श्रीमद्भगवद्गीता क्यों दुनिया भर के विश्वविद्यालय पढ़ा रहे हैं? जानें इसकी वैश्विक मान्यता
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श्रीमद्भगवद्गीता क्यों दुनिया भर के विश्वविद्यालय पढ़ा रहे हैं? जानें इसकी वैश्विक मान्यता

गीता साधारण कर्मवाद को कर्मयोग में परिवर्तित करने के लिए तीन साधनों पर बल देती है-1. फल की आकांक्षा का त्याग 2. कर्त्तापन के अहंकार से मुक्ति 3. ईश्वरार्पण। इन सूत्रों में वेदों एवं उपनिषदों का सार झलकता है।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by Mahak Singh
Nov 30, 2025, 02:14 pm IST
in भारत
Srimad Bhagavad Geeta

Srimad Bhagavad Geeta

महाभारत युद्ध आरम्भ होने से पहले मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी की पावन तिथि को किंकर्तव्यविमूढ़अर्जुन और योगेश्वर कृष्ण के मध्य आत्मा की अनश्वरता और निष्काम कर्म के सनातन तत्वदर्शन पर जो अनूठा वार्तालाप हुआ था; सनातन धर्म का वह नवनीत आज पूरी दुनिया में ‘श्रीमद्भागवद्गीता’ के रूप में विख्यात है। वर्तमान समय से पांच हजार वर्ष पहले कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में दिया गया विश्व के सबसे बड़े नीतिज्ञ भगवान श्रीकृष्ण का यह वचनामृत ‘महाभारत’ के छठे खंड “भीष्म पर्व” का सर्वाधिक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस अमृतोपम गीताज्ञान के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने जहां एक ओर मोहग्रस्त अर्जुन को गीता का ज्ञान देकर क्षत्रियोचित कर्म हेतु प्रेरित किया था तो दूसरी ओर एक युगप्रवर्तक धर्म प्रवक्ता के रूप में धर्म के नाम पर पुरातन काल से चली आ रही अंधरूढ़ियों का निराकरण कर धर्म का सहज, सरल और लोकोपयोगी स्वरूप जनसामान्य के समक्ष प्रस्तुत किया था।

युद्ध की भूमि से अमन का यह संदेश

देश-दुनिया के सभी दार्शनिक व मनीषी आज इस विषय पर एकमत हैं कि 18 अध्यायों के 700 श्लोकों में प्रवाहित इस अद्भुत ज्ञान गंगा का कोई सानी नहीं है। अपनी तर्कपूर्ण शिक्षाओं और प्रकाशपूर्ण प्रेरणाओं के कारण समूचे विश्व में जीवन प्रबंधन के अनुपम ग्रन्थ के रूप में लोकप्रिय ‘श्रीमद्भगवदगीता’ सनातन हिन्दू धर्म की अनमोल निधि है। इसके अनूठे ग्रन्थ के प्रत्येक श्लोक में ज्ञान का अनूठा प्रकाश है। मानव जीवन की इस उत्कृष्टतम आचार संहिता की विशिष्टता यह है कि अमन का यह संदेश युद्ध की भूमि से दिया गया है। किंकर्तव्यविमूढ़ मनुष्य को आत्मकल्याण का पथ सुझाकर भटकाव से बचाने वाले इस शास्त्र में किसी पंथ विशेष की नहीं अपितु विश्व मानव के हित के लिए ज्ञान, भक्ति व कर्म की तथ्यपूर्ण चर्चा मिलती है। इसमें परस्पर विरोधी दिखाई देने वाले अनेक विश्वासों को मनोवैज्ञानिक ढंग से एक साथ गूंथकर मानव जाति के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया गया है। यही कारण है कि इस कृति को मानवीय प्रबंधन के अद्भुत ग्रन्थ की वैश्विक मान्यता हासिल है।

