‘वाम वायरस’ को क्यों चुभ रही है मैथिली ठाकुर की जीत? नारीवादियों में कुंठा की बदहजमी तेज
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‘वाम वायरस’ को क्यों चुभ रही है मैथिली ठाकुर की जीत? नारीवादियों में कुंठा की बदहजमी तेज

सिर्फ स्त्री होना फेमिनिस्ट नहीं है क्योंकि फेमिनिस्ट होना स्त्री अधिकारों के प्रति सचेत होना है, तो क्या जो स्त्रियां मैथिली की जीत पर इस तरह की बयान बाजी कर रही हैं, वह स्त्री अधिकार, स्त्री सशक्तिकरण के प्रति सचेत है?

Written byमनीषा शर्मामनीषा शर्मा — edited by Lalit Fulara
Nov 27, 2025, 12:22 pm IST
inमत अभिमत

जब से मैथिली ठाकुर को टिकट मिला तभी से उसके खिलाफ अनर्गल बयान बाजी जारी थी। पहले चिंता की जा रही थी कि इतनी कम उम्र में वह किस प्रकार से राजनीतिक दाव- पेच को समझ पाएगी, उसमें अभी परिपक्वता नहीं है अतः उसे राजनीति में नहीं आना चाहिए।

इसके बाद जब उसे चुनाव में जीत मिल जाती है तो तथाकथित बुद्धिजीवियों की टोली बिहार के लोगों को दोषी ठहराने लगती है और कहती है कि एक विद्वान को छोड़ लोगों ने मैथिली को चुना। मैथिली एक गायिका है, उसे वहीं करना चाहिए जो वह कर रही है। खूब छाती पीटी गई ।

मैथिली की जीत पर कुंठा निकाल रहे वामपंथी
इन सब से भी जब जी नहीं भरा तो अब सोशल मीडिया पर ए आई जेनरेटेड वीडियो और फोटो वायरल हो रहे हैं। इनमें कभी प्रधानमंत्री मोदी के साथ, कभी चिराग पासवान के साथ सिंदूर लगाए, माला पहने मैथिली के मान सम्मान को हनन करने का सिलसिला लगातार जारी है। किसी महिला का इस तरह से मान हनन हो रहा है और तथाकथित महिला अधिकारों की रक्षक बुद्धिजीवियों की पूरी कौम शांत है।

जो सक्रिय भी है तो मैथिली की जीत पर अपनी कुंठा निकाल रहे है। एक वामपंथी लेखिका मैथिली ठाकुर की जीत पर सोशल मीडिया पर लिखती है कि मैथिली पितृसत्ता की मलाई चाट रही है। महिला होना फेमिनिस्ट होना नहीं होता । मैथिली की कोई पहचान नहीं, वह तो कंगना रनौत ,हेमा मालिनी, स्मृति ईरानी की तरह है। लेकिन यह सब देखकर, सुनकर भी मैथिली शांत है ।

सिर्फ स्त्री होना फेमिनिस्ट नहीं है….
सिर्फ स्त्री होना फेमिनिस्ट नहीं है क्योंकि फेमिनिस्ट होना स्त्री अधिकारों के प्रति सचेत होना है, तो क्या जो स्त्रियां मैथिली की जीत पर इस तरह की बयान बाजी कर रही हैं, वह स्त्री अधिकार, स्त्री सशक्तिकरण के प्रति सचेत है? अब बात कर ली जाए कि फेमिनिस्ट का मतलब इन वाम विचारधारा से प्रेरित अत्याधुनिक नारियों के लिए क्या है? फेमिनिस्ट मतलब देश की सांस्कृतिक पद्धति, रीति – नीति को पिछड़ा और दकियानूसी बताना, राष्ट्र को गाली देना ,आधुनिकता के नाम पर छोटे या कम कपड़े पहनना, हाथ में गिलास और होठों पर सिगरेट के कश के साथ सोशल मीडिया पर फोटो डालना और कैप्शन में माय लाइफ माय चॉइस कहना, पुरुषों को भद्दी और गंदी गालियां देना इन तथाकथित प्रगतिशील विचारधारा से प्रेरित महिलाओं के लिए सिर्फ यही फेमिनिज्म का मतलब है।

