जिन्ना के देश में General Munir की तानाशाही चलेगी अब! 27वें संशोधन के मायने क्या? CDF पद क्यों चाहते हैं मुनीर!
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जिन्ना के देश में General Munir की तानाशाही चलेगी अब! 27वें संशोधन के मायने क्या? CDF पद क्यों चाहते हैं मुनीर!

27वां संशोधन पाकिस्तान के संवैधानिक इतिहास में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। यह संशोधन अगर इसी रूप में लागू रहा, तो मोटे अर्थों में सत्ता मुनीर जैसे बदनाम सैन्य जनरल के हाथों में होगी

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Nov 10, 2025, 12:17 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर अब चीफ आफ आर्म्ड डिफेंस फोर्सेस के पद पर बैठने को लालायित हैं

सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर अब चीफ आफ आर्म्ड डिफेंस फोर्सेस के पद पर बैठने को लालायित हैं

पाकिस्तान के वर्तमान सत्ता अधिष्ठान में एक बड़ी उलटफेर के संकेत मिल रहे हैं जो उस देश के और गर्त में उतरने की पूरी संभावना जता रहे हैं। अभी चार महीने पहले ही खुद ​ही अपने सिर पर ‘आपरेशन सिंदूर में तीर मारने’ की वाहवाही लादते हुए फील्ड मार्शल का पद और पैसा अपने नाम लिखाने वाले सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर अब सीडीएफ यानी चीफ आफ आर्म्ड डिफेंस फोर्सेस के पद पर बैठने को लालायित हैं। इसके लिए सरकार और संसद पर दबाव डालकर संविधान में 27वां संशोधन करने संबंधी प्रस्ताव भी पारित करा चुके हैं। यह संशोधन सैन्य-नागरिक संबंधों से जुड़ा है। लेकिन इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद इसकी संभावित संवैधानिक परिणतियों और सीएडएफ के लिए नामित मुनीर की शक्तियों का विश्लेषण जिन्ना के देश के आने वाले दिनों की खराब तस्वीर पेश करता है।

इस्लामाबाद के सत्ता गलियारों में इस संशोधन की सरगर्मी से चर्चा चल रही है। जिन्ना के देश के संविधान में किया गया यह 27वां संशोधन न केवल नागरिक-सैन्य संबंधों के नए समीकरण तय करता है, बल्कि यह देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए भी गंभीर चुनौती माने जाने लगा है। इस संशोधन ने एक ऐसी संरचना तैयार की है जिससे सेना प्रमुख को पहले से कहीं अधिक संवैधानिक शक्ति प्राप्त हो जाएगी।

कुछ राजनीतिक विश्लेषक तो इसे जनरल जिया-उल-हक के उस दौर की वापसी की आहट बता रहे हैं, जब संविधान को सैन्य हितों के अनुरूप ढाला गया था और नागरिक शासन एक औपचारिकता भर रह गया था।

संविधान में 27वें संशोधन के तहत लाए गए कुछ प्रमुख प्रावधान बेहद महत्वपूर्ण जान पड़ते हैं। जैसे, इसके तहत सीडीएफ का पद सृजित किया गया है। यह सेना, नौसेना और वायुसेना, तीनों शाखाओं का सर्वोच्च कमान केंद्र होगा। यानी राष्ट्रपति तक को अब रक्षा मामलों में सीएडएफ की सलाह बाध्यकारी रूप से माननी होगी। पहले यह सलाह केवल अनुशंसात्मक होती थी।

प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ: इस संशोधन से सत्तारूढ़ सरकार की भूमिका औपचारिक सलाहकारी निकाय जैसी बनकर रह जाएगी, जबकि वास्तविक सत्ता सैन्य ढांचे के भीतर केंद्रित हो जाएगी  (File Photo)

प्रधानमंत्री की सुरक्षा और रक्षा नीति संबंधी निर्णयों पर प्रभावी वीटो पावर सीएडएफ को दी गई है, जिसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा हस्तक्षेप अधिकार’ नाम दिया गया है। बजटीय आवंटन, रक्षा नीति की प्राथमिकताएं और रणनीतिक परियोजनाएं अब संसद के बजाय राष्ट्रीय रक्षा परिषद (जिसकी अध्यक्षता सीएडएफ करेगा) की स्वीकृति से संचालित होंगी। इसके अलावा न्यायिक दखल को भी सीमित किया गया है। अदालत अब केवल प्रक्रिया सम्बंधी मुद्दों पर दखल दे सकेगी, नीतिगत निर्णयों पर नहीं इसकी नहीं चलेगी।

