यूं तो चीन बीते लंबे वक्त से तिब्बत और नेपाल सीमा के पास अपनी सैन्य गतिविधियां और बुनियादी ढांचा तेजी से बढ़ाता ही आ रहा है, लेकिन नेपाल में हुई उथल—पुथल के बाद तो अचानक इन इलाकों में चीनी सैनिकों की हरकतें और भी तेज हुई हैं। सवाल है कि क्या यह सिर्फ नेपाल के डावांडोल माहौल का ताप मापने की जुगत है या फिर कम्युनिस्ट ड्रैगन कोई बड़ा खेल खेलने की फिराक में मौका तलाश रहा है। अधिकांश रक्षा विशेषज्ञ इसे भारत को अपनी ताकत की धमक दिखाने की कसरत, सीमा-प्रबंधन और आंतरिक नियंत्रण का घालमेल मान रहे हैं। लेकिन चीन सीमा पर जब भी कोई अनचाही हरकत करता है तो वह भारत के लिए सावधान होने की जरूरत ही बयां करता है। चीन की भारत की घेराबंदी करने की इच्छा और कोशिशों से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
नेपाल–चीन सीमा पर चीनी हरकतें
नेपाल–तिब्बत सीमा पर चीन ने हाल के वर्षों में कंटीली तारों की बाड़, कंक्रीट अवरोधक और उच्च तकनीकी वाले सीमा पार जाने के प्वाइंट जैसे ढांचे तेजी से खड़े किए हैं। इनका मकसद सीमा नियंत्रण के साथ‑साथ बेशक, धीरे‑धीरे नेपाली क्षेत्र में एक एक कदम बढ़ाते हुए इलाकों का अतिक्रमण करने की मंशा भी माना जा रहा है। उपग्रह तस्वीरों और स्थानीय खुफिया जानकारी से पता चलता है कि नेपाल के हुमला जैसे जिलों में कई स्थानों पर चीनी निर्माण, फेंसिंग और स्थायी इमारतों बनी हैं।
उधर तिब्बत के पास मस्तांग कॉरिडोर से होकर तिब्बती शरणार्थियों के निकलने के रास्ते को चीन ने कड़ाई से नियंत्रित करना जारी रखा है या कई को बंद करवा दिया है। इसके लिए नेपाल–चीन सीमा पर उच्च तकनीकी निगरानी और सीमा पॉइंट खड़े किए गए हैं। सीमावर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थन वाले नारे लिखे बड़े‑बड़े बैनर और प्रतीकात्मक निर्माण भी लगाए हुए हैं। ये राजनीतिक संदेश प्रसारित करने और क्षेत्रीय दावे मजबूत करने के तरीके ही हैं।

तिब्बत की आउटपोस्ट और सैन्य आवाजाही
ताजा सैन्य‑रिपोर्ट और उपग्रह चित्रों के विश्लेषण से साफ पता चला है कि चीन ने तिब्बत वाले क्षेत्र में, नियंत्रण रेखा के पास कई सैन्य पोस्टों पर सैनिकों की तादाद और लॉजिस्टिक क्षमता बढ़ा दी है। इतना ही नहीं, एक बड़ा सैन्य अड्डा भी खड़ा किया गया है, जिसमें 720 मीटर रनवे, हैंगर और ईंधन का भंडार करने जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इस तरह के अड्डे और फॉरवर्ड आउटपोस्ट चीनी सेना ‘पीएलए’ के लिए तेजी से तैनाती, रोटेशन और आपूर्ति के हब बन रहे हैं, जिससे सीमा पर सैनिकों की संख्या को कम वक्त में ही बढ़ाया जा सकता है।
हालांकि हर छोटी चौकी (आउटपोस्ट) पर कितने सैनिकों की तैनाती है, वह संख्या फिलहाल तो पता नहीं है, लेकिन इतना तो पक्का है कि एलएसी से सटे तिब्बती इलाकों में सैनिकों की मौजूदगी, सड़कें, सुरंगें और पुल पहले की तुलना में काफी ज्यादा बन गए हैं।
क्या इसके पीछे कोई साजिश है!
