ऋग्वेद के देवी सूक्त में माँ आदिशक्ति स्वयं कहती हैं, “अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां,अहं रूद्राय धनुरा तनोमि ” अर्थात् मैं ही राष्ट्र को बांधने और ऐश्वर्य देने वाली शक्ति हूँ, और मैं ही रुद्र के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाती हूं। हमारे तत्वदर्शी ऋषि मनीषा का उपरोक्त प्रतिपादन वस्तुत: स्त्री शक्ति की अपरिमितता का द्योतक है, जिसका स्वरुप महान वीरांगना ऊदा देवी पासी में आलोकित होता है।
वीरों की विरासत को धुंधला करने की साजिश आखिर क्यों?
जब मैं लखनऊ की महान वीरांगना ऊदा देवी पासी की वीरगाथा को याद करता हूं तो मुझे उनकी समकालीन बुंदेलखंड की महान वीरांगना झलकारी बाई कोली की याद आती है। दोनों योद्धाओं में कई समानताएं थीं, जिनमें सबसे प्रमुख यह थी कि उदा देवी पासी – बेगम हजरत महल – झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की महिला टुकड़ी की कमांडर थीं। इस संदर्भ में, मुझे झलकारी बाई के बारे में जनरल ह्यूग रोज़ का कथन याद आता है: “यदि भारत की 1% महिलाएं भी उनकी तरह होतीं, तो अंग्रेजों को सब कुछ छोड़कर भागना पड़ता।” फिर आखिर क्यों महान वीरांगना ऊदा देवी पासी और झलकारी बाई को इतिहास में उचित स्थान देना तो छोड़िए वरन् उनके इतिहास को धुंधला कर के रख दिया! आखिर क्यों? वास्तविकता यह है कि पश्चिमी इतिहासकारों , वामपंथी इतिहासकारों के साथ एक दल विशेष के समर्थक जूंठनखोर इतिहासकारों ने मिलकर मुगलों और अंग्रेजों का और उनके भारतीय समर्थकों का इतिहास में गुणगान कर पाठ्यक्रमों में शामिल किया ताकि हमारा वीरोचित इतिहास दफन हो जाए!आने वाली भावी पीढ़ियों हीन भावना से ग्रसित केवल हमारी पराजयों का इतिहास पढ़ती रहें, हमारी विजयों और वीरोचित संघर्ष का नहीं ! और वास्तविक भारतीय वीरांगनाओं के साथ तो दोयम दर्जे का व्यवहार हुआ!
बदले की ज्वाला और बेजोड़ शौर्य
वीरांगना ऊदा देवी पासी भी इसी षडयंत्र का शिकार हुई। एतदर्थ यदि स्वाधीनता के अमृत काल में उनका इतिहास नहीं लिखा गया तो यह पुनः घोर अन्याय होगा। उदा देवी का जन्म 30 जून,सन् 1830 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ ज़िले के उजरिया गाँव,जिसे आजकल गोमती नगर के नाम से जाना जाता है, वहाँ एक पासी परिवार में हुआ था। उनके पति मक्का अपने समय के एक महान पहलवान थे। ऊदा देवी को बचपन से ही स्वदेशी वस्तुओं से प्यार था इसलिए वे अंग्रेजी वस्तुओं से नफरत करती थीं। बरतानिया सरकार के विरुद्ध बन रहे,स्वतंत्रता संग्राम के वातावरण को देखते हुए,उन्होंने सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त कर महिला बटालियन का निर्माण किया था। ऊदा देवी पासी उत्कृष्ट निशानेबाज थीं। सन् 1857 का स्वतंत्रता संग्राम नवंबर माह तक आते- आते अपनी चरम पर पहुंच गया था। लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह को बरतानिया सरकार ने कलकत्ता निर्वासित कर दिया था, परंतु बरतानिया सरकार और नवाब की सेना में युद्ध जारी रहा।
