नेपाल में एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में हलचल दिखाई दे रही है। मार्च में प्रस्तावित आम चुनाव के बाद से जनता द्वारा ठुकराए पुराने कम्युनिस्ट नेता एक बार फिर कुलबुलाने लगे हैं और इन कोशिशों में जुट गए हैं कि सत्ता की मलाई एक बार फिर उनको हासिल हो जाए। लेकिन पिछले दिनों जेन जी आंदोलन के बाद सरकार में कायम हुई अल्पकालिक व्यवस्था के बाद, लोकतंत्र में बाकायदा सरकार गठन की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए चुनाव तो कराए ही जाने हैं। नेपाल की अधिकांश आम जनता नहीं चाहती कि जेन जी के आंदोलन में निशाने पर रहे राजनीतिक दल और उनके नेता एक बार फिर जोड़—तोड़कर कुर्सी हथिया लें। लेकिन काठमांडू में दो दिन पहले पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली ने अपनी पार्टी यूएमएल की एक रैली करके संकेत दिया है कि वे कुर्सी की दावेदारी में उतरेंगे।
जेन जी आंदोलन की वजह से कुर्सी से उतरने को मजबूर कर दिए गए ओली ने रैली में कहा कि संसद को इस तरह भंग किया जाना असंवैधानिक है, इसलिए जल्द से जल्द इसकी बहाली की जाए। दूसरे, उन्होंने कहा कि उन्हें देश के सुरक्षा तंत्र से कोई बहुत उम्मीद नहीं है इसलिए वे पार्टी में ही एक सुरक्षा इकाई बनाएंगे जो न सिर्फ पार्टी कार्यकताओं को सुरक्षा देगी बल्कि आम जनता और पत्रकारों को भी सुरक्षा उपलब्ध कराएगी।

केपी शर्मा ओली ने काठमांडू में उस रैली में खुले मंच से कहा कि उन्हें देश की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर संदेह है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार उनकी सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं है और खुलेआम हमलों की धमकी तक दी जा रही है। ऐसे हालात के कारण ओली ने समर्थकों के बीच घोषणा की कि अगर जरूरत पड़ी तो, वह अपनी खुद की आर्मी बनाएंगे ताकि सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। उन्होंने कहा, “मैं राजनीतिक संघर्ष के लिए तैयार हूं, देश छोड़कर भागने वाला नहीं हूं। मेरा लक्ष्य देश में शांति, सुशासन और संविधान की बहाली है।”
इन बयानों और रैली का सीधा संदर्भ राजनीतिक अस्थिरता और नई चुनावी हलचल से है। ओली का इस तरह रैली करना इस बात का संकेत है कि विपक्ष मौजूदा कार्यवाहक सत्ता व्यवस्था को चुनौती देने के मूड में है। उधर सेना ने माहौल में आ रही गर्माहट को मापते हुए अंतरिम सरकार से अनुरोध किया है कि चुनाव में सेना की तैनाती आवश्यक होगी तभी चुनाव निष्पक्ष और निर्विघ्न संपन्न हो सकेंगे।
बेशक, नेपाल में आगामी चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। संसद भंग है। आम चुनाव की प्रस्तावित तारीख 5 मार्च 2026 है। इसी माहौल में, कई बड़े नेताओं—पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड, केपी शर्मा ओली और शेर बहादुर देउबा–पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। हाल में ही इन नेताओं के प्रति जनता की नाराजगी सोशल मीडिया प्रतिबंध के बाद हुए जेन जी के हिंसक प्रदर्शनों में सामने आई थी।
इस आंदोलन की परिणति यह हुई कि नेपाली कांग्रेस के नेता मोहन बहादुर बस्नेत, पूर्व गृह मंत्री बालकृष्ण खाण, पूर्व प्रधानमंत्री झलनाथ खनाल की पत्नी समेत कई नेताओं पर भ्रष्टाचार के मुकदमे दर्ज हुए हैं। कुछ नेता जमानत पर रिहा तो हुए हैं, लेकिन उनकी छवि दागदार हो चुकी है।
राजनीतिक विश्लेषकों को अंदेशा है कि नेपाल के बड़े दलों में इन घोटालों के बीच सत्ता कहीं पुराने, बदनाम और भ्रष्ट नेताओं के हाथ में न चली जाए। जनता और खासतौर पर युवाओं में इससे गहरा असंतोष है। बार-बार सरकारें गिरना, संसदीय स्थिरता का अभाव और अकूत भ्रष्टाचार से आम नेपाली गुस्से में है। पिछले 17 वर्ष में नेपाल में 14 सरकारें बन चुकी हैं, विभिन्न गठबंधन टूटे—जुड़े और सत्ता में उठापटक रहने से देश की प्रगति रुकी रही।

इस हिमालयी देश में जेन जी आंदोलन के नाम से जो सितम्बर में क्रांति देखने में आई, उसमें कई युवा नेतृत्व की स्थिति में आते दिखे थे। जनता भी चाहती थी कि भ्रष्ट नेताओं से तो नया नेतृत्व देश का भला करे। सोशल मीडिया के जरिए युवा वर्ग ने जबरदस्त राजनीतिक बदलाव लाकर दिखाया। तत्कालीन प्रधानमंत्री ओली को इस्तीफा देना पड़ा। सोशल मीडिया को आंदोलन का हथियार बनाकर युवाओं ने भ्रष्टाचार और तानाशाही के खिलाफ आवाज बुलंद की।
नेपाल का युवा वर्ग विशेष रूप से नए नेतृत्व और बदलाव की मांग करता रहा है, लेकिन स्पष्ट रूप से फिलहाल उनकी ओर से कोई नया राजनीतिक दल सामने नहीं आया है, हालांकि इस वर्ग का दबाव मौजूदा दलों को प्रभावित करता दिख रहा है।
लेकिन ऐसे संकेत तो हैं कि अगले माह तक नेपाल में राजनीतिक वातावरण में नए समीकरण उभरेंगे। जहां मौजूदा राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगा है, वहीं विपक्ष नए गठबंधन साथी खोज रहे हैं। जबकि उन्हें पता है कि जन आक्रोश और भ्रष्टाचार विरोधी माहौल चुनाव नतीजों को बदल भी सकता है। वे इंतजार में हैं कि आखिर युवाओं के समर्थन में कौन से नए चेहरे या विकल्प उभरकर सामने आते हैं।

















