधी युद्धक अभियानों में निर्णायक बढ़त दिला सके। यही वह स्थान है, जहां आईएनएस माहे अपनी वास्तविक शक्ति और अनिवार्यता को सिद्ध करता है।

तकनीकी परिष्कार और सामरिक कौशल का मेल

आईएनएस माहे की तकनीकी बनावट यह स्पष्ट कर देती है कि इसे किसी परंपरागत युद्धपोत की तरह नहीं, ‘समुद्री शिकारी’ के रूप में विकसित किया गया है। 78 मीटर लंबाई, 900-1100 टन विस्थापन और मात्र 2.7 मीटर ड्राफ्ट इसे उन क्षेत्रों में सक्रिय रहने की अनुमति देता है, जहां बड़े पोत प्रवेश तक नहीं कर सकते। 25 नॉट की गति और 1,800 नॉटिकल मील की परिचालन क्षमता इसे बड़े अभियानों, आकस्मिक मिशनों और तटीय सतर्कता, तीनों में सर्वोत्तम बनाती है। इसका वॉटर-जेट आधारित प्रणोदन इसे न केवल तेज प्रतिक्रिया देने योग्य बनाता है बल्कि समुद्री सतह पर कम ध्वनि-चिह्न छोड़ता है, जिससे इसकी उपस्थिति लगभग अदृश्य-सी प्रतीत होती है। माहे की असली शक्ति इसके सेंसर्स और स्ट्राइक सिस्टम में छिपी है। डीआरडीओ द्वारा विकसित ‘अभय हल माउंटेड सोनार’ और कम आवृत्ति परिवर्तनीय गहराई सोनार (एलएफवीडीएस) इसे किसी भी गहराई पर सक्रिय पनडुब्बियों का पता लगाने, उनकी ध्वनि-तरंगों का विश्लेषण करने और पलटवार करने की क्षमता प्रदान करते हैं। इस प्लेटफॉर्म पर मौजूद आधुनिक टॉरपीडो और एएसडब्ल्यू रॉकेट इसे केवल खोजने का नहीं बल्कि नष्ट कर देने का सामर्थ्य देते हैं। माइन-बिछाने की क्षमता इसे समुद्री मार्गों को नियंत्रित करने का अतिरिक्त रणनीतिक लाभ देती है।

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सतह के ऊपर सुरक्षित आकाश

आईएनएस माहे की भूमिका केवल एक युद्धक मंच की नहीं होगी, यह बड़े युद्धपोतों के लिए सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करेगा। जैसे ही यह समुद्र की गहराइयों से खतरों को निष्क्रिय करेगा, सतह और वायु-आधारित प्लेटफॉर्म अपने लक्ष्यों पर पूर्ण क्षमता के साथ आगे बढ़ सकेंगे। इस प्रकार माहे उस अदृश्य ढ़ाल की भूमिका निभाएगा, जिसकी बदौलत भारत की नौसैनिक शक्ति समुद्र में बहुआयामी अभियानों को सुरक्षित रूप से अंजाम दे सकेगी। भविष्य में समुद्री संसाधनों, व्यापार मार्गों और जलक्षेत्रीय संप्रभुता की रक्षा का महत्व और बढ़ेगा। ऐसे समय में आईएनएस माहे केवल तटीय जलरक्षाओं का नया अध्याय नहीं बल्कि वह मौन शिकारी है, जिसने भारतीय नौसेना को उस शक्ति-संतुलन की ओर अग्रसर कर दिया है, जहां शत्रु की परछाई भी समुद्र में सुरक्षित नहीं रह सकती। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि माहे का शामिल होना भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति में निर्णायक, अदृश्य और अत्यंत शक्तिशाली क्रांति का आरंभ है।

ब्लू-वॉटर पावर का नया अवतार ‘आईएनएस तारागिरी’

28 नवंबर को आईएनएस तारागिरी के जलावतरण के साथ भारतीय नौसैनिक इतिहास में एक और स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया। आईएनएस माहे के मात्र चार दिन बाद भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल हुआ यह स्टील्थ फ्रिगेट प्रोजेक्ट 17ए का चौथा और अब तक का सबसे उन्नत संस्करण है। विशेषज्ञ इसे यूं ही ‘क्वांटम लीप’ नहीं कहते; यह जहाज उन सिद्धांतों, उन क्षमताओं और उस सामरिक दृष्टि का साकार रूप है, जिसने भारत की नौसैनिक रणनीति को तटीय प्रहरी से एक सशक्त ब्लू-वॉटर फोर्स में बदलना शुरू किया है। भारतीय नौसेना के लिए यह फ्रिगेट एक ऐसा युद्धपोत है, जो न केवल भारत की समुद्री सीमाओं की रक्षा करता है बल्कि हिंद महासागर से लेकर भूमध्य सागर और पश्चिमी इंडो-पैसिफिक तक भारत की रणनीतिक उपस्थिति को प्रमाणित करता है। शक्ति, प्रौद्योगिकी, स्वदेशी नवोन्मेष और भू-राजनीतिक प्रभाव, इन चारों तत्वों का सम्मिलित रूप है ‘आईएनएस तारागिरी’।