नारीवादियों का महिला विमर्श, महिला की हर समस्या के लिए पुरुष को दोषी ठहराना
इनके लिए परिवार पिंजरा है, रिश्ते नाते जंजीरें है। जो विवाह को उत्पीड़न माने, जो हर रिश्ते को बंधन माने, जिनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ विद्रोह है । इनका महिला विमर्श महिला की हर समस्या के लिए सिर्फ पुरुष को दोषी बताता है लेकिन यह खुद क्या कर रही है यह सोचने की जरूरत इन्हें नहीं लगती। आज घर तोड़ना और किसी रिश्ते के साथ किसी भी प्रकार का सामंजस्य नहीं बैठाना नारीवाद है।

जो महिलाएं किसी सांस्कृतिक सरोकारों से, जो संस्कृति से, जो अपनी जड़ों से जुड़ी हैं, वह इनके लिए पितृसत्तात्मकता की पोषक है। यह मैथिली को कह रहे हैं कि उसे कोई नहीं पहचानता, आवश्यकता इन्हें यह समझने की है कि इनकी पहचान क्या है? क्यों यह इतनी असंतुष्ट है कि सिर्फ सोशल मीडिया पर आकर गाली गलौच, अभद्र भाषा में अपनी बात रखना ही इन्हें संतुष्ट करता है।

मैथिली की जीत प्रोग्रेसिव माइंडसेट के वाम वायरस के लिए अजीर्ण
यहां एक बात और गौर करने लायक है कि आखिर मैथिली की जीत पर ही इतनी बैचेनी क्यों है! मैथिली भी एक महिला है और एक महिला होने के नाते अगर वह इस मुकाम पर पहुंचती है, महज 25 साल की उम्र में तो कहीं ना कहीं हर एक महिला के लिए खुशी की बात होनी चाहिए । लेकिन ये प्रोग्रेसिव माइंडसेट की वाम वायरस से ग्रस्त बुद्धिजीवियों की जमात इसलिए दुखी है कि वह महिलाओं के लिए आदर्श बन गई है , वह एक यूथ आइकॉन बनकर उभरी है। इन सब की असल मुश्किल मैथिली नहीं बल्कि मैथिली का व्यक्तित्व है ।

उसका सनातन संस्कृति को प्रेरित करता व्यक्तित्व जिससे इन लोगों को चिढ़ है। न वह गाली गलौज करती है, ना देश को न सनातन को कोसती है, ना पितृसत्तात्मकता का विरोध करती है। अतः मैथिली पुरातनपंथी विचारों वाली है और आजाद , सशक्त और स्वतंत्र महिला के ढांचे में फिट नहीं बैठती है। वह सादगी के साथ साड़ी,चूड़ी पहनती है,बिंदी लगाती है,मैथिली के साथ उसके पिता और भाई है,उसका परिवार है, उसके साथ संस्कार है ,उसके साथ लोक संस्कृति है,परंपरा है,अपनी जड़ों से जुड़ाव है अतः मैथिली इनके लिए पितृसत्तात्मकता की मलाई चाटने वाली है। आज मैथिली ठाकुर ऐसे लोगों के लिए अजीर्ण का कारण बन गई है ।

उसने एक उदाहरण पेश किया है कि किस तरह से बनावट से दूर, सादगी के साथ, अपनी संस्कृति और देश को मान देकर, अपनी जड़ों से ,अपने परिवार से जुड़ा रहकर आत्मविश्वास के साथ सफलता का इतिहास रचा जा सकता है।

Topics: Left virus Maithili victoryWhy leftists angry over Maithili winMaithili victory leftists reactionFeminists frustrated with MaithiliLeft ideology vs Sanatan cultureMaithili win controversyLeft vs Sanatan narrativeFeminists reaction to MaithiliLeftist outrage MaithiliMaithili success criticism
मनीषा शर्मा
मनीषा शर्मा
लेखिका और शिक्षाविद् [Read more]
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