विश्व के श्रेष्ठ भारतीय संविधान के प्रस्तावना पृष्ठ पर अंकित “राम” हिंदुत्व का अमृत तत्व, संविधान की आत्मा एवं दर्शन का प्रतीक हैं। शाश्वत सनातन संस्कृति के 20 चित्र भारतीय संविधान के सतरंग हैं। 26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान – अंगीकृत, अधिनियमित, आत्मार्पित किया गया (स्वीकार किया गया) और 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। संविधान के मुख पृष्ठ – प्रस्तावना पृष्ठ का अभिकल्प (डिजाइन) जबलपुर के डॉ. राममनोहर सिन्हा जी ने तैयार किया तदुपरांत राम शब्द भी अंकित किया। संविधान में अंकित भारतीय सांस्कृतिक विरासत के 22 चित्रों में से 12 चित्र डॉ. राममनोहर सिंहा जी के हैं। इसकी पुष्टि उनके सुपुत्र डॉ. अनुपम सिंहा के अभिलेखागार में उपलब्ध प्रामाणिक दस्तावेजों से होती है।
डॉ. राम मनोहर सिंहा का जन्म 15 जून सन् 1929 में जबलपुर में हुआ था, इनके पिता व्यौहार राजेंद्र सिंहा संघ के अभिन्न सहभागी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वे गाँधी जी से प्रभावित होकर कांग्रेस में सम्मिलित हुए और उनके आंदोलनों महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

सन् 1935 से ही भारतीय संविधान की रुपरेखा पर विमर्श आरम्भ हो गया था। उल्लेखनीय बात यह है कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद प्रसाद, संविधान को केवल शब्दों से ही नहीं,कलात्मक अभिव्यक्ति से भी सजाये और संवारे जाने के विचार में थे। इसलिए इस काम की शुरूआत देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 1935 में ही शुरू कर दी थी। वस्तुतः स्वराज संविधान का विचार सन् 1925 में आया था,जिसके प्रणेता नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे। सन् 1935 में जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद जबलपुर आए तो, व्योहार राजेंद्र सिंहा के घर ठहरे और स्वराज संविधान पर आगे काम करने का विचार बनाया। जबलपुर में ही यह बात तय हुई थी, कि जब भारत स्वाधीन होगा, तब उसका खुद का संविधान होगा और उसे चित्रों के माध्यम से अलंकृत किया जाएगा। संयोगवश यह साकार भी हुआ और भारत के महान् चित्रकार नन्दलाल बोस को यह दायित्व सौंपा गया। नंदलाल बोस उस समय बुजुर्ग थे, इसलिए उन्होंने अपने निर्देशन में कार्यभार अपने प्रिय शिष्य डॉ. राम मनोहर सिंहा को सौंपा।
आरएसएस से परिवार का जुड़ाव हमेशा से रहा
जबलपुर में संघ से सिंहा परिवार का जुड़ाव प्रारम्भ से रहा। जब सिमरिया वाली कोठी से संघ कार्यालय कृष्ण कुंज बना और शाखा लगने लगी तब प्रथम नगर संघ चालक पंडित कुंजीलाल दुबे बने थे, तभी से व्यौहार राजेंद्र सिंहा का जुड़ाव संघ से हुआ।दूसरी शाखा गोल बाजार (वर्तमान में शहीद स्मारक) में प्रारंभ हुई।इस शाखा में 24 मार्च सन् 1939 में परम पूज्य डॉ. हेडगेवार जी एवं परम पूज्य गुरु जी आए थे, वे भी पूर्ण गणवेश जो उस समय का था,उपस्थित थे। 400 स्वयंसेवक उपस्थित थे, उक्त कार्यक्रम में पंडित कुंजीलाल दुबे,श्रीराम नन्होरिया एडवोकेट तथा सर कार्यवाह मोती शंकर झा उपस्थित थे।
व्यौहार राजेंद्र सिंहा के पोते डॉ. अनुपम सिंहा जो स्वयं इतिहास मर्मज्ञ हैं, उनसे और उनके अभिलेखागार से प्राप्त जानकारी के अनुसार, 24 मार्च सन् 1939 को प्रातः काल में शाखा के उपरांत परम पूज्य डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार एवं श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर जी का प्रवास, तत्समय संघ के सहभागी व्यौहार राजेंद्र सिंहा के यहाँ हुआ, जहां संघ पर गहन विचार – विमर्श हुआ तथा स्वराज संविधान के चित्रांकन सम्बन्धी चर्चा भी हुई। तदुपरान्त व्यौहार वंश के जुगल किशोर मंदिर के दर्शन भी किए।

स्वास्तिक को संविधान में दर्शाया
व्यौहार राममनोहर सिन्हा के पुत्र डॉ. अनुपम सिन्हा के अनुसार उनके पिता के सामने भारत की ऐतिहासिक गौरवशाली सभ्यता-संस्कृति को संविधान में दर्शाना बड़ी चुनौती थी। संविधान के मुख्य पृष्ठ में जिन अलंकरणों को पिरोया गया है, वह विविधता में एकता का सौम्य समाहार है। उन्होंने पहले चित्र में सिंधु घाटी सभ्यता के प्रतीक वृषभ को शामिल किया। फिर सिंधु घाटी सभ्यता के बंदरगाह लोथल (गुजरात) के साथ सुमेरियन सभ्यता के बंदरगाह बेबीलोन को जोड़ते हुए चित्र बनाए। तदुपरान्त उन्होंने फारस में मिले स्वास्तिक को संविधान में दर्शाया, जो स्पष्ट करता है कि फारस तक भारत की सभ्यता विस्तृत थी। शैव संप्रदाय के नटराज, उड़ीसा के कलिंग साम्राज्य का कोणार्क सूर्य मंदिर, नालंदा वि.वि.की मुहर, स्वर्णिम युग गुप्तकाल की मुद्राओं के साथ ही भारत की प्राकृतिक संपदा की विविधता को दर्शाते लैंडस्केप चित्रों को संविधान के अलग-अलग पृष्ठों के लिए तैयार किया था।
स्कंद पुराण से लिए सप्त प्रतीक
गौरतलब है कि डॉ. राममनोहर सिंहा ने स्कंद पुराण में वर्णित सागर मंथन से सप्त प्रतीक लिए थे, और डॉ. राजेंद्र प्रसाद तथा सरदार वल्लभ भाई पटेल का समर्थन प्राप्त था, इसलिए इन्हें भी तत्कालीन नेहरू सरकार का कोप भाजन बनना पड़ा। इतना ही नहीं डॉ. राममनोहर सिंहा की रिश्तेदारी जयप्रकाश नारायण जी से होने के कारण, उन्हें सन् 1975 के आपातकाल में चिन्हित करके रखा गया।
कांग्रेस का दोहरा चरित्र
यह कितना दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण है, कि जिस मकबूल फिदा हुसैन ने हिंदू देवियों और भारत माता के नग्न चित्र बनाये, उसे कांग्रेस सरकार ने सभी नागरिक सम्मान दे डाले, दूसरी ओर हिंदू धर्म और संस्कृति के चित्र संविधान में उकेरने वाले चित्रकार डॉ. राममनोहर सिंहा का नाम तो नागरिक सम्मान के दिल्ली गया,परन्तु जानबूझकर कभी दिया नहीं गया।

















