दिल्ली में क्यों लगे 'कितने हिडमा मारोगे' नारे? युवाओं के दिमाग में कौन भर रहा 'नक्सल समर्थक' जहर?
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दिल्ली में क्यों लगे ‘कितने हिडमा मारोगे’ नारे? युवाओं के दिमाग में कौन भर रहा ‘नक्सल समर्थक’ जहर?

आखिर दिल्ली के इंडिया गेट में हुए इस नक्सल समर्थक प्रदर्शन के पीछे कौन है? कई ऐसे वीडियो सामने आए हैं जिसमें प्रदर्शनकारी युवा माओवादी नेता मादवी हिडमा के समर्थन में पोस्टर लेकर 'मादवी हिडमा अमर रहे' जैसे नारे लगा रहे हैं।

Written byLalit FularaLalit Fulara
Nov 24, 2025, 11:15 am IST
in विश्लेषण

दिल्ली में प्रदूषण विरोध के नाम पर हुआ प्रदर्शन नक्सलवादी विचारधारा का समर्थन करने लगा और युवाओं ने हाथों में पोस्टर लेकर ‘कितने हिडमा मारोगे’  नारे लगाए। इन युवाओं ने माओवादी हिडमा को पर्यावरण रखवाला तक बताया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले इन युवाओं के दिमाग में कौन लोग ‘नक्सल समर्थक’ जहर घोल रहे हैं।

क्या इन प्रदर्शनकारियों को यह नहीं पता कि हिडमा के हाथ रक्त से रंगे हुए थे और कितने ही मासूम लोगों को उसने मौत के घाट उतारा था। साल 2010 में जिस मुठभेड़ में 76 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए थे। उसका मास्टरमाइंड हिडमा ही था। एक नक्सलवादी और माओवादी कैसे मासूम हो सकता है और कैसे वो पर्यावरण प्रेमी….। पर्यावरण और प्रकृति हिंसा नहीं…सांमजस्य और समन्वय सिखाती है।

आखिर दिल्ली के इंडिया गेट में हुए इस नक्सल समर्थक प्रदर्शन के पीछे कौन है? कई ऐसे वीडियो सामने आए हैं जिसमें प्रदर्शनकारी युवा माओवादी नेता मादवी हिडमा के समर्थन में पोस्टर लेकर ‘मादवी हिडमा अमर रहे’ जैसे नारे लगा रहे हैं। एक प्रदर्शनकारी युवती ‘कितने हिडमा मारोगे…कितने कन्हैया मारोगे’ चिल्ला रही थी….। अर्बन नक्सलियों के संपर्क में आए इन प्रदर्शनकारियों को कौन समझाएगा कि हिडमा  करोड़ों का इनामी नक्सली थी। वह मासूम नहीं बल्कि नक्सलियों का एक कुख्यात लीडर था जिसने सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतारा।

18 नवंबर को जैसे ही आंध्र प्रदेश में नक्सलवादी हिड़मा को मारा गया और उसके बाद से ही नक्सल समर्थक बुद्धिजीवियों का गिरोह उसे मासूम बताने और भावुकता वाला नैरेटिव गढ़ने लगा था। सोशल मीडिया पर भी ऐसे कई पोस्ट लिखे जा रहे थे जैसे हिडमा कोई दुधमुंहा बच्चा हो, और किसी मासूम का एनकाउंटर हुआ है। 26 बड़े नक्सली हमले के मास्टरमाइंड हिडमा को बेकसूर और मासूम की तरह पेश करने वाले ये लोग ‘अर्नबल नक्सली’ नहीं हैं तो कौन हैं?

इन प्रदर्शनकारियों ने पुलिस के आंखों में मिर्ची स्प्रे तक छिड़क दिया। बैरिकेड तोड़कर सड़क पर बैठ गए और यातायात बाधित कर दिया। इन प्रदर्शनकारी युवाओं के दिमाग में नक्सलियों के प्रति संवेदना और भावुकता आखिर किसने भरी और किसने इनके दिमागों पर कब्जा किया। शहरों में पसरे वामपंथी विचारधारा वाले ये ‘अर्बन नक्सल गिरोह’ उतने ही खतरनाक हैं, जितने हथियार उठाने वाले नक्सली। ये देश के युवाओं के दिमाग में माओवादी और नक्सलवादी समर्थक विचार भरकर उनको सड़कों पर ला रहे हैं। सबसे पहले कार्रवाई इन अर्बन नक्सल गिरोह के बुद्धिजीवियों ऊपर होनी चाहिए और इस प्रदर्शन के पीछे के ‘अर्बन नक्सल’ गैंग का पर्दाफाश होना चाहिए।

 

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Lalit Fulara
Lalit Fulara
उत्तराखंड के अल्मोड़ा ज़िले के सुदूर स्थित छोटे से गाँव 'पटास' में पैदाइश. कला-साहित्य में विशेष रुचि. पहला नॉवेल 'घासी: लाल कैंपस का भगवाधारी' प्रकाशित. विगत 12 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय. करियर की शुरुआत दैनिक भास्कर से हुई और उसके बाद ज़ी न्यूज़, न्यूज़18, राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला और इंडियाडॉटकॉम होते हुए वर्तमान में पांचजन्य डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर के तौर पर कार्यरत. पत्रकारिता में एम.ए माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के नोएडा कैंपस से किया है. [Read more]
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