रणनीतिक मारक क्षमता का बहुआयामी युद्ध मंच

तारागिरी की युद्धक क्षमता इसकी सोच में निहित है। यह पोत सतह, हवा और पानी, तीनों ही युद्ध आयामों में एक साथ मुकाबला करने की ताकत रखता है। ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की 300 किमी से अधिक की मारक दूरी इसे समुद्र से भूमि और नौसैनिक लक्ष्यों पर ‘फर्स्ट स्ट्राइक एडवांटेज’ प्रदान करती है। एमएफ-स्टार मल्टी-फंक्शनल रडार इसे अत्याधुनिक सर्विलांस क्षमता देता है, जो आने वाली किसी भी मिसाइल, विमान या पनडुब्बी को समय रहते पहचान सकता है। एमआरएसएएम मिसाइल प्रणाली इसे हवा में उड़ते खतरों से अजेय बनाती है। 76 एमएम सुपर रैपिड गन, 30 सीआईडब्ल्यूएस, एएसडब्ल्यू टॉरपीडो और शक्तिशाली रॉकेट लॉन्चर तारागिरी को सघन युद्धक्षेत्र में भी निर्णायक बढ़त देते हैं। यह फ्रिगेट युद्ध के हर मोर्चे पर सक्रिय रहने वाले ‘लिथल इकोसिस्टम’ की तरह है, जहां हमला, रक्षा और प्रतिक्रिया, तीनों बराबर तीक्ष्ण और स्वायत्त हैं।

डिजिटल युग के लिए निर्मित फ्रिगेट

आईएनएस तारागिरी की वास्तविक परिभाषा इसकी तकनीकी संरचना में बसे भविष्य में है। भारतीय वारशिप डिजाइन ब्यूरो द्वारा निर्मित 75 प्रतिशत स्वदेशी तकनीक वाला यह प्लेटफॉर्म, भारत की आत्मनिर्भर नौसैनिक इंजीनियरिंग का सर्वोच्च उदाहरण है। इसका सीओडीओजी प्रणोदन तंत्र इसे डीजल और गैस टरबाइन दोनों विकल्प देता है। आवश्यकता के अनुरूप गति और ईंधन दक्षता का संतुलन इसे महासागरीय अभियानों में अनुपम लचीलापन प्रदान करता है। एकीकृत प्लेटफॉर्म मैनेजमेंट सिस्टम इसे नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर के लिए तैयार करता है। इसका स्टील्थ डिजाइन, कम रडार परावर्तन क्षमता और कम्प्यूटरीकृत नियंत्रण प्रणाली इसे आधुनिक इलैक्ट्रॉनिक युद्ध, सेंसर फ्यूजन और एआई आधारित सामरिक निर्णय-निर्माण की दिशा में अग्रसर करते हैं।

समुद्र की गहराइयों पर भारत की नई मुहर

आईएनएस तारागिरी केवल एक युद्धपोत नहीं, भारत की भू-रणनीतिक आत्मविश्वास की घोषणा है, जो बताती है कि भारत अब केवल अपने समुद्रों की रक्षा नहीं कर रहा बल्कि समुद्र को शक्ति-परिवहन, रणनीतिक प्रभुत्व और वैश्विक भूमिका के माध्यम के रूप में पुनर्परिभाषित कर रहा है। यह फ्रिगेट भविष्य के महासागरीय युद्धक सिद्धांतों का प्रारूप है, जहां गति, बुद्धिमत्ता, स्टील्थ और मारक क्षमता मिलकर समुद्र को ‘रणभूमि’ नहीं, ‘रणनीतिक नियंत्रण का विस्तार’ बना देती हैं। आईएनएस तारागिरी के साथ भारतीय नौसेना ने यह संकेत दे दिया है कि हिंद महासागर अब भारत का प्रभाव क्षेत्र है और उसे चुनौती देने वाले अब महासागर की लहरों में कहीं अधिक सतर्क रहेंगे।

रणनीतिक स्वतंत्रता की रीढ़

उन्नत युद्धपोतों के लिए भारत एक दशक पूर्व तक विदेशों पर निर्भर था परंतु आज स्थिति बदल चुकी है। आईएनएस माहे और तारागिरी क्रमशः 80 और 75 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री के साथ न केवल तकनीकी आत्मनिर्भरता की मिसाल हैं बल्कि यह संकेत भी देते हैं कि भारत अब अपने समुद्री भविष्य को दूसरों के हाथों में नहीं छोड़ने वाला। इस परियोजना में शामिल 200 से अधिक एमएसएमई, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष 14,000 नौकरियों का सृजन और स्वदेशी प्रणालियों का उपयोग देश के औद्योगिक और सामरिक दोनों ढ़ांचे को नया आयाम देता है। कुल मिलाकर, आईएनएस माहे और आईएनएस तारागिरी का नौसेना में शामिल होना भारत के समुद्री आत्मविश्वास, तकनीकी-सैन्य परिपक्वता और हिंद महासागर में शक्ति-संतुलन के नेतृत्व की उसकी बदलती भूमिका का उद्घोष है। भारत आज उस मोड़ पर खड़ा है, जहां वह केवल समुद्र की रक्षा नहीं कर रहा बल्कि उसे नियंत्रित करने की क्षमता विकसित कर रहा है। ये दोनों युद्धपोत उस भविष्य की नींव हैं, जिसमें भारतीय नौसेना केवल तटीय संरक्षक नहीं बल्कि वैश्विक जलमार्गों की एक निर्णायक शक्ति बनकर उभरेगी।

(लेखक साढ़े तीन दशक से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और सामरिक मामलों के विश्लेषक हैं)

 

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