राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर 8 और 9 नवंबर को सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का बेंगलूरु में विशेष व्याख्यान आयोजित हुआ। इसका विषय था- ‘100 वर्ष की यात्रा : नए क्षितिज।’ यह व्याख्यानमाला की दूसरी कड़ी थी। पहली कड़ी 26-28 अगस्त तक नई दिल्ली में हुई थी। तीसरी कड़ी दिसंबर में कोलकाता में और चौथी कड़ी फरवरी, 2026 में मुंबई में होगी। बेंगलूरु व्याख्यान में शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान, व्यापार क्षेत्रों के गणमान्य व्यक्तियों सहित विदेश से आए प्रतिनिधि भी शामिल हुए। मंच पर सरसंघचालक श्री भागवत के साथ सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबले, दक्षिण मध्य क्षेत्र संघचालक श्री वामन शेनॉय और कर्नाटक दक्षिण संघचालक श्री उमापति जी.एस. उपस्थित थे। व्याख्यानमाला के पहले दिन सरसंघचालक श्री भागवत का दो सत्र में उद्बोधन हुआ। दूसरे दिन भी दो सत्र थे, जिनमें केवल प्रश्नोत्तर हुए। यहां प्रस्तुत हैं श्री भागवत के व्याख्यान के संपादित अंश-
बीते एक दशक से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है। संघ के बारे में लोगों की अधिकांश धारणाएं तथ्यों के बजाय पूर्वाग्रहों पर आधारित हैं। संघ को पूर्वाग्रहों के आधार पर नहीं समझा जा सकता; इससे केवल भ्रांति पैदा होती है। संघ का समर्थन या विरोध तथ्यों के आधार पर होना चाहिए, भ्रांतियों के आधार पर नहीं। संघ का मूल कार्य समाज को संगठित करना है जो किसी प्रतिक्रियावश नहीं, बल्कि इतिहास से प्रेरित है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान विभिन्न विचारधाराओं ने आकार लिया- सशस्त्र क्रांति, राजनीतिक संवाद और सामाजिक सुधार, लेकिन उनमें से अधिकांश आम लोगों तक पहुंचे ही नहीं। ऐसे समय में स्वामी दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद जैसे नेताओं ने समाज को अपनी जड़ों की ओर लौटने की प्रेरणा दी।
संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने विभिन्न आंदोलनों में भाग लिया, जिसमें स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर कोलकाता में क्रांतिकारी अनुशीलन समिति की सदस्यता प्राप्त करना और उन पर चलाए गए राजद्रोह के मुकदमे आदि शामिल हैं। डॉक्टर जी मानते थे कि भारत पर बार-बार होने वाले आक्रमण की वजह आत्म-विस्मृति थी। हम भूल गए थे कि हम कौन हैं और हमने अपनी विविधता को विभाजनकारी बना दिया। डॉक्टर जी का कहना था कि सच्ची एकता का विकास विविधता को बनाए रखते हुए होना चाहिए। दुनिया मानती है कि एकता एकरूपता से जन्म लेती है, जबकि हमारी परंपरा कहती है कि एकता का आधार विविधता है। रवींद्रनाथ ठाकुर का मत है कि वास्तविक परिवर्तन राजनीति से नहीं, बल्कि जनता के प्रति समर्पित निस्वार्थ व्यक्तियों के नेतृत्व में प्रेरित सामाजिक जागृति से होता है। महात्मा गांधी का ‘हिंद स्वराज’ भी इसी विचार को पोषित करता है।

लोगों के हृदय में संघ
डॉ. हेडगेवार और उनके सहयोगियों ने संघ के मॉडल को अंतिम रूप देने से पहले लगभग 15 वर्ष तक प्रयोग करने के बाद ‘व्यक्ति निर्माण’ के मूल सिद्धांत पर जोर देते हुए समाज के हितों पर केंद्रित एक गैर-राजनीतिक संगठन की बुनियाद रखी। इसमें दैनिक शाखा चरित्र-निर्माण की पाठशाला बनी, जहां लोग करीब घंटे भर शारीरिक गतिविधियों में शामिल होते हैं और जाति, क्षेत्र और भाषा संबंधी भेदभाव को भूलकर केवल भारत माता की चर्चा करते हैं। इस मॉडल को समाज ने अपनाया और आज भी लोग बढ़-चढ़कर इसमें हिस्सा लेते हैं। हालांकि, कभी-कभार विरोध के स्वर उभरते हैं, पर लोगों के दिल में संघ बसता है।
यहां के निवासियों को हिंदू नाम प्राचीन काल में हमारी भूमि पर प्रवेश करने वाले यात्रियों ने दिया था। हिंदू समाज को चार समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है— पहला, ऐसे लोग जिन्हें हिंदू होने पर गर्व है; दूसरा, ऐसे जो हिंदू हैं लेकिन गर्व नहीं करते; तीसरा, ऐसे लोग जो जानते हैं कि वे हिंदू हैं लेकिन स्वीकार नहीं करते; और चौथा, ऐसे लोग जो भूल चुके हैं कि वे हिंदू हैं। हिंदू एक सर्वसमावेशी शब्द है। मुसलमानों और ईसाइयों के पूर्वज भी हिंदू ही थे। हिंदू होने का अर्थ है भारत माता का पुत्र होना, जो सत्य को समझने का प्रयास करता है। भगवान राम के समय से चली आ रही सत्य की यह खोज संस्कारों के माध्यम से जनमानस में बसी है और संस्कारों का निर्माण ही संस्कृति है। हिंदू होने का अर्थ है भारत के लिए कर्तव्यनिष्ठ होना। हिंदू समाज का संगठित होना आवश्यक है, क्योंकि भारत एक हिंदू राष्ट्र है। यह विचार संविधान का खंडन नहीं करता, बल्कि उसके अनुरूप है।

