प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सांस्कृतिक उद्घोष : धर्म ध्वजारोहण से विकसित भारत-2047 की यात्रा
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सांस्कृतिक उद्घोष : धर्म ध्वजारोहण से विकसित भारत-2047 की यात्रा

प्रभु श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री जी ने राम से राष्ट्र के संकल्प की चर्चा की

Written byसार्थक शुक्लासार्थक शुक्ला
Nov 26, 2025, 06:59 pm IST
inभारत
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी

प्रभु श्री राम की नगरी श्री अयोध्याजी में ‘पवित्र धर्म ध्वजारोहण’ के सुअवसर पर माननीय प्रधानमंत्री जी ने जिस व्यापक दृष्टि, आत्मिक चेतना और दीर्घकालिक राष्ट्रीय संकल्प का उद्घोष किया वह केवल धार्मिक भावनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के भविष्य विशेष रूप से युवाओं के लिए एक मार्गदर्शन के रूप में है। प्रधानमंत्री जी ने सम्पूर्ण उद्बोधन के माध्यम से भारतीय सभ्यता, आध्यात्मिक परंपरा और आधुनिक राष्ट्र-निर्माण को एक सूत्र में बांधकर युवाओं के सामने एक ऐसा मार्ग प्रस्तुत किया है, जिसमें श्री राम के आदर्श, भारत की युग-युगांतर की विरासत, नागरिकों में आत्मविश्वास, राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना और 2047 तक विकसित भारत की संकल्पना, सब कुछ एक समन्वित रूप में दिखाई देता है।

प्रधानमंत्री जी ने उद्बोधन में कहा, “हम सब जानते हैं, हमारे राम भेद से नहीं, भाव से जुड़ते हैं। उनके लिए व्यक्ति का कुल नहीं, उसकी भक्ति महत्वपूर्ण है। उन्हें वंश नहीं, मूल्य प्रिय हैं। उन्हें शक्ति नहीं, सहयोग महान लगता है। आज हम भी उसी भावना से आगे बढ़ रहे हैं। पिछले 11 वर्षों में, महिला, दलित, पिछड़े, अति-पिछड़े, वनवासी, वंचित, किसान, श्रमिक, युवा, हर वर्ग को विकास के केंद्र में रखा गया है। जब देश का हर व्यक्ति, हर वर्ग, हर क्षेत्र सशक्त होगा, तब संकल्प की सिद्धि में सबका प्रयास लगेगा। और सबके प्रयास से ही 2047, जब देश आजादी के 100 साल मनाएगा, हमें 2047 तक विकसित भारत का निर्माण करना ही होगा।” संदेश स्पष्ट है कि विकसित भारत की यात्रा सभी वर्गों, सभी क्षेत्रों और संपूर्ण समाज के एक्य भाव से ही पूर्ण होगी। एक भारत, श्रेष्ठ भारत का जयगान, भारत की नई विकास-दृष्टि किसी एक वर्ग को केंद्र में रखकर नहीं, बल्कि सामूहिकता और समरसता के आदर्शों पर खड़ी है।

राम से राष्ट्र का संकल्प

प्रभु श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री जी ने राम से राष्ट्र के संकल्प की चर्चा की। उन्होंने कहा, “हमें आने वाले एक हजार वर्षों के लिए भारत की नींव मजबूत करनी है। हमें याद रखना है, जो सिर्फ वर्तमान का सोचते हैं, वो आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय करते हैं। हमें वर्तमान के साथ-साथ भावी पीढ़ियों के बारे में भी सोचना है, क्योंकि हम जब नहीं थे, ये देश तब भी था, जब हम नहीं रहेंगे, ये देश तब भी रहेगा। हम एक जीवंत समाज हैं, हमें दूरदृष्टि के साथ ही काम करना होगा। हमें आने वाले दशकों, आने वाली सदियों को ध्यान में रखना ही होगा।” हम सबको यह समझना चाहिए कि राष्ट्र-निर्माण केवल वर्तमान का विषय नहीं है बल्कि यह तो भविष्य का संवाहक है। देश के युवा जब अपनी ऊर्जा दीर्घकालिक लक्ष्यों की ओर मोड़ते हैं तो राष्ट्र के नवोत्थान का मार्ग प्रशस्त होता है। भारत की शक्ति उसके निरंतरता के बोध में है, देश था, देश है और देश आगे भी रहेगा, इसलिए राष्ट्र के लिए प्रत्येक पीढ़ी की जवाबदेही स्थायी है।