बेगम हजरत महल के निर्देशन में नवाब की सेवा का नेतृत्व मक्का पासी कर रहे थे और वही महिला दस्ता की कमान ऊदा देवी पासी के हाथ थी। तभी एक बुरा समाचार आया कि लखनऊ के पास चिनहट नाम की जगह पर नवाब की फौज़ और अंग्रेजों के बीच टक्कर हुई और इस लड़ाई में ऊदा देवी के पति मक्का पासी का बलिदान हो गया है। अब ऊदा देवी पासी के सब्र का बांध टूट गया और बदला लेने के लिए सिकंदर बाग पहुंच गई। 16 नवंबर 1857 को सिकंदर बाग में बड़ी संख्या में भारतीय जवान पहले से मौजूद थे,अंग्रेजों को जब इसकी भनक लगी तो वे सिकंदर बाग पर हमला करने की तैयारी के साथ पहुंचे, अंग्रेज कुछ करते, उससे पहले ऊदा देवी सिकंदर बाग में मौजूद पीपल के पेड़ पर चढ़ गईं। ऊदा देवी,पुरुषों की वर्दी पहने हुए थीं,16 नवंबर 1857 का दिन था।पीपल के पेड़ से ही उन्होंने एक-एक कर कुछ तय अंतराल पर 36 अंग्रेज सिपाही गोलियों से भून दिया।
जब अंग्रेज दंग रह गए शौर्य की इस गूंज से
जब अंग्रेज अधिकारियों को इस घटना की जानकारी मिली तो वे भौंचक रह गए।किसी को कुछ नहीं पता चल पा रहा था कि आखिर यह हमला कैसे और कहां से हुआ? गुस्से से भरे अंग्रेजों ने सिकंदर बाग में शरण लिए भारतीय वीरों पर हमला कर दिया और बड़ी संख्या में नरसंहार किया, इसे 16 नवंबर क़ी गदर के रुप में भी याद किया जाता है। घटनास्थल पर पहुंचे कैप्टन वायलस और डाउसन को समझ नहीं आ रहा था कि उनके सिपाही कैसे मरे? उन पर गोलियां कहां से चलाई गईं? किसी अंग्रेज का ध्यान पीपल के पेड़ पर गया जहां लाल वर्दी में एक सिपाही बैठ कर गोलियां चला रहा था।अब उन्हें समझ आ गया था कि 36 अंग्रेज सिपाही कैसे मरे? बिना समय गंवाए अंग्रेजों ने उसी जवान पर निशाना साध दिया।
त्याग, सम्मान और राजनीति के बीच ऊदा देवी का सच
गोली लगते ही वह जवान नीचे आ गिरा,वह कोई और नहीं ऊदा देवी थीं, बाद में जांच-पड़ताल में पता चला कि वह पुरुष नहीं, महिला थीं, जिसने अंग्रेजों से बदला लेने के लिए पुरुष वेश धारण किया था। यह ऊदा देवी पासी की स्व के लिए पूर्ण आहुति थी। न केवल लखनऊ वरन भारत में आज उनका नाम बहुत आदर – सम्मान से लिया जाता है,उसी सिकंदर बाग चौराहे पर ऊदा देवी की प्रतिमा लगी हुई है, वहाँ हर वर्ष उनकी जयंती-पुण्यतिथि पर आयोजन भी होते हैं, परंतु दुर्भाग्य यह है कि जब से उत्तरप्रदेश में जातिवादी राजनीति प्रारंभ हुई तब से ऊदा देवी को उनकी जाति का समर्थन पाने की लालसा रखने वाले दलों ने दलित कार्ड के रूप में उपयोग कर उनके त्याग और बलिदान का अपमान ही किया है। स्वाधीनता के अमृत काल में यही आव्हान है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उन्हें समुचित स्थान प्राप्त हो और वोट बैंक की राजनीति में उन्हें ना बाँटा जाए। यही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का साधुवाद कि उन्होंने 20 मार्च 2021 को महान् महिला स्वतंत्रता सेनानी ऊदा देवी के नाम पर प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी (पीएसी) महिला बटालियन की स्थापना की घोषणा की। उन्होंने रानी अवंतीबाई लोधी की पुण्यतिथि पर आयोजित एक कार्यक्रम में उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा था कि “भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अपना बलिदान देने वाली तीन महिला योद्धाओं – रानी अवंतीबाई , उदा देवी और झलकारीबाई के नाम पर तीन पी.ए.सी. महिला बटालियन स्थापित की जाएंगी, जिसके लिए सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं।”