विरोध के बावजूद बढ़ा संघ
संघ अपनी स्थापना के समय से ही सरकारी विरोध का सामना करता रहा है। दुनिया में शायद ही और किसी संगठन को इस तरह निरंतर विरोध का सामना करना पड़ा हो। संघ बिना किसी बाहरी सहायता के स्वयंसेवकों के बलिदान और योगदान से आगे बढ़ा है, जिसमें कई लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। हमें संपूर्ण हिंदू समाज को इसके उत्कर्ष और गौरव के साथ संगठित करना है। संघ का लक्षित उद्देश्य समस्त विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के दर्शन के अनुरूप एकजुट करना है। श्री अरबिंदो कहा करते थे कि ईश्वर की इच्छा है कि सनातन धर्म और भारत का उत्थान हो, क्योंकि सनातन धर्म हिंदू राष्ट्र है और सनातन धर्म के उत्थान का अर्थ है भारत का उत्थान।

भारत का उद्देश्य
स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि प्रत्येक राष्ट्र का एक उद्देश्य होता है, और भारत का उद्देश्य है दुनिया को धर्म प्रदान करना। अक्सर धर्म को मत (रिलीजन) कह दिया जाता है। ‘रिलीजन’ शब्द ‘रिलिजियो’ शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है बांधना। यह ईश्वर को प्राप्त करने के मार्ग में क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यह ऐसे कार्यों की सूची है, जबकि धर्म एक व्यापक विचार है। धर्म जीवन का अंतर्निहित स्वभाव, कर्तव्य, संतुलन, अनुशासन और धारण करने वाला सिद्धांत है। अग्नि जलाती है, यही इसका धर्म है। इसी प्रकार, धर्म सृष्टि को बनाए रखता है। यह मध्यम मार्ग भी है जो अति से बचाव करता है।