हमें अपने भीतर ‘राम’ को जगाना होगा

उन्होंने कहा कि “राम सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक मूल्य हैं, एक मर्यादा हैं, एक दिशा हैं। अगर भारत को साल 2047 तक विकसित बनाना है, अगर समाज को सामर्थ्यवान बनाना है, तो हमें अपने भीतर ‘राम’ को जगाना होगा। हमें अपने भीतर के राम की प्राण प्रतिष्ठा करनी होगी, और इस संकल्प के लिए आज से बेहतर दिन और क्या हो सकता है?” हम सबको यह समझना है कि विकसित भारत की संकल्पना सिर्फ आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है बल्कि राष्ट्र के चरित्र, मूल्य, मर्यादा और दिशा से शुरू होती है। भारत को 2047 तक विकसित बनाने के लिए केवल कौशल, नेटवर्क या आर्थिक अवसर पर्याप्त नहीं हैं बल्कि इसके लिए भीतर के राम अर्थात सत्य, अनुशासन, परोपकार, संयम, धैर्य और लोककल्याण की संस्कार चेतना को जगाना आवश्यक है।

स्वाभिमानी सभ्यता के पुनः उद्घोष का क्षण

धर्म ध्वजारोहण के अवसर पर प्रधानमंत्री जी ने कोविदार वृक्ष के पुनः प्रतिष्ठापन का जो उल्लेख किया, मैं उसे हमारे राष्ट्रीय जीवन के लिए अत्यंत गहरी अर्थवत्ता वाला मानता हूं। उन्होंने कहा कि यह केवल एक वृक्ष की वापसी नहीं, बल्कि हमारी स्मृति की वापसी है, हमारी अस्मिता के पुनर्जागरण और हमारी स्वाभिमानी सभ्यता के पुनः उद्घोष का क्षण है, वास्तव में जब कोई समाज अपनी जड़ों, अपने प्रतीकों और अपनी परंपराओं से विमुख होता है तो उसका आत्मविश्वास क्षीण हो जाता है। पहचान की पुनर्स्थापना ही राष्ट्रीय क्षमता को आगे बढ़ाती है, उनका स्पष्ट संदेश है कि विकसित भारत का मार्ग अपनी जड़ों से जुड़े बिना संभव ही नहीं।

मानसिक गुलामी ने आत्मविश्वास को बाधित किया

प्रधानमंत्री जी ने यह भी कहा कि अपनी विरासत पर गर्व जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक गुलामी की मानसिकता से पूर्ण मुक्ति है। वर्ष 1835 में मैकाले ने भारत को अपनी जड़ों से उखाड़ने के जो बीज थोपे थे उसके 200 वर्ष 2035 में पूर्ण हो रहे हैं। प्रधानमंत्री जी ने कठोर शब्दों में कहा कि मानसिक गुलामी का प्रभाव इतना व्यापक हो गया कि स्वतंत्रता के बाद भी हम हीन भावना से मुक्त न हो सके। विदेश की हर वस्तु श्रेष्ठ और अपनी हर परंपरा दोषपूर्ण है, यह सोच हमारे भीतर घर कर गई। प्रधानमंत्री जी ने इसे मानसिक गुलामी का सबसे खतरनाक रूप बताया, जिसने हमारे आत्मविश्वास को बाधित किया और हमें अपने ही ज्ञान-तंत्र को कमतर देखने पर विवश किया।

विकसित भारत के संकल्प को कोई नहीं रोक सकता

इसी परिप्रेक्ष्य में उन्होंने लोकतंत्र की जड़ों का स्मरण कराते हुए बताया कि लोकतंत्र हमारे लिए कोई आयातित व्यवस्था नहीं है, बल्कि भारत तो लोकतंत्र की जननी है, तमिलनाडु उत्तिरमेरूर का उदाहरण देते हुए कहा कि हज़ारों वर्ष पहले ग्राम-स्तरीय शासन में नागरिक किस प्रकार भागीदारी करते थे, उसका स्पष्ट शिलालेख आज भी विद्यमान है। इसी क्रम में उन्होंने कहा कि गुलामी की मानसिकता इतनी गहरी हो गई थी कि रामत्व की सम्पूर्ण मूल्य-व्यवस्था को नकारने के भी प्रयास हुए, इस मानसिक गुलामी के कारण ही सार्वजनिक विमर्श में यह तक बताने की कोशिश की गई कि प्रभु श्रीराम काल्पनिक हैं। एक जागरूक नागरिक होने के नाते हमें यह समझना होगा कि इस मानसिकता को त्यागे बिना हम अपने राष्ट्रीय चरित्र की वास्तविक शक्ति को कभी पहचान नहीं सकते। यदि हम ठान लें तो आने वाले दस वर्षों में इस मानसिक गुलामी से पूरी तरह मुक्ति पा सकते हैं। प्रधानमंत्री जी ने कहा भी है कि जब यह मुक्ति पूर्ण होगी, तब ऐसी ज्वाला प्रज्ज्वलित होगी, ऐसा आत्मविश्वास उत्पन्न होगा कि 2047 तक विकसित भारत के संकल्प को कोई शक्ति रोक नहीं सकेगी।