ज्ञान, भक्ति व कर्म के तथ्यपूर्ण समन्वय की अद्भुत व्याख्या

सनातन धर्म के तत्वदर्शी मनीषियों की मानें तो इस अनूठे धर्मशास्त्र में किसी पंथ विशेष की नहीं अपितु विश्व मानवता के कल्याण के लिए ज्ञान, भक्ति व कर्मयोग के तथ्यपूर्ण समन्वय की अद्भुत व्याख्या मिलती है। गीता साधारण कर्मवाद को कर्मयोग में परिवर्तित करने के लिए तीन साधनों पर बल देती है-1. फल की आकांक्षा का त्याग 2. कर्त्तापन के अहंकार से मुक्ति 3. ईश्वरार्पण। इन सूत्रों में वेदों एवं उपनिषदों का सार झलकता है। तत्वदर्शी मनीषियों का कहना है कि ज्ञान,भक्ति व कर्म की इस अनूठी त्रिवेणी को जितनी बार पढ़ा जाता है, इसके ज्ञान के नित नये रहस्य खुलते जाते हैं। युद्ध से पूर्व विषादग्रस्त अर्जुन को धर्म की स्थापना के लिए निष्काम कर्म के पथ पर प्रेरित करने के लिए विश्व के महानतम नीतिज्ञ श्रीकृष्ण व किंकर्तव्यविमूढ़ अर्जुन के मध्य का संवाद इस गीता ज्ञान का मूलतत्व है। किंकर्तव्य विमूढ़ मनुष्य को आत्मकल्याण का पथ सुझाकर भटकाव से बचाने वाले इस दिव्य ग्रन्थ में किसी पंथ विशेष की नहीं; अपितु विश्व मानव के हित के लिए ज्ञान, भक्ति व कर्म की तथ्यपूर्ण व्याख्या की गयी है। इसमें परस्पर विरोधी दिखाई देने वाले अनेक विश्वासों को मनोवैज्ञानिक ढंग से एक साथ गूंथकर मानव जाति के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया गया है।

श्रीमद्भगवदगीता की प्रमुख टीकाएं और सुप्रसिद्ध भाष्य

इस अनुपम ग्रन्थ की वैश्विक लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अपने अनूठे विषय वैशिष्ट्य के कारण दुनियाभर अठहत्तर भाषओं में इसके 250 से ज्यादा अनुवाद और व्याख्यान तथा दर्जनों टीकाएं व भाष्य हो चुके हैं। इसके प्रमुख टीका व बहुचर्चित भाष्य हैं- अष्टावक्र गीता ( राजा जनक व अष्टावक्र के मध्य का संवाद), अवधूत गीता (दत्तात्रेय महराज ), गीता भाष्य (आदि शंकराचार्य), गीता भाष्य (रामानुज), ज्ञानेश्वरी (संत ज्ञानेश्वर), ईश्वरार्जुन संवाद (परमहंस योगानंद), गीता यथारूप (प्रभुपाद स्वामी), भगवदगीता का सार (स्वामी क्रियानन्द), गीता साधक संजीविनी (रामसुख दास जी), गीता चिंतन (हनुमान प्रसाद पोद्दार), गूढ़ार्थ दीपिका टीका (मधुसूदन सरस्वती ), सुबोधिनी टीका (श्रीधर स्वामी ), अनासक्ति योग ( महात्मा गांधी), गीता पर निबंध (अरविन्द घोष ), गीता रहस्य (बाल गंगाधर तिलक), गीता प्रवचन (विनोबा भावे), गीता तत्व विवेचनी (जयदयाल गोयन्दका ), भगवदगीता का सार (स्वामी क्रियानन्द ), यथार्थ गीता (स्वामी अड़गड़ानंद जी) विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।