प्रकृति का शोषण अस्तित्व के लिए खतरा
मनुष्य ने अपार भौतिक प्रगति की है, फिर भी उसे सच्चा सुख या संतोष प्राप्त नहीं हुआ। मनुष्य के हर प्रयास में सुख की आकांक्षा निहित होती है। जीवन तो आसान हो गया है, लेकिन संतोष गायब है। हमने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकास तो किया, लेकिन मतभेदों और अशांति में अब भी उलझे हैं। हमें शरीर, मन और बुद्धि का ज्ञान है, लेकिन हम यह समझने में पिछड़ गए कि इन तीनों को जोड़ने वाली डोरी क्या है। जब समाज एकजुट होता है, तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता की कोई जगह नहीं रहती। जब लोग समृद्ध होने लगते हैं, तो समाज विभाजित हो जाता है। जब प्रौद्योगिकी विकसित होती है तो प्रकृति को चोट पहुंचती है। भौतिकवादी दर्शन यह निष्कर्ष देता है कि जो देखा और महसूस किया जाता है वही एकमात्र सत्य है, पर यह प्रतिस्पर्धा और शोषण को बढ़ावा देता है।
व्यक्ति की जरूरत को पूरा करने के साधन प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं, पर उसके लालच के सामने सब कम पड़ जाता है। फिल्म ‘द इलेवंथ ऑवर’ इस बात की ओर ध्यान आकर्षित करती है कि मनुष्य द्वारा प्रकृति का निर्मम शोषण उसके अस्तित्व के लिए ही खतरा बन जाता है। प्रकृति के साथ रहने के लिए संयम आवश्यक है। भारत के प्राचीन ऋ षियों को शांत जीवन का सौभाग्य प्राप्त था। उन्होंने अपनी तपस्या से यह ज्ञान प्राप्त किया कि परम सत्य भीतर स्थित है, बाहर नहीं। उन्हें यह ज्ञान था कि एक ही आत्मा सभी प्राणियों में व्याप्त है। जैसे ही इस सत्य का बोध होता है, संतोष की अवस्था प्राप्त हो जाती है। एकात्मकता का बोध शरीर, मन और बुद्धि को एकाकार करता है। यह व्यक्ति, समाज और प्रकृति को जोड़ता है। धर्म इसी संतुलन का नाम है, जो एक स्थायी सिद्धांत है जो परम सत्य की सभी अभिव्यक्तियों को एक सूत्र में पिरोता है।
स्वधर्म का ज्ञान
राजा शिवि ने एक कबूतर को बाज से बचाने के लिए अपना शरीर त्याग दिया था, जो संतुलन और कर्तव्य के रूप में धर्म का प्रतीक है। मनुष्य सृष्टि के शीर्ष पायदान पर स्थित है। इसलिए उसका कर्तव्य है कि प्रकृति को उसका देय लौटाए। धर्म पालन करने वाला विचार है, उपदेश नहीं। एक समृद्ध राष्ट्र का निर्माण धर्म की नींव पर होना चाहिए। हमारे पूर्वजों ने अपना ज्ञान साझा करने के लिए दुनिया भर की यात्रा की। उनका उद्देश्य कभी भी अपनी प्रभुता दर्शाना या कन्वर्जन कराना नहीं था, बल्कि ज्ञान का प्रसार था। अब समय आ गया है कि भारत फिर से उठे और खुद को एक धार्मिक राष्ट्र के रूप में स्थापित करे। तभी अन्य देशों को अपने स्वधर्म का ज्ञान होगा और वे मानवता की बेहतरी के लिए काम कर पाएंगे।

हम एक हैं
हमें हिंदू समाज को एकजुट करने के लिए विविधतापूर्ण समाज के हर वर्ग तक पहुंचना होगा। संघ ने उन समुदायों के साथ संवाद शुरू कर दिया है जो खुद को हिंदू नहीं मानते, जबकि उनके पूर्वज हिंदू थे। हम सज्जन—शक्ति, यानी ऐसे हितैषियों के साथ जुड़ेंगे और मिल कर काम करेंगे, जो भले ही हमारी हर बात से सहमत न हों, लेकिन समाज की भलाई के कार्यों से जुड़े हैं।
ये कदम अंधविश्वास और अस्पृश्यता के उन्मूलन, सामुदायिक सहयोग को बढ़ावा देने और आपसी विकास सुनिश्चित करने पर केंद्रित होंगे। औपनिवेशिक शासन ने भारत के सामाजिक विभाजन को और गहरा कर दिया था। औरंगज़ेब के क्रूर शासन के बाद हिंदू और मुसलमान एकजुट हो गए थे, लेकिन अंग्रेजों ने अपने शासन को बनाए रखने के स्वार्थ में इनके बीच में दरार पैदा कर दी। आज हम स्वतंत्र हैं, लेकिन उन विचारों के निशान अब भी मौजूद हैं। भले ही हमारी पूजा पद्धतियां अलग-अलग हैं, राष्ट्र, संस्कृति और समाज के रूप में हमारी पहचान एक है।

संगठित और परोपकारी समाज
हमें विवेकरहित आनंद, बिना कर्म किए धन की आकांक्षा, बिना चरित्र ज्ञान, नैतिकता रहित व्यापार, मानवतारहित विज्ञान, बिना त्याग धर्म और सिद्धान्त रहित राजनीति जैसी विकृतियों को सुधारना है। नैतिकता और करुणा आधारित एक भारतीय जीवन मॉडल बनाना है, जो दुनिया का मार्गदर्शन करे, उससे सीख सके और उसे अपना सके।
100 वर्ष के बाद भी संघ का कार्य अधूरा है। हमें अभी बहुत कार्य करने हैं। यदि आप समाज या मानवता के लिए कोई भी अच्छा काम कर रहे हैं तो आप हमारे कार्य का हिस्सा हैं। संघ आपसे गणवेश धारण करने की अपेक्षा नहीं करता; यह केवल समर्पण, मानवता और मूल्यों का पालन करने का वातावरण चाहता है। संघ न तो विरोध है और न ही प्रतिक्रिया। यह हिंदू राष्ट्र का जीवन लक्ष्य है, जिसका ध्येय वसुधैव कुटुम्बकम्,
अर्थात् समस्त विश्व को अपना परिवार मानना है। संघ एक संगठित, परोपकारी समाज तैयार करना चाहता है जो पूरी मानवता की भलाई के लिए कार्य करे।















