भारत के पड़ोसी कट्टर इस्लामवादी जिन्ना के देश ने गत 14-15 नवंबर को खैबर पख्तूनख्वा में फौजी अभियान चलाकर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के 15 आतंकवादियों को मारने का बड़ा दावा किया है। लेकिन उसने इस आतंक के लिए भारत को फिर से जिम्मेदार ठहराया है। हालांकि पाकिस्तान का यह आरोप कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी वह आतंकी घटनाओं के लिए भारत पर दोष मढ़ता रहा है, लेकिन अब तक उसने अपने फर्जी बयानों को सच के दूर दूर तक भी पास दिखाने के लिए कोई सबूत सामने नहीं रखे हैं।
पाकिस्तान का ये कथित फौजी अभियान खैबर पख्तूनख्वा के वजीरिस्तान और डेरा इस्माइल खान के कुलाची इलाके में चला बताया गया है। इसमें आतंकियों के सरगना आलम महसूद समेत कुल 15 आतंकी मारे गए बताए हैं। ये सभी कहीं न कहीं टीटीपी से जुड़े बताए गए। बताया गया कि ये अभियान खुफिया सूचना के आधार पर चलाए गए थे, जिसमें डेरा इस्माइल खान में 10 और उत्तरी वजीरिस्तान में 5 आतंकी मारे गए।
पाकिस्तानी सेना ने भारतीय ‘प्रॉक्सी’ दखल का आरोप लगाते हुए कहा कि मारे गए आतंकी भारत समर्थित नेटवर्क से जुड़े थे, लेकिन उसके पास इसका न कोई सबूत है, न ठोस जानकारी। सिर्फ भारत को बदनाम करने के उद्देश्य से उसने एक बार फिर प्रपंच रचने की कोशिश की है।

जिन्ना का यह इस्लामवादी देश किस तरह आतंकवादियों का पनाहगाह बना हुआ है, उसके ढेरों प्रमाण दुनिया के सामने हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान सत्ता अधिष्ठान की आतंकवादी गुटों के साथ साठगांठ तस्वीरों के माध्यम से भी अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में कई बार आ चुकी है। लेकिन खुद को ‘मासूम’ दिखाने के लिए वह पलटकर भारत पर अपने यहां आतंकी घटनाओं को बढ़ावा देने के आरोप लगाता आ रहा है। भारत सरकार ने डोजियर सौंप कर आतंकवादियों के पाकिस्तान के पते—ठिकाने और कारनामे तक बताए हैं, लेकिन उस पर कभी कोई हरकत नहीं की गई, न ही स्वीकारा गया कि पाकिस्तान की सैन्य खुफिया एजेंसी आईएसआई आतंकवादी समूहों को पाल—पोस रही है, उन्हें आर्थिक—रणनीतिक सहयोग उपलब्ध करा रही है।
इस इस्लामी देश का इस बार फिर टीटीपी के भारत से संबंध का दावा किया जाना उसे एक बार फिर झूठा साबित करता है। इसके बरअक्स रॉयटर्स जैसी कई अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियां पहले भी बता चुकी हैं कि पाकिस्तान ऐसा अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने या आंतरिक असफलताओं से ध्यान हटाने के लिए करता है।
विशेषज्ञों के एक मोटे अनुमान के अनुसार, पाकिस्तान में 150 से ज्यादा आतंकी संगठन सार्वजनिक रूप से सक्रिय हैं। इनमें लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-झांगवी, हिज्बुल तहरीर, हरकत-उल-जिहाद-इस्लामी, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान आदि शामिल हैं। इनमें से कई संगठन भारत और अफगानिस्तान में आतंकी घटनाओं के लिए कुख्यात हैं।
पाकिस्तान की आईएसआई ने इस बार जिन आतंकियों के मारे जाने का दावा किया गया, वे सभी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान से जुड़े बताए गए हैं। टीटीपी पाकिस्तान में विशेष रूप से सेना को निशाना बनाता आ रहा है, साथ ही इसका नेटवर्क अफगानिस्तान और पाकिस्तान के सीमा क्षेत्रों में फैला है।
पाकिस्तान ने यदा-कदा अपने अवैध कब्जे वाले कश्मीर समेत अन्य क्षेत्रों में हुए हमलों का ठीकरा भी भारत पर ही फोड़ा है, जबकि दुनिया जानती है कि लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हरकत-उल जिहाद-इस्लामी, हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों का न सिर्फ संचालन खुले रूप से पाकिस्तान में होता है बल्कि इन सभी संगठनों के आतंकी नेताओं और सैन्य अधिकारियों से निकट संबंध रखते हैं।
2024 और 2025 में पाकिस्तान अधिक्रांत कश्मीर और अफगान सीमा से सटे इलाकों में पाकिस्तानी फौज और तालिबान समर्थित गुटों के बीच हिंसक संघर्षों की घटनाएं भी सामने आई हैं, जहां अक्सर पाकिस्तान अपने असफल सैन्य ऑपरेशन की वजह ‘बाहरी हाथ’ बताता रहा है।
बलूचिस्तान में भी बलूच लिबरेशन आर्मी, बलूच रिपब्लिकन आर्मी जैसे विद्रोही गुटों के संदर्भ में पाकिस्तान ने बार-बार ‘भारत की मदद’ का आरोप लगाया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे इन फर्जी बयानों के लिए कभी मान्यता या समर्थन नहीं मिला है।
पाकिस्तान में आतंकवादी गुटों की संख्या व नेटवर्क उस इस्लामवादी देश की आंतरिक कमजोरी और लचर सुरक्षा नीति का सबूत है। बार-बार भारत पर आरोप लगाने की पाकिस्तान की दुर्नीति घटनाओं के तथ्यों से मेल नहीं खाती। खैबर पख्तूनख्वा में मारे गए आतंकी टीटीपी जैसे गुटों से जुड़े थे, जिनका लंबा हिंसक इतिहास पाकिस्तान के भीतर ही है, जबकि भारत पर लगाए गए आरोप न साबित होते हैं, न ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीय माने जाते हैं।

















