कटक स्थित ओडिशा उच्च न्यायालय ने अलकायदा आतंकवादी मोहम्मद अब्दुर रहमान की जमानत याचिका खारिज कर दी। कटक जिले के सालेपुर ब्लॉक के पश्चिमकच्छ गांव का निवासी रहमान दिसंबर 2015 से जेल में है। उसे आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। हाईकोर्ट ने जमानत याचिका को खारिज करते हुए कहा कि रहमान के खिलाफ लगे आरोप बेहद गंभीर हैं और मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि इस चरण पर आरोपी की रिहाई चल रही जांच को प्रभावित कर सकती है और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा साबित हो सकती है।
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, रहमान को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और ओडिशा पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में 16 दिसंबर 2015 को गिरफ्तार किया गया था। यह कार्रवाई खुफिया जानकारी के आधार पर की गई थी, जिसमें रहमान पर युवाओं को आतंकी संगठनों के लिए भर्ती करने और उन्हें कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित करने का आरोप था। उसे कटक के जगतपुर के पास से पकड़ा गया, जहां वह टांगी इलाके में एक अवैध मदरसा चला रहा था। पुलिस का दावा है कि इस मदरसे का इस्तेमाल वह छात्रों को कट्टरपंथी विचारधारा से ब्रेनवॉश करने के लिए करता था।
पुलिस जांच में यह भी सामने आया था कि रहमान पेशे से एक मौलवी था और मजहबी आयोजनों के मंचों का इस्तेमाल करके कट्टरपंथी विचारों का प्रचार-प्रसार करता था। उस पर आरोप है कि उसने ओडिशा और झारखंड के कई धार्मिक सभाओं (जलसा कार्यक्रमों) में उकसाने वाले भाषण दिए, जिनके जरिए वह युवाओं को कट्टरपंथ के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करता था। गिरफ्तारी के बाद ओडिशा क्राइम ब्रांच की स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) ने मामले की जांच अपने हाथ में ली और अगस्त 2023 में उसके खिलाफ एक विस्तृत चार्जशीट दाखिल की। यह मामला फिलहाल कटक जिले की सालेपुर सेशन कोर्ट में विचाराधीन है। हाईकोर्ट ने जमानत याचिका खारिज करते समय कहा कि जब तक मुकदमे की सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, आरोपी को रिहा नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि आरोप अत्यंत गंभीर हैं और गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत दर्ज किए गए हैं।
रहमान आतंकवाद से जुड़े मामले में पहले भी दोषी ठहराया जा चुका है । फरवरी 2023 में दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने उसे और उसके तीन सहयोगियों मोहम्मद आसिफ, ज़फर मसूद और अब्दुल सामी को दोषी करार दिया था। अदालत ने पाया कि ये सभी आरोपी अल-कायदा से जुड़े नेटवर्क के माध्यम से युवाओं की भर्ती और आतंकी गतिविधियों की साजिश रचने में शामिल थे। अदालत ने रहमान को सात वर्ष पाँच माह के कठोर कारावास की सजा सुनाई और ₹25,000 का जुर्माना लगाया। वह इस सजा को भुगत चुका है, लेकिन अब भी न्यायिक हिरासत में है क्योंकि ओडिशा पुलिस ने उसके खिलाफ यूएपीए के तहत एक दूसरा मामला दर्ज किया हुआ है।
जांच एजेंसियों के अनुसार रहमान ने 2015 में पाकिस्तान की यात्रा की थी, जहाँ उसने लश्कर-ए-तैयबा के शीर्ष कमांडरों ज़की-उर-रहमान लखवी और साजिद मीर से मुलाकात की थी। दोनों ही 26/11 मुंबई आतंकी हमले के मुख्य आरोपी हैं। 2018 में प्रकाशित रिपोर्टों में दावा किया गया था कि पूछताछ के दौरान रहमान ने स्वीकार किया कि उसकी 1999 के कंधार विमान अपहरण और 2002 के अमेरिकन सेंटर ब्लास्ट (कोलकाता) में शामिल आतंकवादियों से संपर्क थे।
पुलिस सूत्रों ने बताया कि गिरफ्तारी से पहले रहमान कई महीनों तक खुफिया एजेंसियों की निगरानी में था। उसके लगातार मजहबी सभाओं में जाने और कट्टरपंथी तत्वों से संपर्क बनाने की कोशिशों ने राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों को उसके प्रति सतर्क किया था। खुफिया अधिकारियों ने उसकी गिरफ्तारी को पूर्वी भारत में अल-कायदा के भर्ती नेटवर्क को खत्म करने की दिशा में एक बड़ी सफलता बताया था। ध्यान देने योग्य है कि रहमान का एक भाई भी 2002 के अमेरिकन सेंटर हमले के मामले में आरोपी था, हालांकि बाद में सबूतों के अभाव में उसे बरी कर दिया गया था। स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने इस मामले में सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की । हालांकि, सूत्रों के अनुसार, रहमान के नेटवर्क और उसके संभावित संपर्कों की जांच अब भी केंद्रीय और राज्य खुफिया एजेंसियों की संयुक्त निगरानी में जारी है।