सनातन धर्म के अध्यात्मिक ग्रंथों में “अष्टावक्र गीता” एक अमूल्य ग्रन्थ माना जाता है। अद्वैत वेदान्त के इस ग्रन्थ में ऋषि अष्टावक्र और राजा जनक के संवाद का संकलन है। ग्रंथ में राजा जनक के तीन प्रश्नों की व्याख्या है-ज्ञान कैसे प्राप्त होता है ? मुक्ति कैसे होगी और वैराग्य कैसे प्राप्त होगा ? ये तीन शाश्वत प्रश्न हैं जो हर काल में आत्मानुसंधानियों द्वारा पूछे जाते रहे हैं। इस ग्रन्थ में ज्ञान, वैराग्य, मुक्ति और बुद्धत्व प्राप्त योगी की दशा का सविस्तार वर्णन है। कहते हैं कि रामकृष्ण परमहंस ने भी यही पुस्तक नरेंद्र को पढ़ने को कही थी जिसके पश्चात वे उनके शिष्य बने और कालांतर में स्वामी विवेकानंद के नाम से प्रसिद्ध हुए। इसी तरह गीता के भाष्यों में चर्चित “अवधूत गीता” भी अद्वैत वेदान्त के सिद्धान्तों पर आधारित संस्कृत ग्रन्थ है। अवधूत स्वामी दत्तादेय महराज द्वारा रचित यह ग्रन्थ नाथ योगियों का महत्वपूर्ण ग्रन्थ माना जाता है। आदि शंकराचर्य के “गीता भाष्य” में वैदिक कर्मकांड और उपनिषदों के ब्रह्मवाद का अद्भुद समन्वय मिलता है। उपनिषदों के वेदांत तथा बौद्ध और जैन धर्म के संन्यासवाद के प्रभाव से भारतीय जनता में विरक्ति और निवृत्ति के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए उन्होंने गीता के कर्मयोग की युगानुकूल व्याख्या कर देश को एक नया संजीवनी मंत्र प्रदान किया।

वहीं दूसरी ओर संत ज्ञानेश्वर की “ज्ञानेश्वरी” में वर्णित ज्ञान एवं भक्ति के समन्वय के साथ नाथ संप्रदाय के योग, स्वानुभव इत्यादि की व्याख्या की गयी है। यद्यपि उन्होंने अपनी टीका शंकराचार्य के “गीताभाष्य” के आधार पर लिखी मगर इन मूल सिद्धांतों को भागवत सम्प्रदाय की सुदृढ़ पीठिका पर प्रतिष्ठित किया गया है। अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ “इस्कॉन” के संस्थापक आचार्यश्री ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद द्वारा रचित “भगवद्गीता यथारूप” की प्रामाणिकता और दिव्यता की वजह से आज विश्व में सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली गीता है। 200 से भी ज्यादा भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है। इसी तरह विनोबा भावे के “गीता प्रवचन” में कृष्ण-अर्जुन संवाद की समाजशास्त्रीय दृष्टि से अद्भुत विवेचना मिलती है। विनोबा जी लिखते हैं गीता और उनका सम्बन्ध तर्क से परे है। उनका शरीर मां के दूध पर जितना पला है, उससे कहीं अधिक उनका पोषण गीता के ज्ञानामृत से हुआ है। वहीं स्वामी श्री रामसुखदास जी द्वारा गीता के सरल भाषा में किये गये भाष्य “गीता प्रबोधनी” संस्कृत न जानने वाले व्यक्तियों के लिये बहुत उपयोगी है।