इन प्रावधानों का मिलाजुला प्रभाव यह होगा कि सत्तारूढ़ सरकार की भूमिका औपचारिक सलाहकारी निकाय जैसी बनकर रह जाएगी, जबकि वास्तविक सत्ता सैन्य ढांचे के भीतर केंद्रित हो जाएगी।

फिलहाल पाकिस्तानी सेना प्रमुख के ओहदे पर बैठे जनरल असीम मुनीर अब नए सृजित किए पद सीडीएफ के लिए नामित किए गए हैं। यह पद सेना प्रमुख से कहीं ऊंचा और अधिक केंद्रीकृत होगा। सीडीएफ के रूप में मुनीर के पास अनेक शक्तियां होंगी, जैसे, राष्ट्रीय रक्षा परिषद रक्षा नीति, खुफिया गतिविधियों और आंतरिक सुरक्षा के समन्वय की सर्वोच्च संस्था होगी जिसका अध्यक्ष सीडीएफ होगा।

मुनीर के पास आपातकालीन प्रावधान लागू करने की अनुशंसा का अधिकार होगा। किसी भी सुरक्षा संकट, आतंकवाद या राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति में सीडीएफ राष्ट्रपति से प्रत्यक्ष संपर्क कर आपातकाल लागू कराने की अनुशंसा कर सकता है। अब मुनीर का विदेश नीति पर अघोषित अधिकार होगा। रक्षा संबंधी विदेश वार्ताओं में सीडीएफ देश का प्रतिनिधित्व करेगा, जिससे विदेश मंत्रालय की भूमिका सीमित होनी तय है। यह एक प्रकार से नागरिक प्रशासन में हस्तक्षेप की वैधानिक अनुमति ही है। कानून व्यवस्था या भ्रष्टाचार के नाम पर किसी प्रांत में सैन्य प्रशासनिक निगरानी लगाई जा सकेगी।

स्वाभाविक ही, इस 27वें संशोधन को लेकर जिन्ना के देश के विपक्षी दलों, पत्रकार संगठनों और नागरिक समाज ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। अधिकांश का कहना है कि यह संशोधन पाकिस्तान के लोकतांत्रिक ढांचे की जड़ें कमजोर कर सकता है और निर्वाचित सरकार को ‘प्रॉक्सी शासन’ में बदल सकता है। आलोचक इसे जनरल जिया उल हक और जनरल परवेज मुशर्रफ के दौर की पुनरावृत्ति के खतरे के तौर पर देख रहे हैं, जब संविधान में ऐसे ही संशोधनों के जरिए सैन्य शासन को वैधानिक रूप दिया गया था।

कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह चेतावनी भी दे रहे हैं कि इससे संघीय ढांचा कमजोर हो सकता है, क्योंकि प्रांतीय सरकारों को सुरक्षा और प्रशासनिक मामलों में अब प्रत्यक्ष दखल का सामना करना पड़ेगा। अदालतों की सीमित भूमिका और संसद की घटती शक्ति पाकिस्तान के पहले से जर्जरहाल लोकतंत्र को और कमजोर करेगी।

पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय संघ, ने इस संशोधन पर चिंता व्यक्त की है। वे इसे पाकिस्तान में सिविल-सोसाइटी की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक शासन के लिए खतरा मानते हैं। हालांकि चीन और कुछ मध्य एशियाई देशों ने इसे स्थिरता के लिए आवश्यक कदम बताते हुए अपना समर्थन दिया है।

कहा जा सकता है कि यह 27वां संशोधन पाकिस्तान के संवैधानिक इतिहास में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। यह संशोधन अगर इसी रूप में लागू रहा, तो मोटे अर्थों में सत्ता मुनीर जैसे बदनाम सैन्य जनरल के हाथों में होगी। इससे न सिर्फ संविधान के मूल्य प्रभावित होंगे बल्कि सरकार की विश्वसनीयता और स्वायत्तता भी जाती रहेगी।

Topics: मुनीरGeneral Asim Munir27वां संशोधनCDF27th amendmentपाकिस्तानPakistan
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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