रक्षा विशेषज्ञ चीन की इस सक्रियता के पीछे कई कारण देखते हैं। जैसे, भारत के साथ सीमा विवाद में मनोवैज्ञानिक और सामरिक दबाव बनाना, तिब्बत के भीतर असहमति और पलायन पर कड़ी निगरानी रखना और नेपाल जैसे छोटे पड़ोसी पर राजनीतिक‑आर्थिक पकड़ मज़बूत करने की कोशिश। नेपाल के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘सागरमाथा मैत्री‑2025’ जैसे कार्यक्रम भी इसी बड़े खाके के हिस्से के तौर पर देखे जाते हैं, जिसमें बीजिंग काठमांडू को सुरक्षा और लॉजिस्टिक के लिहाज से अपने पाले में खड़ा देखना चाहता है।
साजिश की बात करें तो विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन दक्षिण एशिया में क्रमबद्ध तरीके से इलाकों पर पकड़ बढ़ाने के लिए छोटे और धीरे‑धीरे होने वाले बदलाव लाता है। इससे वह खुद को भारत को हिमालयी सीमा पर हमेशा सजग स्थिति में रखना चाहता है। हालांकि इसमें प्रत्यक्ष युद्ध जैसी बातों का फिलहाल को सबूत नहीं दिखता, लेकिन सैन्य बुनियादी ढांचा और सैनिक उपस्थिति में लगातार बढ़ोतरी भविष्य के किसी भी संकट में चीन को बढ़त तो दिला ही सकती है। यहां यह ध्यान भी रखना जरूरी है कि ऐसी किसी स्थिति से निपटने के लिए ही भारत सीमा क्षेत्रों को सन्नद्ध रखे हुए है, वहां सैन्य ढांचे बनाए गए हैं।
भारत‑चीन सीमा पर पहले से ही लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक कई सेक्टर संवेदनशील हैं, जैसे लद्दाख (गलवान, पैंगोंग झील का इलाका), हिमाचल‑तिब्बत सीमा, उत्तराखंड का बाराहोती–लिपुलेख गलियारा, सिक्किम का नाथू‑ला क्षेत्र और पूर्वोत्तर में अरुणाचल प्रदेश के तवांग सहित पूरा मैकमोहन लाइन से सटा इलाका, जिन पर चीन सैन्य और राजनीतिक दबाव बनाए हुए है। इन सबके बीच, तिब्बत में मजबूत हो रही चीनी आउटपोस्ट और नेपाल सीमा पर बढ़तीं उसकी गतिविधियां भारत के लिए संकेत हो सकती हैं कि हिमालयी मोर्चे पर दीर्घकालिक, बहुआयामी रणनीति पर चौकस रहना जरूरी है।
भारत को सुरक्षा चुनौतियों और चीन समेत अन्य पड़ोसी देशों की गतिविधियों को देखते हुए सीमावर्ती जिलों में सतर्कता बनाए रखने की जरूरत है। खास तौर पर पश्चिमी सीमा के इस ओर राजस्थान का बाड़मेर जिला, जो पाकिस्तान सीमा से सटा है, वहां हाई अलर्ट रहना जरूरी है, क्योंकि यह इलाका आतंकवादी गतिविधियों और घुसपैठ के लिए संवेदनशील रहा है।
इसी तरह पूर्वोत्तर सीमा पर मेघालय में हालात नाजुक बने रहते हैं, क्योंकि इस क्षेत्र में तस्करी, घुसपैठ और सुरक्षा खतरे बढ़ रहे हैं। खासकर ईस्ट खासी हिल्स जिले को संवेदनशील माना जाता है जहां गैरकानूनी आवाजाही और प्रतिबंधित समूह सक्रिय रहे हैं।

