इसमें भगवान श्रीकृष्ण के मानव जीवनोपयोगी दिव्य उपदेश संकलित हैं। इसी तरह बाल गंगाधर तिलक के भाष्य “गीता रहस्य” में भगवान श्रीकृष्ण के निष्काम कर्मयोग की जो सरल, व्यावहारिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से स्पष्ट व्याख्या मिलती है, वह अपने आप में अद्भुत है। इसकी इस पुस्तक की रचना लोकमान्य जी ने माण्डला जेल (बर्मा) में की थी। वे अपने समय और समाज के मुताबिक गीता को देखना और समझना चाहते थे। एक थके हुए गुलाम समाज को जगाने के लिए वह गीता को संजीवनी बनाना चाहते थे। जानना दिलचस्प होगा कि इस “गीता रहस्य” को तिलक ने पांच महीने कारावास अवधि में पेंसिल से लिखा था। इस ग्रंथ में तिलक ने मनुष्य को उसके संसार में वास्तविक कर्तव्यों का बोध कराया है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तो “गीता” को अपनी माता कहते थे। उनकी गीता पर टीका “अनासक्ति योग” भी एक पठनीय ग्रन्थ है जिसमें उपनिषदों का सार निहित है। उन्होंने स्वयं अपने जीवन में अनासक्ति योग का पालन किया। इसी के बल पर उन्होंने न सिर्फ भारत की राजनीति का नक्शा बदल दिया वरन विश्व को सत्य, अहिंसा, शांति और प्रेम की अजेय शक्ति के दिग्दर्शन कराया। गीता के अनेकानेक भाष्यों के बीच जिस टीका ने विशेष लोकप्रियता पायी वह है स्वामी अड़गड़ानंद महराज की “यथार्थ गीता”। इस ग्रन्थ में कर्मफल त्याग की अनूठी व्याख्या मिलती है। इस कृति में स्वामी जी ने इस बात पर बल दिया है कि अंधश्रद्धा व बाह्याचारिता भक्ति नहीं है; अपितु भक्त वह है जो किसी से द्वेष नहीं करता, करुणा का भंडार है, ममता-रहित है, निरहंकार है, सुख-दुःख, शीत-उष्ण व मान-अपमान में सम है, क्षमाशील व संतोषी है, जिसके निश्चय कभी बदलते नहीं, जिसने अपनी मन और बुद्धि ईश्वर को अर्पण कर दिया हैं। ऐसे भक्त ही ईशकृपा के सच्चे अधिकारी होते हैं।

विभिन्न देशों के शैक्षिक पाठ्यक्रमों में शामिल

गौरतलब हो कि श्रीमद्भगवद्गीता एक धर्मग्रंथ मात्र नहीं है, अपितु जीवन-मृत्यु के दुर्लभ सत्य को अपने में समेटे हुए सनातन धर्म की ऐसी अनमोल निधि है जो निराश, हताश, थके, भयभीत व दुखी मनुष्य के हृदय में आशा, प्रेम, शक्ति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। यह हमें जीवन के शत्रुओं से लड़ने और सर्वशक्तिमान परमात्मा से एक गहरा नाता जोड़ने में मदद करती है। देश दुनिया के मनीषियों की मान्यता है कि गीता सिर्फ पुस्तकीय ज्ञान नहीं बल्कि समग्र जीवन दर्शन है जो समूची विश्व वसुधा को “सर्वे भवन्तु सुखिन:” का पाठ पढ़ाती है। हर्ष का विषय है कि श्रीमद्भगवद्गीता की इन्हीं लोकहितकारी शिक्षाओं से प्रेरित होकर आज देश-दुनिया के विभिन्न शिक्षण-प्रबंधन संस्थान इस अनमोल ज्ञान को अपने पाठ्यक्रमों का हिस्सा बना रहे हैं। अमेरिका, जर्मनी व नीदरलैंड जैसे कई विकसित देशों ने इसे अपने देश के शैक्षिक पाठ्यक्रम में शामिल कर रखा है। अमेरिका के न्यूजर्सी स्थित सैटान हॉल विश्वविद्यालय में तो हरेक छात्र गीता का अंग्रेजी अनुवाद नियमित रूप से पढ़ता है। शिक्षाविदों का मानना है कि श्रीमद्भगवद्गीता के शैक्षिक पाठ्यक्रम में शामिल होने से नई पीढ़ी को न सिर्फ जीवन मूल्यों की शिक्षा मिलेगी वरन उनके व्यक्तित्व का भी संतुलित विकास होगा।

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