विकसित भारत 2047 की यात्रा में सहभागी बनें

माननीय प्रधानमंत्री जी की इस देश के युवाओं से यह अपेक्षा है कि हम सब विकसित भारत 2047 की यात्रा में संकल्पित सहभागी बनें। पंच प्राणों की राह पर चलकर, सांस्कृतिक आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते हुए युवा-पीढ़ी ही वह शक्ति है जो भारत के भविष्य को दृढ़ता प्रदान करेगी। प्रधानमंत्री जी ने राम के आदर्शों को भविष्य की प्रेरणा बताते हुए रामचरितमानस का यह श्लोक उद्धृत किया था –

“सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।।

बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।।’’

अर्थात् : शौर्य और धैर्य किसी रथ के पहिए हैं, सत्य और सदाचार उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं, बल, विवेक, संयम और परोपकार उसके घोड़े हैं और क्षमा, करुणा तथा समानता की डोर से ये घोड़े रथ से बंधे हैं।

चुनौतियों से जूझने का साहस

इसी तरह विकसित भारत की यात्रा के लिए हम युवाओं को ऐसा ही आदर्श रथ चाहिए जिसमें शौर्य अर्थात चुनौतियों से जूझने का साहस हो, हम धैर्य परिणाम आने तक स्थिर रहना सीखें, सत्य और शील अर्थात नैतिकता सर्वोपरि रखें, नशा मुक्त भारत बनाएं, व्यसन इत्यादि से दूर रहें बल अर्थात क्षमताओं को निरंतर बढ़ाते हुए, विवेक अर्थात सही समय पर सही निर्णय करते हुए अनुशासन, परोपकार समाज का हित का भाव रखें, क्षमा अर्थात विनम्रता,करुणा, समभाव, समरसता का भाव रखें।

सबको एक करते हैं राम

राष्ट्रीय नेतृत्व के रूप में प्रभु श्री राम को केंद्र में रखकर हम एक ऐसा चरित्र पाते हैं जो आधुनिक विज्ञान, प्रबंधन से लेकर नेतृत्व के सर्वश्रेष्ठ सिद्धांतों तक सबको एक करते हैं श्री राम राजा भी हैं और सेवक भी, राम शक्ति भी है और मर्यादा भी। प्रधानमंत्री जी ने आह्वान किया है कि हम सबको अब कंधे से कंधा मिलाकर गति बढ़ाते हुए वो भारत बनाना है, जो रामराज्य से प्रेरित हो, ये तभी संभव है, जब स्वयंहित से पहले राष्ट्रहित होगा। भारत का भविष्य तब ही बदलेगा, जब युवा अपने हर निर्णय में राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखेंगे विषय चाहे करियर के चयन का हो, नवाचार हो, समाज सेवा हो, राजनीति का हो या आर्थिक योगदान का राष्ट्र प्रथम की भावना हमारे चेतन में होनी चाहिए। विकसित भारत 2047 की राह केवल आर्थिक परिवर्तन, संरचनात्मक सुधार या तकनीकी प्रगति से नहीं बन सकती बल्कि वह तो हमारे सांस्कृतिक मूल्यों, मर्यादा, आत्मविश्वास, राष्ट्रीय स्वाभिमान और दीर्घकालिक चिंतन से ही संभव है।

हम सभी भारतवासी जब अपने भीतर के राम को जगाकर, राम के मूल्यों को जीवन में उतारकर, विकसित भारत 2047 के संकल्पों को अपनी जिम्मेदारी मानेंगे तो विकसित भारत की कीर्ति पताका विश्व गगन में गर्व से लहराएगी।

 

Topics: राम मंदिर अयोध्यापीएम मोदी का संदेशपीएम मोदी अयोध्याअयोध्या धर्म ध्वजाराम मंदिर ध्वज
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